घटस्थापना का शुभ मुहूर्त प्रतिपदा तिथि और अभिजित मुहूर्त के अनुसार प्रातःकाल ही तय होता है, इसलिए सटीक समय हेतु नज़दीकी पंचांग देखें। इन्हीं नौ दिनों को पूर्वी भारत में दुर्गा पूजा के रूप में, तथा गुजरात में गरबा-डांडिया के साथ विशेष धूमधाम से मनाया जाता है।
शारदीय नवरात्रि का महत्व
शारदीय नवरात्रि आश्विन मास में शरद ऋतु के आरंभ पर मनाई जाती है, इसीलिए इसे 'शारदीय' कहा जाता है। मान्यता है कि इन नौ दिनों में मां दुर्गा ने महिषासुर नामक असुर का वध कर संसार को उसके अत्याचार से मुक्त कराया था। यह पर्व असत्य पर सत्य और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है, तथा वर्ष की चार नवरात्रियों में सबसे अधिक धूमधाम से मनाई जाने वाली नवरात्रि है।
नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों, शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री, की क्रमशः पूजा की जाती है। प्रत्येक स्वरूप एक विशेष शक्ति और गुण का प्रतीक है, और भक्त प्रत्येक दिन उसी स्वरूप का ध्यान व पूजन करते हैं।
शारदीय नवरात्रि की समाप्ति पर आने वाला दशहरा, भगवान श्रीराम की रावण पर विजय का भी स्मरण कराता है, इसीलिए इन नौ दिनों में अनेक स्थानों पर रामलीला का मंचन भी होता है। पूर्वी भारत में यही पर्व भव्य पंडालों में दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है, जिसका समापन प्रतिमा विसर्जन से होता है।
नवरात्रि के नौ स्वरूप

मां शैलपुत्री
दिन 1मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नमः
भोग: शुद्ध गाय का घी · स्वास्थ्य, स्थिरता व दीर्घायु

मां चंद्रघंटा
दिन 3मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चन्द्रघण्टायै नमः
भोग: दूध व दूध से बने व्यंजन · साहस, वीरता व भय से मुक्ति

मां कात्यायनी
दिन 6मंत्र: ॐ देवी कात्यायन्यै नमः
भोग: शहद · विवाह में बाधा दूर व आकर्षण
शारदीय नवरात्रि कैसे मनाई जाती है
पहले दिन घटस्थापना यानी कलश स्थापना की जाती है, मिट्टी के पात्र में जौ बोकर, जल से भरे कलश पर आम के पत्ते और नारियल रखकर मां दुर्गा का आवाहन किया जाता है। घर या मंदिर में अखंड ज्योति प्रज्वलित कर नौ दिनों तक जलाए रखी जाती है।
प्रतिदिन मां के संबंधित स्वरूप की पूजा, दुर्गा सप्तशती का पाठ और आरती की जाती है। अनेक भक्त नौ दिनों का उपवास रखते हैं, जबकि कुछ केवल पहले और अंतिम दिन व्रत करते हैं। अष्टमी अथवा नवमी को कन्या पूजन कर छोटी कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर भोजन कराया जाता है।
गुजरात में इन रातों में गरबा और डांडिया रास का आयोजन होता है, जबकि पश्चिम बंगाल में भव्य पंडाल सजाकर दुर्गा पूजा मनाई जाती है। उत्तर भारत के कई नगरों में रामलीला का मंचन कर, नौवें या दसवें दिन रावण-दहन के साथ पर्व का समापन होता है।
शारदीय नवरात्रि पूजा विधि
प्रतिपदा तिथि को प्रातःकाल स्नान कर, पूजा स्थान को शुद्ध कर मिट्टी के पात्र में जौ बोएं। कलश में जल भरकर उस पर आम के पत्ते और नारियल रखें तथा मां दुर्गा का आवाहन कर अखंड ज्योति प्रज्वलित करें। प्रतिदिन उस दिन के स्वरूप का ध्यान, दुर्गा सप्तशती अथवा दुर्गा चालीसा का पाठ, और संध्या आरती करें। अष्टमी अथवा नवमी को कन्या पूजन व हवन कर पूजा का समापन करें।
घटस्थापना मुहूर्त 2026
इस वर्ष प्रातः का मुहूर्त चित्रा नक्षत्र व वैधृति योग में पड़ रहा है, जिन्हें घटस्थापना के लिए वर्जित नहीं, किंतु अनुपयुक्त माना जाता है, इसलिए अनेक परिवार अभिजित मुहूर्त चुनते हैं। समय नई दिल्ली के अनुसार हैं, अपने शहर का समय स्थानीय पंचांग से अवश्य मिलाएं।
घटस्थापना के नियम
- घटस्थापना का सर्वश्रेष्ठ समय प्रतिपदा तिथि रहते दिन का प्रथम एक-तिहाई भाग माना जाता है।
- यदि यह समय उपलब्ध न हो, तो अभिजित मुहूर्त में घटस्थापना की जा सकती है।
- अमावस्या तिथि में तथा रात्रि के समय घटस्थापना वर्जित है, इसे मध्याह्न से पहले, प्रतिपदा रहते ही पूर्ण करें।
कलश स्थापना की सामग्री
- जौ बोने के लिए मिट्टी का चौड़ा पात्र
- स्वच्छ मिट्टी
- सप्तधान्य (सात प्रकार के अनाज) अथवा जौ
- मिट्टी या पीतल का छोटा कलश
- गंगाजल अथवा शुद्ध जल
- मौली (कलावा)
- सुगंध (इत्र)
- सुपारी
- सिक्के
- आम अथवा अशोक के पांच पत्ते
- कलश का ढक्कन
- अक्षत (साबुत चावल)
- जटा वाला (बिना छिला) नारियल
- लाल वस्त्र
- पुष्प व माला (गेंदे के फूल उत्तम)
- दूर्वा घास
कलश स्थापना विधि
प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा स्थान को शुद्ध करें, फिर मुहूर्त में क्रम से ये चरण करें।
- १
जौ का पात्र तैयार करें
मिट्टी के चौड़े पात्र में मिट्टी की पहली परत बिछाकर उस पर अनाज के बीज फैलाएं। दूसरी परत में बीज पात्र के किनारों के पास फैलाएं, फिर ऊपर मिट्टी की अंतिम परत डालें और आवश्यकता हो तो थोड़ा जल छिड़कें।
- २
कलश पर मौली बांधें व जल भरें
कलश के गले पर मौली बांधें और उसे गंगाजल अथवा शुद्ध जल से भरें।
- ३
कलश में सामग्री डालें
जल में सुपारी, सुगंध, दूर्वा, अक्षत और सिक्के डालें।
- ४
पत्ते रखकर ढक्कन लगाएं
कलश के मुख के किनारे पर आम या अशोक के पांच पत्ते रखें, फिर उसे ढक्कन से ढक दें।
- ५
नारियल स्थापित करें
बिना छिले नारियल को लाल वस्त्र में लपेटकर मौली से बांधें और उसे कलश के ऊपर रखें।
- ६
कलश को जौ के पात्र पर रखें
तैयार कलश को जौ बोए गए मिट्टी के पात्र के मध्य में स्थापित करें।
- ७
आवाहन व पंचोपचार पूजा
मां दुर्गा का आवाहन कर उनसे नौ दिनों तक कलश में निवास करने की प्रार्थना करें। फिर दीप, धूप, पुष्प, गंध और नैवेद्य (फल व मिठाई), इन पांच उपचारों से पंचोपचार पूजा करें।
- ८
अखंड ज्योति
परंपरा अनुसार अखंड ज्योति प्रज्वलित करें, जो नवरात्रि के सभी दिनों तक जलती रहती है।
नौ दिनों की पूजा व समापन
- १
प्रतिदिन
उस दिन के देवी स्वरूप का ध्यान करें (ऊपर नवदुर्गा तालिका देखें), दुर्गा सप्तशती अथवा दुर्गा चालीसा का पाठ करें और संध्या समय आरती करें। सप्तशती का पाठ एक दिन में पूरा न हो सके तो सात-दिवसीय पाठ-क्रम अपनाएं, जो प्रतिपदा से आरंभ करने पर सप्तमी तक पूरा होता है; तालिका में हर स्वरूप के साथ उस दिन के अध्याय दिए गए हैं।
- २
दुर्गा अष्टमी व महा नवमी, 19 अक्टूबर
इस वर्ष अष्टमी व नवमी दोनों 19 अक्टूबर को हैं। अष्टमी तिथि प्रातः 10:51 पर समाप्त होगी, उसके अंतिम 24 मिनट व नवमी के प्रथम 24 मिनट, यानी लगभग 10:27 से 11:15 तक, संधि पूजा का सबसे शुभ समय है। इसी दिन कन्या पूजन व हवन किया जाता है।
- ३
विजयादशमी, 20 अक्टूबर
दशमी को दुर्गा विसर्जन के साथ नवरात्रि का समापन होता है और विजयादशमी (दशहरा) मनाया जाता है।
शारदीय नवरात्रि के बारे में
शारदीय नवरात्रि मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना का नौ दिन का पर्व है, जो आश्विन मास की शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होकर नवमी तिथि तक चलता है। इस पृष्ठ पर नवरात्रि का महत्व, घटस्थापना, नवदुर्गा के नौ स्वरूप, कन्या पूजन तथा क्षेत्रीय परंपराओं जैसे गरबा-डांडिया व दुर्गा पूजा की जानकारी दी गई है, साथ ही घर पर पूजा-विधि भी बताई गई है।
अष्टमी, नवमी और दशहरा जैसे नवरात्रि के प्रमुख दिनों की विस्तृत जानकारी हेतु उनके अलग पृष्ठ भी उपलब्ध हैं।
सामान्य प्रश्न
शारदीय नवरात्रि कब मनाई जाती है?
शारदीय नवरात्रि प्रत्येक वर्ष आश्विन मास की शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तिथि तक, नौ दिनों के लिए मनाई जाती है, जो सामान्यतः सितंबर-अक्टूबर में आती है।
नवदुर्गा के नौ स्वरूप कौन-कौन से हैं?
नवदुर्गा के नौ स्वरूप हैं, शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री, जिनकी क्रमशः एक-एक दिन पूजा की जाती है।
कन्या पूजन क्या है और कब किया जाता है?
कन्या पूजन में छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनके पैर धोकर, तिलक कर भोजन कराया जाता है। यह सामान्यतः अष्टमी अथवा नवमी तिथि को किया जाता है।
शारदीय और चैत्र नवरात्रि में क्या अंतर है?
चैत्र नवरात्रि वसंत ऋतु में चैत्र मास में मनाई जाती है और राम नवमी पर समाप्त होती है, जबकि शारदीय नवरात्रि शरद ऋतु में आश्विन मास में मनाई जाती है और दशहरे पर समाप्त होती है। दोनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की ही पूजा होती है।
क्या पूरे नौ दिन व्रत रखना आवश्यक है?
नहीं, यह श्रद्धा व सामर्थ्य पर निर्भर करता है। कई भक्त नौ दिनों का उपवास रखते हैं, जबकि कई केवल पहले और अंतिम दिन ही व्रत करते हैं।






