अध्याय १ · पूजन विधि
कार्तिक मास के कृष्ण-पक्ष की चतुर्थी तिथि को करवा चौथ अथवा करक-चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए गणेश जी की पूजा करने का विधान है। भारतीय वाङ्मय में गणेश जी की पूजा किसी भी कार्य के प्रारम्भ में करने की प्रथा सदैव से ही रही है, क्योंकि सभी देवों में इन्हें अनादि देव माना गया है। अतः गणेश जी की पूजा सर्वप्रथम होती है।
भगवान् शिव-पार्वती ने भी अपने विवाह-काल में सर्वप्रथम गणेश जी की पूजा की थी। इसका उल्लेख कवि-कुल-सम्राट गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने महाकाव्य में किया है। 'मुनि अनुशासन गनपतिहिं, पूजे शम्भू भवानि। अस सुनि संशय करिय नहिं, सुर अनादि जिय जानि॥' गणेश जी विघ्न विनाशक के रूप में माने जाते हैं, इसलिए किसी भी कार्य की निर्विघ्न पूर्णता के लिए इनकी पूजा को आवश्यक कहा गया है।
करवा चौथ के दिन ब्रती को नित्य कर्म से निवृत्त होकर गणेश जी की पूजा के लिए मन में दृढ़ संकल्प करना चाहिए कि, मैं आज दिनभर निराहार रहकर गणेश जी के ध्यान में तत्पर रहूंगी और रात्रि में जब तक चन्द्रोदय नहीं होगा तब तक निर्जल व्रत करूंगी।
व्रत के दिन सायंकाल में घर की दीवार को गोबर से लीपकर उसके ऊपर गेरू की स्याही बनाकर उससे गणेश, पार्वती, शिव, कार्तिकेय आदि देवों की प्रतिमा बनानी चाहिए। साथ ही एक वटवृक्ष (बरगद का पेड़), मानव की आकृति भी उस दीवार पर चित्रित करनी चाहिए। उस मानव-आकृति के हाथ में छलनी भी होनी चाहिए। पास में उदय होते चाँद की आकृति भी उस दीवार पर चित्रित करनी चाहिए।
पूजन-काल में उस दीवार के नीचे दो करवों में जल भरकर रखना चाहिए। उस करवे के गले में नाड़ा लपेटकर सिंदूर से रंगना चाहिए और उसकी टोंटी में सरई की सींक लगानी चाहिए। तदनन्तर करवे के ऊपर चावल से भरा हुआ कटोरा रखकर सुपारी भी रखनी चाहिए। नैवेद्य के रूप में उस पर चावल का बना हुआ लड्डू (शक्करपिण्डी) रखें। इसके अतिरिक्त प्रतिमा के पास पूड़ी, खीर भी नैवेद्य के रूप में अर्पित करें। इसके अतिरिक्त ऋतु-फल के अनुसार सिंघाड़ा, केला, नारंगी, गन्ना आदि, जो कुछ भी पदार्थ उपलब्ध हो उसे अर्पित कर भक्तिपूर्वक कथा श्रवण करें।
कथा के अंत में, पूर्व से स्थापित उन करवों को दाहिनी ओर से बाईं ओर एवं बाईं ओर रखे हुए करवे को दाहिनी ओर घुमाकर रखें। इस प्रक्रिया को लोक-भाषा में 'करवा फेरना' कहते हैं। इस प्रकार विधि-विधान पूर्वक पूजन करने से ब्रती के ऊपर गणेश जी की प्रसन्नता होती है, और उसके फलस्वरूप उसे मनवांछित फल की प्राप्ति एवं अखण्ड सौभाग्यता मिलती है।
अध्याय २ · साहूकार-कन्या की कथा
एक साहूकार के सात पुत्र और एक पुत्री थी। कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन साहूकार की पत्नी, उसकी सभी बहुओं एवं कन्या ने संयुक्त रूप से व्रत का अनुष्ठान किया। पूजन के पश्चात् साहूकार के सभी पुत्र भोजन करने बैठे। भोजन करते समय साहूकार के पुत्रों ने अपनी बहन से भी भोजन करने का आग्रह किया।
बहन ने उत्तर दिया - तुम सभी लोग भोजन कर लो। मैं चन्द्रोदय होने के पश्चात् अर्घ्य दे लेने के बाद ही भोजन करूँगी। बहन की बात सुनकर भाइयों ने कुछ दूरी पर मैदान में अग्नि जला दी, और उस अग्नि के प्रकाश को छलनी में से दिखाकर कहा - बहन! देखो, सामने चन्द्रमा निकल आया है, अब तुम भी भोजन कर लो।
भाई की बात सुनकर उस कन्या ने अपनी भाभियों से भी यही बात दुहरायी। उसकी भाभियाँ इस कपट-पूर्ण बात को जानती थीं। उन्होंने उससे कहा - अभी चाँद नहीं निकला है, तुम्हारे भाइयों ने अग्नि के प्रकाश-द्वारा तुम्हें चन्द्रमा के उदित होने का भास कराया है। परन्तु अपनी भाभियों की बात पर उस कन्या ने कोई ध्यान न देकर अर्घ्य दे डाला और उसके बाद भोजन भी कर लिया।
उसके इस कृत्य से गणपति भगवान् अत्यधिक रुष्ट हो गये, जिसके फलस्वरूप उस कन्या का पति भयंकर रोग से ग्रस्त हो गया। चिकित्सा आदि कराने में संचित धन नष्ट हो गया, और वह अत्यन्त शोकाकुल होकर कष्ट भोगने लगी।
कष्ट भोगने के बाद जब उसे अपनी भूल का ज्ञान हुआ, तो वह बार-बार मन में पश्चात्ताप करने लगी। उसने अपनी भूल के लिए गणेश जी से क्षमा-याचना की और व्रत को पुनः भक्तिपूर्वक पूरा किया। उसकी आराधना से गणेश जी प्रसन्न हो गये और सभी कष्टों का निवारण कर उसे धन-धान्य से पूर्ण कर दिया। अतएव इस व्रत को जो प्राणी विधिपूर्वक सम्पन्न कर लेता है, उसकी सभी आशाएँ पूरी हो जाती हैं।
अध्याय ३ · अर्घ्य विधि एवं व्रत का फल
इस प्रकार कथा श्रवण करने के पश्चात् चन्द्रोदय हो जाने पर चन्द्र देव को अर्घ्य प्रदान करना चाहिए। अर्घ्य-दान काल में 'ॐ चन्द्राय नमः' इस मन्त्र का उच्चारण भी करते रहना चाहिए। इसके अनन्तर चार बार परिक्रमा कर चन्द्र देव को दण्डवत करें।
इतना कर लेने के पश्चात् घर के वृद्ध जनों को भोजन कराकर स्वयं भोजन करें। पूजाकाल में व्यवहृत पदार्थ, अर्पित किये गये नैवेद्य आदि को ब्राह्मणों को दान कर देना चाहिए। इस प्रकार भक्तिभाव से जो लोग इस चतुर्थी व्रत को करते हैं, उनकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं।
अध्याय ४ · करवा चौथ उद्यापन विधि
किसी भी व्रत का उद्यापन उसकी पूर्णता पर ही करना चाहिए। व्रत की तिथि पर ही उद्यापन किया जाता है। जिस वर्ष में उद्यापन करना हो, उस वर्ष की कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन व्रत समाप्त होने के पश्चात् एक थाली को कुमकुम से रंजित कर, चार-चार की संख्या में पूड़ी और उस पर शक्कर रखकर तेरह स्थानों पर लगा दें, और उस पर एक नथ, साड़ी, ब्लाउज, दक्षिणा आदि रखकर अपनी सास को अर्पण कर दें।
जिनकी सास न हो, उन्हें चाहिए कि वे किसी सधवा ब्राह्मणी को दान कर दें। सम्पूर्ण कृत्य प्रतिपादित करने के अनन्तर ही स्वयं अन्न ग्रहण करें। ऐसा करने से उनका सौभाग्य अक्षय बना रहता है।
करवा चौथ व्रत कथा पाठ विधि
करवा चौथ के दिन निर्जला व्रत रखकर संध्या समय दीवार पर गणेश-पार्वती-शिव-कार्तिकेय की प्रतिमा व करवा स्थापित करें, कथा सुनें, तथा चंद्रोदय पर अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें। पूर्ण पूजन विधि, अर्घ्य विधि व उद्यापन विधि इस पृष्ठ के पहले, तीसरे व चौथे अध्याय में विस्तार से दी गई है।
करवा चौथ व्रत कथा के बारे में
करवा चौथ व्रत कथा साहूकार की उस पुत्री की कथा है, जिसने भाइयों के छल में आकर चांद निकलने से पूर्व ही अर्घ्य देकर भोजन कर लिया था, जिसके फलस्वरूप उसे कष्ट भोगना पड़ा और अंततः पुनः व्रत पूरा करने पर उसे गणेश जी की कृपा प्राप्त हुई। इस पृष्ठ पर चार अध्याय हैं, पहले में पूजन विधि, दूसरे में साहूकार-कन्या की कथा, तीसरे में अर्घ्य विधि व व्रत का फल, तथा चौथे में उद्यापन विधि दी गई है।
यह व्रत मुख्यतः उत्तर भारत में विवाहित स्त्रियों द्वारा अपने पति की दीर्घायु की कामना से किया जाता है। इस पृष्ठ पर चारों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
करवा चौथ व्रत कथा का कोई एक नामित रचयिता नहीं है। भारत में इस व्रत की कई अलग-अलग नाम व स्वरूप वाली कथाएं प्रचलित हैं, जैसे करवा नामक पतिव्रता धोबिन की कथा, तथा द्रौपदी को श्रीकृष्ण द्वारा सुनाई गई कथा, जो इस पृष्ठ पर सम्मिलित नहीं हैं। यहां प्रस्तुत पाठ एक प्रकाशित हिंदी व्रत-कथा संग्रह पुस्तिका में छपी 'साहूकार-कन्या की कथा' का यथावत रूपांतरण है, जिसमें केवल स्पष्ट मुद्रण-त्रुटियां सुधारी गई हैं, कथा में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। यह कथा भारत में सर्वाधिक प्रचलित करवा चौथ कथा मानी जाती है, किंतु अन्य मुद्रित संस्करणों में शब्दों का हेरफेर मिल सकता है।
सामान्य प्रश्न
करवा चौथ व्रत कथा में कुल कितने अध्याय हैं?
इसमें कुल चार अध्याय हैं, पूजन विधि, साहूकार-कन्या की कथा, अर्घ्य विधि व फल, तथा उद्यापन विधि, जो सब एक साथ पूर्ण पाठ के रूप में पढ़े या सुने जाते हैं।
करवा चौथ कब मनाया जाता है?
यह व्रत प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है, जिसे करक चतुर्थी भी कहा जाता है।
करवा फेरना क्या है?
कथा सुनने के बाद पूजा में स्थापित दो करवों (जलपात्रों) को एक-दूसरे की दिशा में घुमाकर रखने की प्रक्रिया को लोक-भाषा में 'करवा फेरना' कहा जाता है, जो पूजन विधि का एक अनिवार्य भाग है।
क्या करवा चौथ की केवल एक ही कथा प्रचलित है?
नहीं, भारत में करवा चौथ की कई कथाएं प्रचलित हैं, जैसे करवा नामक धोबिन की कथा तथा द्रौपदी को श्रीकृष्ण द्वारा सुनाई गई कथा। इस पृष्ठ पर सबसे अधिक प्रचलित 'साहूकार-कन्या की कथा' दी गई है।
