इंद्र-इंद्राणी व द्रौपदी-कृष्ण रक्षासूत्र प्रसंग
रक्षाबंधन की रक्षासूत्र-परंपरा के पीछे दो प्रमुख कथाएं प्रचलित हैं, एक इंद्र व उनकी पत्नी इंद्राणी की, तथा दूसरी द्रौपदी व भगवान श्रीकृष्ण की, दोनों ही यहां विस्तार से दी गई हैं।
अध्याय १ · इंद्र-इंद्राणी का रक्षासूत्र
एक समय देवराज इंद्र व असुरों के मध्य भीषण युद्ध छिड़ गया। असुरों की सेना अत्यंत बलशाली थी, तथा एक-एक कर देवता युद्ध में पराजित होने लगे। स्वयं इंद्र भी असुरराज बलि के समक्ष हार मानने की स्थिति में आ पहुंचे, तथा उनका मनोबल पूर्णतः टूट चुका था।
यह देखकर इंद्र की पत्नी शची (इंद्राणी) अत्यंत चिंतित हुईं, तथा उन्होंने भगवान विष्णु से रक्षा की प्रार्थना की। भगवान की कृपा से उन्हें एक रक्षासूत्र प्राप्त हुआ, जिसे शची ने श्रावण मास की पूर्णिमा को अपने पति इंद्र की कलाई पर बांधा, यह कामना करते हुए कि यह सूत्र उनकी रक्षा करे व उन्हें विजय दिलाए।
विष्णु चालीसा पढ़ें →उस रक्षासूत्र की शक्ति से इंद्र का खोया हुआ आत्मबल व साहस पुनः जाग उठा, तथा वे नवीन उत्साह के साथ युद्धभूमि में लौटे। इसके पश्चात हुए युद्ध में देवताओं की विजय हुई तथा असुरों को पराजित किया गया। इसी घटना को रक्षासूत्र बांधने की सबसे प्राचीन परंपरा माना जाता है, जो आगे चलकर रक्षाबंधन के पर्व के रूप में विकसित हुई।
अध्याय २ · द्रौपदी व श्रीकृष्ण का रक्षासूत्र
महाभारत में वर्णित एक अन्य प्रसिद्ध प्रसंग के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया, तब चक्र चलाते समय उनकी तर्जनी उंगली कट गई तथा रक्त बहने लगा। यह देखकर पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने बिना विलंब किए अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़ा, तथा उसे श्रीकृष्ण की कलाई पर बांधकर रक्तस्राव रोक दिया।
श्रीकृष्ण इस निःस्वार्थ स्नेह से अत्यंत प्रसन्न हुए, तथा उन्होंने द्रौपदी को वचन दिया कि वे सदैव उसकी रक्षा करेंगे। वर्षों पश्चात, जब कौरवों की राजसभा में दुःशासन ने द्रौपदी का चीरहरण करने का दुस्साहस किया, तब श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति से द्रौपदी की साड़ी को अनंत कर दिया, जिससे उसका मान-सम्मान सुरक्षित रहा।
इस प्रकार, एक छोटी-सी वस्त्र-पट्टी बांधने का यह भाव आगे चलकर रक्षा व स्नेह के प्रतीक के रूप में स्थापित हुआ, तथा इंद्र-इंद्राणी की कथा के साथ मिलकर रक्षाबंधन पर्व की नींव बना।
इंद्र-इंद्राणी व द्रौपदी-कृष्ण रक्षासूत्र प्रसंग के बारे में
यह प्रसंग दो अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में इंद्र-इंद्राणी की कथा है, जिसमें शची द्वारा बांधे गए रक्षासूत्र से इंद्र को असुरों पर विजय प्राप्त होती है। दूसरे अध्याय में द्रौपदी-कृष्ण की कथा है, जिसमें द्रौपदी के वस्त्र-बंधन के बदले श्रीकृष्ण उसकी सदैव रक्षा करने का वचन निभाते हैं।
यह प्रसंग रक्षाबंधन पर्व की परंपरा की नींव है। इस पृष्ठ पर दोनों कथाओं का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
भविष्य पुराण एवं महाभारत के बारे में
इन दोनों प्रसंगों का कोई एक प्रामाणिक मुद्रित 'कथा-पाठ' नहीं है, इंद्र-इंद्राणी की कथा भविष्य पुराण में तथा द्रौपदी-कृष्ण की कथा महाभारत के सभा-पर्व व वन-पर्व में वर्णित सुविख्यात प्रसंगों पर आधारित है। यहां दिया गया शब्दांकन मौलिक रूप से किया गया है, ताकि यह किसी एक वेबसाइट या प्रकाशन के पाठ की अविकल प्रतिलिपि न बने, तथापि घटनाक्रम पुराण व महाभारत की सुस्थापित परंपरा पर आधारित है।
सामान्य प्रश्न
रक्षाबंधन की सबसे पुरानी कथा कौन-सी मानी जाती है?
इंद्र-इंद्राणी की कथा को रक्षासूत्र बांधने की सबसे प्राचीन परंपरा माना जाता है, जिसमें शची द्वारा बांधे गए रक्षासूत्र से इंद्र को असुरों पर विजय प्राप्त हुई थी।
द्रौपदी ने श्रीकृष्ण की कलाई पर वस्त्र क्यों बांधा था?
शिशुपाल-वध के समय सुदर्शन चक्र चलाते हुए श्रीकृष्ण की उंगली कट गई थी, जिसे देखकर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी कलाई पर बांध दिया था।
श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को दिया वचन कब निभाया?
उन्होंने यह वचन कौरवों की राजसभा में निभाया, जब दुःशासन ने द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया, तब श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति से उसकी साड़ी को अनंत कर दिया।