अध्याय १ · नारद द्वारा कंस-वध की भविष्यवाणी
एक बार देवर्षि नारद ने इंद्र को मथुरा के दुष्ट राजा कंस की कथा सुनाई। नारद ने बताया कि कंस ने एक दिन एक ज्योतिषी से अपनी मृत्यु के विषय में पूछा। ज्योतिषी ने कहा: हे कंस, तुम्हारी बहन देवकी, जो वसुदेव की पत्नी है, उसकी आठवीं संतान तुम्हारा वध करेगी।
यह सुनकर भयभीत कंस ने अपनी प्रिय बहन देवकी व उसके पति वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया, तथा प्रण लिया कि देवकी की प्रत्येक संतान को जन्म लेते ही मार डालेगा। इस क्रूर प्रतिज्ञा के अनुसार उसने देवकी की पहली छह संतानों को जन्म लेते ही मार डाला। सातवीं संतान बलराम को योगमाया की शक्ति से देवकी के गर्भ से निकालकर रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया गया, जिससे कंस को लगा कि यह गर्भपात हो गया।
अध्याय २ · श्रीकृष्ण का जन्म
भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को, घनघोर घटाओं से भरी अर्धरात्रि में, जब आकाश में रोहिणी नक्षत्र विद्यमान था, देवकी के गर्भ से स्वयं भगवान विष्णु ने अपने पूर्ण रूप में जन्म लिया। जन्म लेते ही शिशु ने अपना चतुर्भुज रूप देवकी व वसुदेव को दिखाया, तथा उन्हें अपने अवतार का प्रयोजन स्मरण कराया।
शिशु के जन्म लेते ही कारागार के समस्त द्वार अपने आप खुल गए, बेड़ियां टूट गईं, तथा द्वार पर पहरा दे रहे सभी प्रहरी गहरी नींद में सो गए। वसुदेव ने भगवान से प्रार्थना की कि वे पुनः साधारण शिशु का रूप धारण कर लें, जिससे वे उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुंचा सकें। भगवान ने वसुदेव की यह प्रार्थना स्वीकार कर ली।
अध्याय ३ · गोकुल-यात्रा एवं शिशु की अदला-बदली
वसुदेव शिशु को एक टोकरी में रखकर मध्यरात्रि में ही गोकुल की ओर चल पड़े। मार्ग में उफनती यमुना नदी पड़ी, किंतु जैसे ही यमुना जी का जल शिशु के चरणों को स्पर्श हुआ, नदी शांत होकर मार्ग देने लगी। गोकुल पहुंचकर वसुदेव ने देखा कि नंद बाबा व माता यशोदा दोनों गहरी निद्रा में हैं, तथा उसी रात्रि यशोदा ने भी एक कन्या को जन्म दिया है। वसुदेव ने चुपके से अपने पुत्र को यशोदा के पास रख दिया, तथा उनकी नवजात कन्या को लेकर पुनः मथुरा के कारागार लौट आए।
प्रातःकाल जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म का समाचार मिला, तो वह भयभीत होकर कारागार पहुंचा। उसने देवकी की गोद से नवजात कन्या को छीनकर एक शिला पर पटकना चाहा, किंतु वह कन्या उसके हाथ से छूटकर आकाश में उड़ गई, तथा देवी के रूप में प्रकट होकर बोली: हे कंस, मुझे मारने से क्या लाभ, तुम्हें मारने वाला तो पहले ही अन्यत्र सुरक्षित जन्म ले चुका है।
अध्याय ४ · पूतना एवं अन्य दानवों का वध
इस आकाशवाणी को सुनकर कंस ने गोकुल में जन्मे प्रत्येक शिशु को मरवाने का प्रयास आरंभ किया। उसने सर्वप्रथम राक्षसी पूतना को भेजा, जो अपने स्तनों में विष लगाकर शिशुओं को दूध पिलाकर मार डालती थी। बाल-कृष्ण ने पूतना का दूध पीते हुए ही उसके प्राण हर लिए, जिससे उसे भी मुक्ति मिली।
इसके पश्चात कंस ने तृणावर्त को आंधी के रूप में, अघासुर व अरिष्टासुर को क्रमशः अजगर व वृषभ के रूप में, तथा कालिय नाग को यमुना में भेजा, किंतु बाल-कृष्ण ने अपनी बाल-लीलाओं से इन सभी दानवों का वध कर दिया। इस प्रकार गोकुल व वृंदावन के निवासी निरंतर भय से मुक्त होते रहे, तथा कृष्ण की महिमा दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई।
अध्याय ५ · मथुरा-गमन एवं कंस का वध
जब कंस के सभी दानव पराजित हो गए, तो उसने कृष्ण व बलराम को छल से मथुरा बुलाया, तथा उन्हें मार्ग में ही समाप्त करने की योजना बनाई। किंतु दोनों भाइयों ने मथुरा के प्रवेश-द्वार पर रखे विशाल धनुष को तोड़ डाला, तथा मदमस्त हाथी कुवलयापीड़ का भी वध कर दिया।
तत्पश्चात कंस ने अपने बलशाली मल्लों चाणूर व मुष्टिक को कृष्ण-बलराम से मल्लयुद्ध हेतु ललकारा। इस युद्ध में कृष्ण ने चाणूर का तथा बलराम ने मुष्टिक का वध कर दिया। यह देख क्रोधित कंस ने कृष्ण व उनके माता-पिता को बंदी बनाने का आदेश दिया, किंतु कृष्ण तत्काल उछलकर कंस के मंच पर जा पहुंचे, तथा उसके केश पकड़कर उसे भूमि पर पटक दिया, जिससे कंस का वध हो गया।
कंस के वध के पश्चात कृष्ण ने अपने माता-पिता देवकी व वसुदेव को कारागार से मुक्त किया, तथा कंस के पिता उग्रसेन को पुनः मथुरा का राज्य सौंपा। इस प्रकार दुष्ट कंस के अत्याचार का अंत हुआ, तथा धर्म की पुनः स्थापना हुई।
अध्याय ६ · व्रत का माहात्म्य
जन्माष्टमी का व्रत भाद्रपद मास की कृष्ण अष्टमी को रखा जाता है, विशेषकर जब अष्टमी तिथि के साथ रोहिणी नक्षत्र भी हो, जिसे जयंती योग कहा जाता है, क्योंकि स्वयं श्रीकृष्ण के जन्म के समय यही संयोग था। इस दिन दिनभर उपवास रखकर, अर्धरात्रि में बाल-कृष्ण का पंचामृत से अभिषेक कर, वस्त्र-श्रृंगार व माखन-मिश्री का भोग अर्पित कर, आरती की जाती है, तथा पूजा के पश्चात ही व्रत का पारण किया जाता है।
मान्यता है कि जो श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करता है, तथा श्रीकृष्ण के जन्म की इस कथा को सुनता या पढ़ता है, उसके समस्त पाप नष्ट होकर उसे सुख, समृद्धि व अंततः भगवान की कृपा प्राप्त होती है।
श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा पाठ विधि
जन्माष्टमी के दिन दिनभर उपवास रखें। अर्धरात्रि में बाल-कृष्ण की प्रतिमा का पंचामृत से अभिषेक कर, वस्त्र-श्रृंगार व माखन-मिश्री का भोग अर्पित करें, तथा आरती करें। इस कथा का श्रवण या पाठ अवश्य करें, और पूजा के पश्चात ही व्रत का पारण करें।
श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा के बारे में
श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा छह अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में नारद द्वारा इंद्र को कंस-वध की भविष्यवाणी सुनाई जाती है। दूसरे व तीसरे अध्याय में श्रीकृष्ण का जन्म, गोकुल-यात्रा तथा शिशु की अदला-बदली की कथा है। चौथे अध्याय में पूतना व अन्य दानवों के वध का वर्णन है, तथा पांचवें अध्याय में मथुरा-गमन व कंस-वध की कथा दी गई है। छठा अध्याय व्रत के माहात्म्य का वर्णन करता है।
यह व्रत भाद्रपद मास की कृष्ण अष्टमी को, अर्धरात्रि में मनाया जाता है। इस पृष्ठ पर सभी अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा का कोई प्राचीन मुद्रित मूल पाठ archive.org पर नहीं मिला, वहां मिले संबंधित स्रोत केवल ऑडियो-वीडियो प्रवचन अथवा हस्तलिखित संस्कृत पूजन-पुस्तिकाएं थीं, जिनमें कोई प्रामाणिक हिंदी कथा-पाठ उपलब्ध नहीं था। अतः यहां दी गई कथा श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कंध में वर्णित श्रीकृष्ण-जन्म व कंस-वध की सुविख्यात पौराणिक कथा पर आधारित है, जो भारत में सर्वाधिक सुपरिचित व सर्वाधिक सुनी जाने वाली कथाओं में से एक है। इसका शब्दांकन मौलिक रूप से किया गया है, ताकि यह किसी एक वेबसाइट या प्रकाशन के पाठ की अविकल प्रतिलिपि न बने।
सामान्य प्रश्न
श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा में कुल कितने अध्याय हैं?
इसमें कुल छह अध्याय हैं, जो एक साथ पूर्ण पाठ के रूप में पढ़े या सुने जाते हैं।
श्रीकृष्ण की आठवीं संतान होने का महत्व क्या है?
जैसा कथा में बताया गया है, एक ज्योतिषी ने कंस को बताया था कि देवकी की आठवीं संतान उसका वध करेगी, इसी भविष्यवाणी के कारण कंस ने देवकी की संतानों को मारना आरंभ किया, और श्रीकृष्ण इसी आठवीं संतान के रूप में जन्मे।
श्रीकृष्ण को गोकुल क्यों ले जाया गया?
जैसा कथा के तीसरे अध्याय में बताया गया है, वसुदेव कंस से शिशु कृष्ण की रक्षा के लिए उन्हें मध्यरात्रि में ही गोकुल में नंद-यशोदा के पास ले गए, तथा उनकी नवजात कन्या को बदले में कारागार ले आए।
कंस का वध कैसे हुआ?
जैसा कथा के पांचवें अध्याय में बताया गया है, कृष्ण ने मथुरा में मल्लयुद्ध की सभा में कंस के मंच पर पहुंचकर उसके केश पकड़कर उसे भूमि पर पटक दिया, जिससे उसका वध हो गया।
