मुख्यकथाश्री सोलह सोमवार व्रत कथा

श्री सोलह सोमवार व्रत कथा

सोलह सोमवार व्रत कथा, जिसे शिव-मानस व्रत कथा भी कहा जाता है, एक शापित पुजारी से आरंभ होकर पार्वती जी, स्वामी कार्तिकेय, एक ब्राह्मण और अंततः एक राजा-रानी तक पहुंचने वाली श्रृंखलाबद्ध कथा है, जो सोलह सोमवार के व्रत के साथ सुनी-सुनाई जाती है और जिसका पूर्ण पाठ यहां उपलब्ध है।

श्री सोलह सोमवार व्रत कथा
अध्याय/

अध्याय · अमरावती में द्यूत-क्रीड़ा और गुरव पुजारी को शाप

एक समय महामुनि श्री सूतजी महाराज शौनकादि मुनियों से कहने लगे कि विदर्भ देश में एक अत्यंत सुंदर अमरावती नाम की नगरी है, वहां देवाधिदेव भगवान श्री महादेव जी का विशाल मंदिर बड़ा ही रमणीक बना है, जिसकी महिमा का वर्णन प्रायः तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। वहां एक समय आशुतोष भगवान श्री शिवजी पार्वती जी के सहित कैलास से घूमते-घूमते एकाएक आ निकले, उस पवित्र मनोहर स्थान को देखकर पार्वती जी ने शिवजी से कहा: 'हे नाथ, यहां चौपड़-पांसा मांडकर खेल खेलना चाहिए।' यह सुन शिवजी ने उसी समय अपने दूतों से चौपड़-पांसे मंगवाकर खेल आरंभ किया, खेल खेलते-खेलते देवी पार्वती जी चौपड़ की बाजी जीत गईं, यह देखकर महादेव जी कहने लगे कि यह बाजी तो मैं जीता हूं। इसके बाद फिर दुबारा खेल खेलना प्रारंभ किया तो फिर भी पार्वती जी जीत गईं।

तब पार्वती जी ने उस शिवालय के गुरव नामक पुजारी से, जो निकट था, पूछा कि अबकी बार यह बाजी किसने जीती है, सत्य-सत्य कहो, मौन क्यों बैठे हो। तब गुरव पुजारी बोला: 'यह बाजी शिवजी ने जीती है।' ऐसा सुन उमा ने क्रुद्ध होकर पुजारी को शाप दिया कि तेरे सारे शरीर में कोढ़ हो जाएगा, इसमें बिलंब बिलकुल ही नहीं लगेगा, क्योंकि तू असत्य बोला है। इस प्रकार गुरव को भयंकर शाप देकर उमा सहित श्री शिवजी कैलासधाम को पधार गए।

अध्याय · अप्सरा से व्रत-विधि और गुरव का रोगमुक्त होना

तदनंतर गुरव पुजारी ने अपना शरीर देखा तो सती के शाप से सारे वदन में कोढ़ ही कोढ़ दिखाई दी, इस महाविकट दुःख के कारण वह चित्त में चिंता करने लगा कि कहां जाऊं, किससे कहूं, क्या उपाय करूं। इस तरह वह गुरव मन-ही-मन व्याकुल हो चिंता कर ही रहा था कि उसी समय स्वर्ग से एक अप्सरा पूजन की सामग्री लेकर पशुपतिनाथ (श्री महादेव जी) का पूजन करने के लिए उस शिवालय में आई, उसने मंदिर में आते ही उस महादुःखी गुरव पुजारी से पूछा कि तुम्हें यह कोढ़ किस प्रकार क्यों हुई है। तब गुरव ने बड़ी ही नम्रता से विनयपूर्वक कहा कि मैं बहुत घबरा रहा हूं और सत्यता पूर्वक कहता हूं कि मुझे श्री पार्वती जी ने शाप दिया है। हे माता, कोई उपाय हो तो कृपया शीघ्र बताओ, इतना कह दुःखी हो गुरव अप्सरा के चरणों में गिर पड़ा।

तब अप्सरा कहने लगी: 'तुम किसी तरह से मत घबराओ, और शुद्ध अंतःकरण एवं श्रद्धा-भक्ति से प्रेमपूर्वक सोलह सोमवार-मनसाव्रत का आचरण करो, इससे तुम्हारा कोढ़ तत्काल ही दूर हो जाएगा।' और उस सुंदरी ने व्रत का माहात्म्य एवं विधि बताई कि हे गुरव, सोमवार के दिन दिनभर निराहार रहना, फिर सायंकाल प्रदोष के समय श्री पार्वती सहित शिवजी का पूजन शास्त्रोक्त विधि-विधान से करें, तथा पंचाक्षर (ॐ नमः शिवाय) इस महामंत्र का यथाशक्ति जाप तथा शिव-कीर्तनादि भी करें। तत्पश्चात् आधा सेर पक्का गेहूं का आटा लेकर बिना नमक के तीन रोट बनाकर अग्नि पर सेककर घी-गुड़ मिलाएं, और चूरमा तैयार कर उसके तीन भाग करें, प्रत्येक में बिल्वपत्र छोड़कर श्रद्धा-भक्ति के साथ भगवान श्री भवानीशंकर को नैवेद्य समर्पित करें, फिर पहला भाग शिवजी की जलाधारी में अर्पित करें, दूसरा भाग ब्रह्मचारी बालकों को ही प्रसाद वितरण करें, और तीसरा भाग व्रतकर्ता स्वयं प्रसाद ग्रहण कर ले। इस प्रकार बिना खंडित किए इस सोलह सोमवार-मनसाव्रत का आचरण प्रेमभाव से करता रहे। जब सत्रहवां सोमवार आए, उस शुभ दिन इस महाव्रत के उद्यापन का विधान कुटुंब-परिवार के साथ विधिपूर्वक यथाशक्ति अवश्य करें।'

इतना कह वह अप्सरा शंकर जी का पूजन करके स्वर्गलोक को चली गई। तदनंतर उस गुरव ने सत्य अंतःकरण और श्रद्धा-भक्ति से यह व्रत धारण किया, व्रत के समाप्त होते ही उस गुरव पुजारी का कोढ़ इस व्रत के प्रभाव से बिलकुल चला गया, तथा पहले का सा शरीर निर्मल एवं स्वच्छ हो गया, धन्य-धन्य है उस सोलह सोमवार-मनसाव्रत को।

अध्याय · पार्वती जी का व्रत और स्वामी कार्तिकेय की वापसी

कुछ दिनों के पश्चात् शिव-पार्वती कैलास से घूमते-घूमते मृत्युलोक में एक दिन फिर उसी शिवालय के पास पधारे, वहां गुरव को पहले दिया हुआ शाप पार्वती जी को स्मरण हो आया, और गुरव को निष्कोढ़ आरोग्य देखकर पार्वती जी ने पूछा: 'हे गुरव, तेरा कोढ़ किस विधि व क्या उपाय करने से चला गया है?' तब गुरव पुजारी हाथ जोड़कर अकुलाता हुआ चरणों में गिरकर बोला: 'हे माता, मैंने कैलासवासी भगवान श्री शंकर जी का ध्यान कर सोलह सोमवार-मनसाव्रत को धारण किया है, उन्हीं भवानीशंकर की पूर्ण कृपा से मेरा संपूर्ण कष्ट निवारण हुआ, उन प्रभु की लीला अनंत और अपरंपार है।' ऐसा कहकर गद्गद हो व्रत की विधि आदि से अंत तक वर्णन करने लगा। इस तरह गुरव पुजारी के मुख से व्रत की विधि और माहात्म्य सुनकर पार्वती जी अति विस्मित हो मन में कहने लगीं कि इस व्रत की महिमा बड़ी ही चमत्कारी है, इसे विधि-विधान सहित प्रेमपूर्वक मैं भी धारण करूंगी, क्योंकि मेरा पुत्र स्वामी कार्तिक मुझसे रुष्ट होकर अकेला ही वन में चला गया है। वापस शीघ्र आने की कामना से पार्वती जी ने व्रत करना प्रारंभ किया, व्रत के समाप्त होते ही वन में रहते हुए स्वामी कार्तिक मन-ही-मन विचार करने लगे कि माता से क्रोध करना ठीक नहीं है, ऐसा निश्चय कर उसी समय वन से वापस आकर माता के चरणों में साष्टांग दंडवत प्रणाम किया, अपने प्रिय पुत्र कार्तिक स्वामी को देख श्री पार्वती जी प्रसन्नता के मारे मन में नहीं समाने लगीं।

इसके बाद स्वामी कार्तिक माता पार्वती जी से बोले: 'मेरा मन तुम्हारे पास एक क्षण भर भी रहना नहीं चाहता था, पर आज एकाएक अंतःकरण में ऐसा भाव उत्पन्न हुआ कि श्री माताजी के शुभ दर्शन शीघ्र ही करना चाहिए, सो हे जननी, इसका क्या कारण है?' यह सुन गिरिजा बोलीं: 'हे श्रेष्ठ पुत्र, मैंने सोलह सोमवार-मनसाव्रत का आचरण किया है, यह सब उसी व्रत का प्रभाव है कि तेरे चित्त में मुझसे मिलने की सद्भावना उत्पन्न हुई।' इस प्रकार कार्तिक स्वामी ने यह वृत्तांत बहुत चित्त लगाकर सुना, और कहा: 'हे मातेश्वरी, यह उत्तम व्रत मैं भी करना चाहता हूं, कृपया इसकी आद्योपांत विधि बतला दीजिए, क्योंकि मेरा एक परमप्रिय ब्राह्मण मित्र देवमित्र है, वह बहुत दिनों से न मालूम कहां चला गया है, मुझे उससे मिलने की बड़ी उत्कंठा है।' तब पार्वती जी ने व्रत की विधि बतला दी। तदनंतर स्वामी कार्तिक ने भी विधिवत सोलह सोमवार-मनसाव्रत हार्दिक भाव से करना आरंभ किया, व्रत के समाप्त होते ही उसी दिन एक सुंदर वन में घूमते-घूमते सहज ही में कार्तिक स्वामी की और उनके परम मित्र ब्राह्मण देवमित्र की अकस्मात भेंट हो गई। दोनों आपस में बड़े प्रेम से मिले, परस्पर कुशल-क्षेम पूछने के बाद ब्राह्मण ने कहा: 'हे मित्र, आपकी व मेरी यह एकाएकी रास्ते में जो भेंट हुई है, यह अत्यंत आश्चर्यजनक है।' तब स्वामी कार्तिक बोले: 'भ्रात, मैंने एक अद्भुत सोलह सोमवार-मनसाव्रत किया है, यह इसी व्रत की महिमा का फल है।' यह सुन वह मित्र मन-ही-मन विस्मित होता हुआ कार्तिक स्वामी से कहने लगा: 'हे सखे, मेरी इच्छा श्रेष्ठ विवाह करने की है, इसलिए कृपया मुझे भी इस व्रत की विधि बतला दें।'

अध्याय · देवमित्र का विवाह और पुत्र-प्राप्ति

यह सुन स्वामी कार्तिक ने अपने परम मित्र ब्राह्मण को पूर्णतया विधि बतला दी। विप्र व्रत को श्रद्धा-भक्ति एवं प्रेमपूर्वक प्रारंभ कर देश-देशांतरों में घूमने लगा। कर्म की गति बड़ी ही विचित्र और गहन होती है, व्रत के पूर्ण होते ही घूमते-घूमते एक दिन ब्राह्मण को मार्ग में एक सुंदर नगर प्राप्त हुआ, वहां की अपूर्व दिव्य शोभा को देखकर विश्राम के लिए वहीं ठहर गया। उस नगर के राजा धर्मधुरंधर थे, उनकी एक कन्या संपूर्ण गुणों से युक्त सुशीला एवं बड़ी ही सुंदरी थी। हे श्रोताओ, उस समय राजा ने उस कन्या का स्वयंवर महोत्सव धूमधाम से रचाया था, वहां अनेक देशों के राजकुमार और अठारह वर्णों के असंख्य जन आकर इकट्ठे हुए थे। उसी स्वयंवर को देखने हेतु वह ब्राह्मण भी जा पहुंचा। वहां राजा ने एक सुंदर हथिनी को सारा शृंगार कराकर, एवं उसकी सूंड में एक जयमाला देकर सभा में छोड़ दिया, वह हथिनी फिरते-फिरते वहां आई जहां वह ब्राह्मण खड़ा था, उसने आते ही ब्राह्मण के गले में जयमाला डाल दी, और उसे अपने सिर पर बैठा लिया। राजा ने यह देख बड़ा आनंद मनाया, और प्रसन्नता के साथ कन्या का विवाह-संस्कार वेदोक्त विधि से कर दिया, एवं अतुल धन-धान्य आभूषणादि सहित उन दोनों के रहने के लिए एक निराला सुंदर भवन भी दे दिया। इस तरह ब्राह्मण सुंदर राजकन्या को पाकर सुख से जीवन व्यतीत करने लगा।

एक दिन वह राजकुमारी अपने पतिदेव (ब्राह्मण) से पूछने लगी: 'हे प्राणनाथ, आपने कौन-सा ऐसा भारी पुण्य किया था, जिसके प्रताप से मैं आपको प्राप्त हुई हूं?' यह सुन वह ब्राह्मण कहने लगा: 'हे प्रिये, मैंने आशुतोष भगवान शंकर का ध्यान लगाकर सोलह सोमवार-मनसाव्रत धारण किया था, उसी महाव्रत के पुण्य से तुम मुझे पत्नी रूप में प्राप्त हुई हो।' यह सुन राजकुमारी आश्चर्य करती हुई कई बार धन्य-धन्य कहकर बोली कि यह व्रत ऐसा फल देने वाला और बड़ा ही चमत्कारी है, इसे मैं भी हार्दिक श्रद्धा-भक्ति से चिरंजीव पुत्र की कामना के लिए आचरण करूंगी। इतना कह उस राजपत्नी ने उक्त व्रत करना प्रारंभ किया, व्रत के पूर्ण होते ही कुछ ही दिनों पश्चात् राजकुमारी को भूतभावन भगवान शंकर की असीम कृपा से सौ वर्ष की उम्र वाला, सुशील, ज्ञानी, पुण्यशील, प्रतापवंत तथा माता-पिता की सेवा करने वाला, आज्ञाकारी, सुंदर पुत्र उत्पन्न हुआ। वे दंपत्ति मन-ही-मन इस शिव महाव्रत की महिमा का वर्णन करते हुए एवं पुत्र को देख-देखकर बड़े ही हर्षित हुए।

अध्याय · पुत्र का राजा बनना और रानी से व्रत-भंग

इस तरह जब उस ब्राह्मण का पुत्र कुछ बड़ा हुआ तो थोड़े ही दिनों में पढ़-लिखकर संपूर्ण ज्ञान से निपुण हो, एक दिन विनयपूर्वक हाथ जोड़कर माता से प्रश्न करने लगा: 'हे जननी, मैं सकल गुण-संपन्न तुम्हें किस पुण्य-तप के प्रताप से प्राप्त हुआ?' यह सुन माता ने उत्तर दिया: 'हे धर्मशील पुत्र, मैंने उत्तम शिव-व्रत (सोलह सोमवार-मनसाव्रत) भक्तिपूर्वक एकाग्र मन से धारण किया है, जिससे त्रिशूलपाणि (महादेव जी) ने प्रसन्न होकर हमारी मनोकामना पूर्ण की।' ऐसा सुन उस पुत्र ने नम्रता से फिर पूछा: 'हे माताजी, कृपया इस परम श्रेष्ठ व्रत की विधि मुझे भी बतला दीजिए, मैं भी इस व्रत को शुद्ध अंतःकरण से अवश्य धारण करूंगा, क्योंकि मेरी इच्छा दुःखों से रहित होकर विशाल राज्य प्राप्त करने की है।' तब माता ने उक्त महाव्रत की विधि आद्योपांत अपने प्रिय पुत्र को बतला दी, फिर ब्राह्मण के पुत्र ने इस व्रत को यथाविधि करना प्रारंभ किया। व्रत पूर्ण भी होने नहीं पाया था कि एक विशाल देश के राजा जिनकी बिलकुल वृद्धावस्था प्राप्त हो गई थी, और जिनके कोई पुत्र नहीं था, केवल एक कन्या-संतान ही थी, उस समय राजा ने सारे राज्य भर में यह घोषणा कर दी कि मैं राज्य सहित अपनी कन्या स्वयंवर द्वारा प्रदान करूंगा। यह सुन विप्रकुमार भी गया, और स्वयंवर में कैलासवासी भगवान शंकर की कृपा से उस राजकन्या ने सर्वगुण-संपन्न उस ब्राह्मण-पुत्र को चुन लिया, एवं नृपति श्रेष्ठ ने वेदोक्त विधि से कन्या का विवाह-संस्कार महोत्सव के साथ कर दिया, तथा राज्य के संपूर्ण अधिकार राज्य सहित देकर आप वन में तप करने के लिए चले गए।

इधर ब्राह्मण (अब राजा) व्रत के प्रभाव से अपनी धर्मपत्नी रानी के साथ अनेकों सुख भोगते हुए नीतिपूर्वक राज्य कर रहे थे, उसी समय जब व्रत पूर्ण होने में आया, और सत्रहवां सोमवार आकर प्राप्त हुआ, उस शुभ दिन राजा ने अपनी प्रियतमा रानी से सब सामग्री लेकर एवं पांच सेर गेहूं के आटे का चूरमा बनाकर, और उसके बराबर तीन भाग करके भगवान शंकर जी के मंदिर चलने के लिए कहा, तब रानी ने मन-ही-मन विचार किया कि राजा ऐसी कृपणता क्यों कर रहे हैं, पांच सेर रुपयों की थाली भरकर शिवालय में क्यों नहीं पधारते, ऐसा पूर्ण निश्चय कर रानी ने पांच सेर रुपया थाली में भरकर अन्य सामग्री के सहित दास-दासियों के साथ मंदिर में पहुंचा दिए, और रानी पतिदेव के साथ शिव-पूजन के लिए नहीं गई। अतएव यह व्रत भंग हो गया, और भगवान शिव उसी समय क्रोधित हो यति (दंडी साधु) का रूप धारण कर राजा (विप्र) के पास आकर बोले: 'हे राजन, तेरी रानी ने शिव-व्रत भंग कर दिया है, इसलिए इसे राज-महल से शीघ्र ही बाहर निकाल दे, नहीं तो तेरा सारा राज्य नष्ट-भ्रष्ट होकर भयंकर अनर्थ को प्राप्त हो जाएगा।' इस प्रकार यतिरूप शिवजी राजा से ऐसी बात कर ही रहे थे कि बीच में प्राचीन प्रधान मंत्रीगण बोल उठे कि यह राज्य इस रानी के पिता का दिया हुआ है, अतः रानी को निकालना बिलकुल अनुचित है। तब शिवजी फिर महाक्रोध करके कहने लगे: 'हे मूढ़ प्रधानो, जिसने भगवान शंकर का व्रत भंग कर दिया है, अब उसे घर में रखना ठीक नहीं है।' तब राजा ने दोनों तरफ का विचार कर उसी समय रानी को राज-महल से बाहर निकाल दिया, रानी बड़ी दीन-दुःखी होकर अत्यंत शोक के साथ वहां से पांव-पैदल ही चल पड़ी।

अध्याय · रानी का वनवास और व्रत की पुनः सिद्धि

चलते-चलते बहुत दूर जाकर एक गांव दिखाई दिया, रानी उस ग्राम में जाकर एक वृद्धा के घर रहने लगी। वृद्धा रानी को देख प्रसन्न हुई और बोली कि एक कार्य तुझे सौंपती हूं, यह रुई के फोले हैं, इन्हें बाजार में ले जाकर बेच आ, यह बात बुढ़िया की सुन रानी हर्षित हो रुई के फोले लेकर बाजार में बेचने गई, परंतु वहां भगवान शंकर जी के प्रकोप से उसी समय ऐसी भयंकर आंधी चली जिससे रुई के फोले सब उड़ गए। तब रानी ने आकर बुढ़िया से कहा: 'हे माता, वे रुई के फोले तो अद्भुत पवन के चलने से सब ही उड़ गए।' उस वृद्धा ने आश्चर्ययुक्त यह वचन सुनकर रानी से कहा: 'अब तू मेरे घर से शीघ्र चली जा।' तब रानी वहां से निकलकर एक तेली के घर रहने लगी, उस तेली के यहां तेल के भरे हुए घड़े रखे थे, रानी की दृष्टि जब तेल पर पड़ी तो शिवजी के महाकोप से तत्काल ही सब घड़ों का तेल उड़ गया, तेली यह देखकर विस्मित हो कहने लगा कि यह दीना स्त्री मेरे घर में रहती है, तेल के भरे घड़ों को इसके देखते ही सब का सब तेल उड़ गया है, अतः रानी से बोला: 'कृपया मेरे घर से बाहर निकल जाइए, और अन्यत्र कहीं भी जाकर रहिए, यदि तुम मेरे यहां रहोगी तो मैं अवश्य भिक्षुक हो जाऊंगा।' ऐसा कह तेली ने भी रानी को अपने घर से बाहर निकाल दिया। रानी वहां से चलते-चलते एक नदी के तट पर पहुंची, वहां उसकी दृष्टि पड़ते ही उस नदी का सारा पानी तुरंत सूख गया, तब रानी मन में बड़ा आश्चर्य करती हुई विचार करने लगी कि यह सब मेरे ही महापापों का फल है।

तदनंतर वह रानी नाना तरह के महासंकट उठाती हुई एवं मारे-मारे चारों ओर वन-वन घूमने लगी, फिरते-फिरते अकस्मात एक सुंदर निर्मल जल से भरा सरोवर देखा, रानी उस तालाब के समीप आई और जल के ऊपर उसकी दृष्टि डालते ही पानी में असंख्य कीड़े पड़ गए, यह देख वह और अधिक व्याकुल होने लगी, उसी समय वहां ग्वालबाल गायों और बछड़ों को चराते हुए पानी पिलाने के लिए आए हुए थे, उन्होंने भी उस जल के भीतर असंख्य कीड़े पड़े हुए देखे तो आपस में कहने लगे कि यह पानी नहीं पिलाना चाहिए, ऐसा कहकर खाली ही चले गए। इतने में ही वहां जल लेने के लिए एक तपस्वी गुसाईं महाराज भी आए, और उन्होंने भी यह चरित्र देखा तो उन्हें रानी की दशा पर बड़ी दया आई, फिर कहीं अन्यत्र पानी भरकर एवं उस रानी को साथ ले अपने आश्रम पर आए। गुसाईं जी ने रानी से कहा: 'बेटी, तू मेरी कन्या के समान है, तेरे लिए अन्न-वस्त्र की कोई कमी नहीं है, तू यहां स्थिर चित्त से रह।' यह बात सुन वह रानी उन महात्मा गुसाईं जी के आश्रम में रहने लगी, वह आश्रम का समस्त कार्य करती थी, परंतु शिव-व्रत भंग करने से अनेकों दुःख उठाती हुई खाने-पीने की जितनी वस्तुओं को स्पर्श करती, उतनी ही चीज़ों में कीड़े पड़ जाते थे। यह देख गुसाईं जी अत्यंत चिंतातुर हो आश्चर्य करने लगे, और विचार करने लगे कि अब क्या यत्न करना चाहिए, इस निराश्रित दीन-दुःखिया अबला पर क्या दोष लगा है, कोई ऐसा उपाय शीघ्र करना चाहिए, जिससे इसके सब दोषादि संकट निवृत्त हो जाएं। इस प्रकार पूर्ण निश्चय कर गुसाईं महाराज ने उसी समय भगवान शंकर का उग्र तप करना प्रारंभ कर दिया, उससे कुछ ही समय में भोलेनाथ प्रसन्न हुए, और प्रत्यक्ष रूप में प्रकट होकर बोले: 'जो तेरे अंतःकरण में हो, वर मांग।' तब गुसाईं जी चरणों में गिरकर हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगे: 'भगवन, इस भाग्यहीना अबला पर क्या दोष है, और उससे यह कैसे छुटकारा पा सकेगी, प्रभो, कृपाकर यह मुझे बतलाइए।' तब दीनदयाल भगवान शिव ने कहा: 'हे तपस्विन, इस रानी ने मेरे सोलह सोमवार-मनसाव्रत को भंग कर दिया है, अतः इसी महादोष से इसे अनेकों संकट प्राप्त होकर ऐसी महाविकट दशा प्राप्त हुई है, यह रानी हार्दिक भाव-भक्ति से इस मेरे परमप्रिय सोलह सोमवार-मनसाव्रत को यथाविधि अखंड आचरण करे तो हे महात्मन, व्रत समाप्त होने पर ही यह संपूर्ण दोषों एवं दुःखों से छूट जाएगी, तथा स्वयं इसका पति यहां आकर शीघ्र ही इसे ले जाएगा, और पहले की तरह अतुल सुख और सौख्य प्राप्त करेगी।' हे श्रोताओ, महादेव जी ऐसा वरदान देकर कैलासधाम को अंतर्ध्यान हो गए।

तदनंतर श्री गुसाईं महाराज ने उस रानी से इस सोलह सोमवार-मनसाव्रत को विधिवत अखंड श्रद्धा-भक्तिपूर्वक धारण करवाया, उक्त महाव्रत के पूर्ण होते ही रानी के सारे संकट दूर हो गए। इस व्रत के प्रताप से उधर कई दिनों में राजा एक दिन अपने मन में विचार करने लगे कि रानी की खोज कहीं कराना चाहिए, ऐसा निश्चय करते ही तुरंत दूतों को बुलाकर रानी को ढूंढ़ने के लिए चारों ओर देश-देशांतरों में भेज दिया। दूत ढूंढ़ते-ढूंढ़ते वहां आ निकले जहां रानी श्री गुसाईं जी के आश्रम पर रहती थी, रानी की व दूतों की परस्पर पहचान हुई, फिर दूतों ने जाकर रानी का संपूर्ण शुभ वृत्तांत राजा को आद्योपांत कह सुनाया। दूतों से यह संवाद सुन राजा बहुत ही प्रसन्न हो, प्रधान मंत्री सहित उस वन में आकर गुसाईं जी महाराज से मिले, और रानी को अपने साथ ले चलने को तैयार हुए। उस समय राजा ने गुसाईं जी को वस्त्रादि भेंट कर नम्रता से प्रार्थना कर क्षमा-याचना की। तब गुसाईं जी ने राजा से कहा: 'राजन, मैंने आजतक इस रानी को अपनी कन्या के समान रखकर पालन किया था, अब आप इसका पालन करना।' इतना कह प्रेमाश्रु ढलकाकर गद्गद हुए, उस समय राजा-रानी ने श्री गुसाईं जी महाराज के चरणों में साष्टांग नमस्कार कर, एवं मधुर वाक्यों से उनका समाधान कर, रानी सहित रथ में बैठकर अपने नगर में आए, और चारों ओर नगर में आनंद-महोत्सव की बधाई घर-घर पर होने लगी। राजा-रानी के आते ही राजभवन में अनेक तरह के बाजे बजने लगे, व मंगल नृत्य-गान होने लगे, इस प्रकार का महोत्सव राजा ने बड़ी प्रसन्नता पूर्वक किया, और उसी समय ब्राह्मणों को भोजन, दान-दक्षिणा एवं अतिथि-याचकों को मनचाहा नाना प्रकार का दान, धन-धान्य के सहित देकर प्रसन्न किया। इस तरह राजा-रानी की भेंट होने से सब प्रजा को बड़ा हर्ष हुआ, और राजा निष्कंटक धर्म व नीतिपूर्वक राज्य करने लगा।

सूतजी महाराज इस प्रकार शौनकादि मुनियों को कथा सुनाते हुए कहने लगे कि इस सोलह सोमवार-मनसाव्रत को पृथ्वी पर कोई भी जन श्रद्धा-भक्ति एवं यथाविधि से आचरण करेगा, उस पर आशुतोष भगवान श्री शिवजी शीघ्र ही प्रसन्न होकर उसके जन्म-जन्मांतरों के समस्त पाप, दोष, दारिद्र्य, रोग, व सब संकटादि को निवारण करेंगे, तथा जो कोई मनोकामनार्थ आदर सहित व्रत को पूर्ण करेगा उसकी समस्त मनोकामना सफल होगी, यह बिलकुल ही सत्य है। हे श्रोताओ, इस शिव महाव्रत को हार्दिक भाव से अखंड धारण करने पर अतुल धन-धान्य, पुत्र-पौत्र, कन्या, यश, आरोग्य एवं आयु की वृद्धि होकर इस लोक में अनेकानेक सुख प्राप्त कर अंत में परमपद (शिवलोक) प्राप्त होता है, तथा इस कथा को जो कोई श्रद्धापूर्वक एकाग्र मन से सुनेगा अथवा सुनाएगा, उस पर श्री उमा-महेश सदा प्रसन्न रहेंगे।

श्री सोलह सोमवार व्रत कथा पाठ विधि

यह व्रत श्रावण, चैत्र, वैशाख, कार्तिक या मार्गशीर्ष मास के प्रथम सोमवार से आरंभ करें। हर सोमवार दिनभर निराहार रहकर सायंकाल प्रदोष के समय शिव-पार्वती का पूजन करें, पंचाक्षर मंत्र (ॐ नमः शिवाय) का जाप करें, और बिना नमक के गेहूं के आटे का चूरमा बनाकर उसके तीन भाग करके शिवजी को, ब्रह्मचारी बालकों को, और स्वयं को अर्पित करें। सोलह सोमवार पूर्ण होने पर सत्रहवें सोमवार को विधिपूर्वक उद्यापन करें, और इस दिन स्वयं उपस्थित होकर पूजन करें, अन्यथा व्रत भंग माना जाता है।

पाठ दिवस
सोलह सोमवार
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शिव चालीसा
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श्री सोलह सोमवार व्रत कथा के बारे में

सोलह सोमवार व्रत कथा एक शृंखलाबद्ध कथा है, जो छह अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में अमरावती के शिव मंदिर में शिव-पार्वती की द्यूत-क्रीड़ा के दौरान झूठ बोलने पर पुजारी गुरव को कोढ़ का शाप मिलता है। दूसरे अध्याय में एक अप्सरा गुरव को सोलह सोमवार-मनसाव्रत की विधि बताती है, जिससे वह रोगमुक्त हो जाता है। तीसरे अध्याय में पार्वती जी स्वयं यह व्रत कर अपने रुष्ट पुत्र स्वामी कार्तिकेय को वापस बुलाती हैं, और कार्तिकेय व्रत करके अपने मित्र ब्राह्मण देवमित्र से मिलते हैं। चौथे अध्याय में देवमित्र व्रत करके एक राजकुमारी से विवाह करते हैं और उन्हें एक पुत्र प्राप्त होता है। पांचवें अध्याय में वह पुत्र व्रत करके राजा बनता है, परंतु सत्रहवें सोमवार को उसकी रानी व्रत भंग कर देती है। छठे अध्याय में रानी वनवास सहकर पुनः व्रत पूर्ण करती है, और राजा से मिलन होता है।

यह व्रत विशेष रूप से सोलह सोमवार तक निरंतर किया जाता है, और सत्रहवें सोमवार को इसका उद्यापन होता है। इस पृष्ठ पर छहों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।

रचनाकार
संग्रहकर्ता: पं० सिद्धनाथ शर्मा शास्त्री
पौराणिक कथा-परंपरा (भविष्य पुराण से संबद्ध)

संग्रहकर्ता: पं० सिद्धनाथ शर्मा शास्त्री के बारे में

सोलह सोमवार व्रत कथा, जिसे शिव-मानस व्रत कथा भी कहा जाता है, सूतजी द्वारा शौनकादि मुनियों को सुनाई गई कथा के रूप में प्रचलित है, और परंपरागत रूप से भविष्य पुराण से संबद्ध मानी जाती है। यहां प्रस्तुत पाठ मुंबई के प्रतिष्ठित प्रकाशक खेमराज श्रीकृष्णदास (श्री वेंकटेश्वर प्रेस) द्वारा प्रकाशित, पं० सिद्धनाथ शर्मा शास्त्री द्वारा संग्रहीत हिंदी पुस्तिका 'सोलहसोमवार-व्रतकथा अर्थात् शिवमानसव्रत-कथा' का यथावत रूपांतरण है, जिसमें केवल स्पष्ट मुद्रण-त्रुटियां सुधारी गई हैं, कथा में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। पुस्तिका के आरंभ में दिए गए शिव-स्तोत्र व मंत्रों को यहां सम्मिलित नहीं किया गया है, केवल कथा-भाग का अनुवाद प्रस्तुत है। अन्य मुद्रित संस्करणों में शब्दों का हेरफेर मिल सकता है।

सामान्य प्रश्न

सोलह सोमवार व्रत कथा में कुल कितने अध्याय हैं?

इसमें कुल छह अध्याय हैं, जो एक साथ पूर्ण पाठ के रूप में पढ़े या सुने जाते हैं।

सोलह सोमवार व्रत कितने समय तक चलता है?

यह व्रत लगातार सोलह सोमवार तक चलता है, और सत्रहवें सोमवार को इसका उद्यापन किया जाता है।

क्या सोलह सोमवार व्रत कथा और सोमवार व्रत कथा एक ही हैं?

नहीं, ये दो अलग-अलग कथाएं हैं। साधारण साप्ताहिक सोमवार व्रत की कथा अलग है और 'सोमवार व्रत कथा' पृष्ठ पर उपलब्ध है, जबकि यह सोलह सोमवार के लिए विशेष रूप से प्रचलित एक अलग, सुदीर्घ शृंखलाबद्ध कथा है।

कथा में रानी को राज्य से क्यों निकाला गया?

जैसा कथा के पांचवें अध्याय में बताया गया है, सत्रहवें सोमवार के उद्यापन पर रानी स्वयं मंदिर न जाकर केवल सामग्री भिजवा देती हैं, जिससे व्रत भंग हो जाता है, और भगवान शिव यति का रूप धारण कर राजा को उसे राज्य से निकालने का आदेश देते हैं।

सोलह सोमवार व्रत के उद्यापन में क्या करना चाहिए?

जैसा पूजा-विधि में बताया गया है, सत्रहवें सोमवार को पांच सेर गेहूं के आटे का चूरमा बनाकर, विधिपूर्वक शिवजी की पूजा-हवन कर, स्वयं उपस्थित होकर उद्यापन करना चाहिए।

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पाठ विवरण

रचनाकारसंग्रहकर्ता: पं० सिद्धनाथ शर्मा शास्त्री
संरचना६ अध्याय
पाठ समय१७ मिनट