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श्री कृष्ण चालीसा

श्री कृष्ण चालीसा भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति में रचित चालीसा है, जिसका पूर्ण पाठ यहां अर्थ सहित उपलब्ध है।

श्री कृष्ण चालीसा
चौपाई/४०

पाठ विवरण

रचनाकारअज्ञात
संरचना३ दोहे · ४० चौपाई
पाठ समय८ मिनट
दोहा

बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम।
अरुण अधर जनु बिम्बा फल, पिताम्बर शुभ साज॥

जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥

चौपाई

जय यदुनन्दन जय जगवन्दन।
जय वसुदेव देवकी नन्दन॥

जय यशुदा सुत नन्द दुलारे।
जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥

जय नट-नागर नाग नथैया।
कृष्ण कन्हैया धेनु चरैया॥

पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो।
आओ दीनन कष्ट निवारो॥

वंशी मधुर अधर धरी तेरी।
होवे पूर्ण मनोरथ मेरो॥

आओ हरि पुनि माखन चाखो।
आज लाज भारत की राखो॥

गोल कपोल, चिबुक अरुणारे।
मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥

रंजित राजिव नयन विशाला।
मोर मुकुट वैजयंती माला॥

कुण्डल श्रवण पीतपट आछे।
कटि किंकणी काछन काछे॥

नील जलज सुन्दर तनु सोहे।
छवि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥

मस्तक तिलक, अलक घुंघराले।
आओ कृष्ण बाँसुरी वाले॥

करि पय पान, पुतनहि तारयो।
अका बका कागासुर मारयो॥

मधुवन जलत अग्नि जब ज्वाला।
भै शीतल, लखितहिं नन्दलाला॥

सुरपति जब ब्रज चढ़यो रिसाई।
मसूर धार वारि वर्षाई॥

लगत-लगत ब्रज चहन बहायो।
गोवर्धन नखधारि बचायो॥

लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई।
मुख महं चौदह भुवन दिखाई॥

दुष्ट कंस अति उधम मचायो।
कोटि कमल जब फूल मंगायो॥

नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें।
चरणचिन्ह दै निर्भय किन्हें॥

करि गोपिन संग रास विलासा।
सबकी पूरण करी अभिलाषा॥

केतिक महा असुर संहारयो।
कंसहि केस पकड़ि दै मारयो॥

मात-पिता की बन्दि छुड़ाई।
उग्रसेन कहं राज दिलाई॥

महि से मृतक छहों सुत लायो।
मातु देवकी शोक मिटायो॥

भौमासुर मुर दैत्य संहारी।
लाये षट दश सहसकुमारी॥

दै भिन्हीं तृण चीर सहारा।
जरासिंधु राक्षस कहं मारा॥

असुर बकासुर आदिक मारयो।
भक्तन के तब कष्ट निवारियो॥

दीन सुदामा के दुःख टारयो।
तंदुल तीन मूंठ मुख डारयो॥

प्रेम के साग विदुर घर मांगे।
दुर्योधन के मेवा त्यागे॥

लखि प्रेम की महिमा भारी।
ऐसे श्याम दीन हितकारी॥

भारत के पारथ रथ हांके।
लिए चक्र कर नहिं बल ताके॥

निज गीता के ज्ञान सुनाये।
भक्तन हृदय सुधा वर्षाये॥

मीरा थी ऐसी मतवाली।
विष पी गई बजाकर ताली॥

राना भेजा सांप पिटारी।
शालिग्राम बने बनवारी॥

निज माया तुम विधिहिं दिखायो।
उर ते संशय सकल मिटायो॥

तब शत निन्दा करी तत्काला।
जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥

जबहिं द्रौपदी टेर लगाई।
दीनानाथ लाज अब जाई॥

तुरतहिं वसन बने नन्दलाला।
बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥

अस नाथ के नाथ कन्हैया।
डूबत भंवर बचावत नैया॥

सुन्दरदास आस उर धारी।
दयादृष्टि कीजै बनवारी॥

नाथ सकल मम कुमति निवारो।
क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥

खोलो पट अब दर्शन दीजै।
बोलो कृष्ण कन्हैया की जै॥

अंतिम दोहा

यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि।
अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥

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श्री कृष्ण चालीसा पाठ विधि

बुधवार को अथवा जन्माष्टमी के दिन स्नान के पश्चात दीप जलाकर पाठ करें। पूर्ण पाठ के अंत में समापन दोहा अवश्य दोहराएँ।

पाठ दिवस
बुधवार एवं जन्माष्टमी
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श्री कृष्ण आरती
आरती · ४ मिनट
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श्री कृष्ण चालीसा के बारे में

श्री कृष्ण चालीसा भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति में रचित चालीसा है, जिसमें उनके बाल-लीलाओं से लेकर महाभारत तक की प्रमुख घटनाओं का वर्णन है। रचना दो दोहों से आरंभ होकर चालीस चौपाइयों में आगे बढ़ती है और एक दोहे के साथ समाप्त होती है।

इस पृष्ठ पर पूरा पाठ शुद्ध देवनागरी में, प्रत्येक चौपाई के सरल हिंदी अर्थ के साथ दिया गया है। अक्षरों का आकार बढ़ाया जा सकता है, और पूरा पाठ प्रिंट भी किया जा सकता है।

श्री कृष्ण चालीसा में कोई रचयिता स्वयं नामित नहीं है, इस कारण इसे अज्ञात रचनाकार की परंपरागत रचना माना जाता है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण के बाल-रूप, उनकी लीलाओं, पूतना-वध, गोवर्धन-धारण, कालिया-दमन, कंस-वध, तथा महाभारत के प्रसंगों, गीता-उपदेश, द्रौपदी-चीर, सुदामा व मीराबाई की भक्ति, का वर्णन है। यह चालीसा विशेष रूप से बुधवार व जन्माष्टमी के दिन भक्तों द्वारा पढ़ी जाती है।

कृष्ण चालीसा पाठ के लाभ

मान्यता है कि नियमित पाठ से भक्तों के संकट व दरिद्रता दूर होती है, हृदय में ज्ञान व भक्ति की वृद्धि होती है तथा कठिन समय में श्रीकृष्ण की विशेष कृपा व रक्षा प्राप्त होती है, जैसा सुदामा और द्रौपदी की कथाओं में वर्णित है।

रचनाकार
अज्ञात
पारंपरिक रचना

सामान्य प्रश्न

श्री कृष्ण चालीसा की रचना किसने की?

चालीसा में कोई रचयिता स्वयं नामित नहीं है, इसलिए इसे अज्ञात रचनाकार की परंपरागत रचना माना जाता है।

कृष्ण चालीसा पढ़ने के क्या लाभ हैं?

मान्यता है कि नियमित पाठ से भक्तों के संकट व दरिद्रता दूर होती है, हृदय में ज्ञान व भक्ति की वृद्धि होती है तथा कठिन समय में श्रीकृष्ण की विशेष कृपा व रक्षा प्राप्त होती है, जैसा सुदामा और द्रौपदी की कथाओं में वर्णित है।

इसमें कुल कितनी चौपाई हैं?

दो आरंभिक दोहे, चालीस चौपाई और एक समापन दोहा है।

पाठ का उत्तम समय क्या है?

बुधवार को अथवा जन्माष्टमी के दिन, स्नान के पश्चात दीप जलाकर पढ़ना उत्तम माना जाता है।

क्या अर्थ जानना आवश्यक है?

आवश्यक नहीं, परंतु अर्थ सहित पाठ करने से भाव स्पष्ट होता है। इस पृष्ठ पर प्रत्येक चौपाई का सरल अर्थ साथ में दिया गया है।

क्या इसे बिना स्नान पढ़ा जा सकता है?

हाथ-मुँह धोकर स्वच्छ स्थान पर बैठकर पाठ किया जा सकता है। भाव और स्वच्छता दोनों का महत्व है।

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