मुख्यत्योहारकरवा चौथ
सुहाग का व्रत · कार्तिक कृष्ण चतुर्थी

करवा चौथ

करवा चौथ कार्तिक मास की कृष्ण चतुर्थी को विवाहित स्त्रियों द्वारा रखा जाने वाला निर्जला व्रत है, जो पति की दीर्घायु व सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से किया जाता है।

करवा चौथ
अगली तिथि
२९ अक्टूबर २०२६

व्रत का पारण चंद्रोदय के पश्चात ही किया जाता है, तथा चंद्रोदय का समय शहर व वर्ष अनुसार बदलता है, इसलिए सटीक समय हेतु नज़दीकी पंचांग देखें।

करवा चौथ का महत्व

'करवा' का अर्थ है मिट्टी का पात्र, जिसमें जल भरकर पूजा की जाती है, तथा 'चौथ' चतुर्थी तिथि को दर्शाता है। इस दिन विवाहित स्त्रियां प्रातः सूर्योदय से पूर्व सरगी ग्रहण कर, दिनभर बिना जल ग्रहण किए व्रत रखती हैं, तथा रात्रि को चंद्रमा के दर्शन के पश्चात ही अन्न-जल ग्रहण करती हैं।

पौराणिक कथाओं में इस व्रत को करवा नामक एक पतिव्रता स्त्री की कथा से जोड़ा जाता है, जिसने अपने पति की मगरमच्छ से रक्षा हेतु यमराज को चुनौती दी थी। एक अन्य प्रचलित कथा में रानी वीरवती की कथा वर्णित है, जिसने भाइयों के छल से व्रत तोड़ दिया था, परंतु बाद में सच्चे मन से पुनः व्रत रखकर पति को पुनर्जीवित कर लिया।

करवा चौथ व्रत कथा
कथा · साहूकार-कन्या की कथा

यह व्रत उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब, राजस्थान, हरियाणा व उत्तर प्रदेश में विशेष लोकप्रिय है, तथा भगवान शिव, मां पार्वती, कार्तिकेय व गणेश जी सहित चंद्र देव की पूजा की जाती है।

करवा चौथ कैसे मनाई जाती है

व्रत की सुबह सूर्योदय से पूर्व सास द्वारा दी गई 'सरगी', फल, मेवे व मिठाइयों से युक्त थाली, ग्रहण की जाती है। इसके पश्चात दिनभर बिना जल ग्रहण किए निर्जला व्रत रखा जाता है।

संध्या समय स्त्रियां सोलह श्रृंगार कर एकत्रित होती हैं, करवा चौथ की कथा सुनती हैं, तथा एक-दूसरे की थाली से करवा व दीपक का आदान-प्रदान करती हैं।

रात्रि को चंद्रोदय के पश्चात छलनी से पहले चंद्रमा को, फिर उसी छलनी से पति का मुख देखकर, पति के हाथों जल ग्रहण कर व्रत का पारण किया जाता है।

शिव आरती
आरती · संध्या पूजन में गाई जाने वाली आरती

करवा चौथ पूजा विधि

सूर्योदय से पूर्व सरगी ग्रहण कर व्रत आरंभ करें। संध्या समय सोलह श्रृंगार कर भगवान शिव, मां पार्वती, कार्तिकेय व गणेश जी की पूजा करें तथा करवा चौथ की कथा सुनें। चंद्रोदय के पश्चात छलनी से चंद्रमा व पति का मुख देखकर, पति के हाथों जल ग्रहण कर व्रत का पारण करें।

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करवा चौथ के बारे में

करवा चौथ कार्तिक मास की कृष्ण चतुर्थी को विवाहित स्त्रियों द्वारा रखा जाने वाला निर्जला व्रत है, जो पति की दीर्घायु की कामना से किया जाता है। इस पृष्ठ पर इस व्रत का महत्व, करवा व रानी वीरवती की कथाएं, तथा व्रत-विधि की जानकारी दी गई है।

इस पृष्ठ की जानकारी बड़े अक्षरों व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।

सामान्य प्रश्न

करवा चौथ कब मनाई जाती है?

करवा चौथ प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास की कृष्ण चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है, जो सामान्यतः अक्टूबर-नवंबर में आती है।

सरगी क्या है?

सरगी सास द्वारा अपनी बहू को व्रत आरंभ करने से पूर्व, सूर्योदय से पहले दी जाने वाली फल, मेवे व मिठाइयों से भरी थाली है।

छलनी से चांद क्यों देखा जाता है?

छलनी से पहले चंद्रमा को, फिर पति के मुख को देखने की परंपरा है, जिसे व्रत की पूर्णता व पति के दीर्घायु होने के शुभ संकेत के रूप में देखा जाता है।

क्या करवा चौथ केवल विवाहित स्त्रियां रखती हैं?

परंपरागत रूप से यह व्रत विवाहित स्त्रियां रखती हैं, हालांकि आधुनिक समय में कुछ अविवाहित युवतियां भी भावी पति की कामना से यह व्रत रखती हैं।

संबंधित खोज

मुख्य जानकारी

देवतामां पार्वती, चंद्र देव
तिथिकार्तिक कृष्ण चतुर्थी
विशेष अनुष्ठानछलनी से चंद्र दर्शन, करवा पूजन
व्रत प्रकारनिर्जला व्रत, चंद्रोदय पर पारण
प्रातःकालीन भोजनसरगी (सास द्वारा दी जाती है)