अध्याय १ · हिरण्यकशिपु का अत्याचार व प्रह्लाद की भक्ति
दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने अपने भाई हिरण्याक्ष की भगवान विष्णु के वराह अवतार द्वारा मृत्यु से क्रोधित होकर ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की, तथा यह वरदान मांगा कि उसकी मृत्यु न मनुष्य से हो न पशु से, न दिन में हो न रात्रि में, न घर के भीतर हो न बाहर, न धरती पर हो न आकाश में, तथा न किसी अस्त्र से हो न शस्त्र से। इस वरदान के कारण वह स्वयं को अमर समझने लगा, तथा तीनों लोकों पर आतंक मचाकर स्वयं को ही भगवान घोषित करा दिया।
किंतु हिरण्यकशिपु का अपना पुत्र प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का परम भक्त था। पिता के लाख समझाने, धमकाने व यातनाएं देने पर भी प्रह्लाद 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जाप करना नहीं छोड़ता था। क्रोधित हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को विष देने, हाथियों के पैरों तले कुचलवाने, सर्पों से डसवाने तथा पर्वत से गिरवाने के अनेक प्रयास किए, किंतु प्रत्येक बार भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सकुशल बच निकला।
विष्णु चालीसा पढ़ें →अध्याय २ · होलिका का दहन
जब कोई भी उपाय प्रह्लाद को मारने में सफल न हुआ, तो हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका की सहायता ली, जिसे ब्रह्मा जी से एक ऐसा वस्त्र (ओढ़नी) प्राप्त था, जिसे धारण कर वह अग्नि में भी न जले। होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर एक प्रज्वलित चिता पर बैठ गई, यह सोचकर कि वस्त्र उसकी रक्षा करेगा तथा प्रह्लाद जलकर भस्म हो जाएगा।
किंतु जैसे ही चिता प्रज्वलित हुई, वह दिव्य वस्त्र होलिका के शरीर से उड़कर प्रह्लाद के ऊपर आ गया, क्योंकि वह वस्त्र केवल अकेले धारण करने पर ही रक्षा करता था, न कि किसी और की हानि हेतु प्रयुक्त करने पर। इस प्रकार भगवद्भक्त प्रह्लाद पूर्णतः सुरक्षित रहा, जबकि होलिका स्वयं उसी अग्नि में जलकर भस्म हो गई। इसी घटना की स्मृति में प्रतिवर्ष फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन मनाया जाता है।
अध्याय ३ · नृसिंह अवतार व हिरण्यकशिपु का वध
होलिका की मृत्यु के पश्चात भी हिरण्यकशिपु का क्रोध शांत न हुआ। एक दिन उसने प्रह्लाद से पूछा, 'तेरा भगवान इस खंभे में भी है क्या?' प्रह्लाद ने निर्भीक होकर उत्तर दिया, 'हां पिताजी, वे कण-कण में विद्यमान हैं।' यह सुनकर क्रोधित हिरण्यकशिपु ने अपनी गदा से उसी खंभे पर प्रहार किया।
खंभा फटते ही उसमें से भगवान विष्णु ने नृसिंह (आधा मनुष्य, आधा सिंह) रूप में प्रकट होकर हिरण्यकशिपु को अपनी गोद में उठा लिया, तथा संध्याकाल की देहरी पर (न दिन न रात्रि, न घर के भीतर न बाहर, न धरती पर न आकाश में) अपने नाखूनों से (न किसी अस्त्र से) उसका वध कर दिया, इस प्रकार ब्रह्मा जी के वरदान की एक भी शर्त भंग किए बिना अधर्मी हिरण्यकशिपु का अंत हुआ, तथा भक्त प्रह्लाद की भक्ति की विजय हुई।
होलिका-प्रह्लाद प्रसंग के बारे में
होलिका-प्रह्लाद प्रसंग तीन अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में हिरण्यकशिपु के अत्याचार व प्रह्लाद की अटूट भक्ति का वर्णन है। दूसरे अध्याय में होलिका के दहन की कथा है, तथा तीसरे अध्याय में भगवान के नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकशिपु के वध की कथा दी गई है।
यह प्रसंग फाल्गुन पूर्णिमा के होलिका दहन उत्सव से जुड़ा है। इस पृष्ठ पर सभी अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
श्रीमद्भागवत पुराण के बारे में
होलिका-प्रह्लाद प्रसंग का कोई एक प्रामाणिक मुद्रित 'कथा-पाठ' नहीं, बल्कि यह श्रीमद्भागवत पुराण के सप्तम स्कंध में वर्णित एक सुविख्यात व सर्वाधिक सुनाई जाने वाली पौराणिक कथा है। यहां दिया गया शब्दांकन मौलिक रूप से किया गया है, ताकि यह किसी एक वेबसाइट या प्रकाशन के पाठ की अविकल प्रतिलिपि न बने, तथापि घटनाक्रम पूर्णतः पुराण की सुस्थापित परंपरा पर आधारित है।
सामान्य प्रश्न
होलिका दहन क्यों मनाया जाता है?
होलिका दहन इस कथा की स्मृति में मनाया जाता है, जिसमें भक्त प्रह्लाद की भगवान विष्णु के प्रति अटूट भक्ति के कारण वह अग्नि में भी सुरक्षित रहा, जबकि उसे हानि पहुंचाने का प्रयास करने वाली होलिका स्वयं ही उसी अग्नि में भस्म हो गई।
हिरण्यकशिपु को कौन-सा वरदान प्राप्त था?
उसे यह वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु न मनुष्य से हो न पशु से, न दिन में हो न रात्रि में, न घर के भीतर हो न बाहर, न धरती पर हो न आकाश में, तथा न किसी अस्त्र-शस्त्र से हो।
भगवान विष्णु ने हिरण्यकशिपु का वध कैसे किया?
भगवान विष्णु ने नृसिंह (आधा मनुष्य, आधा सिंह) रूप में प्रकट होकर संध्याकाल की देहरी पर उसे अपनी गोद में रखकर अपने नाखूनों से वध किया, जिससे वरदान की कोई भी शर्त भंग नहीं हुई।
होलिका को कौन-सा वस्त्र प्राप्त था?
उसे ब्रह्मा जी से एक ऐसा वस्त्र (ओढ़नी) प्राप्त था, जो उसे अकेले धारण करने पर अग्नि से सुरक्षा देता था, किंतु किसी और की हानि हेतु प्रयुक्त करने पर वह सुरक्षा नहीं देता था।