होलिका दहन का मुहूर्त सदैव भद्रा-रहित प्रदोष काल में ही रखा जाता है, अन्यथा भद्रा काल में दहन को अशुभ माना जाता है। जिन वर्षों में भद्रा पूरी रात्रि रहती है, वहां कुछ पंचांगों में दहन एक दिन आगे भी खिसक सकता है, इसलिए सटीक मुहूर्त हेतु नज़दीकी पंचांग अवश्य देखें।
होलिका दहन का महत्व
कथा के अनुसार, राक्षस राजा हिरण्यकश्यप स्वयं को भगवान मानकर पूजा करवाना चाहता था, परंतु उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने के अनेक प्रयास किए, किंतु हर बार विष्णु की कृपा से वह सुरक्षित बच गया।
अंततः हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका की सहायता ली, जिसे एक ऐसा वस्त्र प्राप्त था जो उसे अग्नि से सुरक्षित रखता था। होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई, परंतु भगवान विष्णु की कृपा से वह वस्त्र प्रह्लाद पर आ गया, जिससे होलिका जलकर भस्म हो गई और प्रह्लाद सुरक्षित निकल आया। इसी घटना के स्मरण में प्रतिवर्ष होलिका दहन किया जाता है।
यह कथा भक्ति की शक्ति तथा बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। होलिका दहन के लिए हफ्तों पूर्व से लकड़ियां व उपले एकत्र किए जाते हैं, और फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि इस ढेर को जलाकर बुराई के अंत का उत्सव मनाया जाता है।
होलिका दहन कैसे मनाई जाती है
गांव अथवा मोहल्ले के किसी खुले चौराहे पर हफ्तों पूर्व से एकत्र की गई लकड़ियों व उपलों का ढेर बनाया जाता है, जिसे 'होलिका' कहा जाता है।
भद्रा-रहित शुभ मुहूर्त में इस ढेर की पूजा रोली, अक्षत, फूल, नारियल व गुलाल से की जाती है, फिर परिक्रमा कर विधिवत अग्नि प्रज्वलित की जाती है।
अग्नि की धधकती लपटों में लोग जौ, चना व मक्के की बालियां भूनकर प्रसाद स्वरूप ग्रहण करते हैं। अगली सुबह इसी अग्नि की राख से रंगवाली होली का उत्सव आरंभ होता है।
होलिका दहन पूजा विधि
भद्रा-रहित प्रदोष काल में होलिका के ढेर के समक्ष रोली, अक्षत, फूल, कच्चा सूत, नारियल व गुलाल अर्पित करें। जल का कलश लेकर परिक्रमा करें, फिर विधिवत अग्नि प्रज्वलित करें। अग्नि में जौ व चने की बालियां भूनकर प्रसाद स्वरूप ग्रहण करें।
होलिका दहन के बारे में
होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि मनाया जाने वाला पर्व है, जो भक्त प्रह्लाद की रक्षा और होलिका के दहन की कथा का स्मरण कराता है। इस पृष्ठ पर इस पर्व का महत्व, भद्रा-रहित मुहूर्त का महत्व, तथा होलिका पूजन की विधि की जानकारी दी गई है।
अगले दिन मनाई जाने वाली रंगवाली होली की जानकारी हेतु उसका अलग पृष्ठ भी देखें। इस पृष्ठ की जानकारी बड़े अक्षरों व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
सामान्य प्रश्न
होलिका दहन कब मनाया जाता है?
होलिका दहन फाल्गुन मास की पूर्णिमा की रात्रि, रंगवाली होली से एक दिन पहले मनाया जाता है।
भद्रा काल क्या है और इसमें दहन क्यों नहीं किया जाता?
भद्रा काल एक अशुभ समयावधि मानी जाती है, जिसमें कोई भी शुभ कार्य वर्जित होता है। मान्यता है कि भद्रा काल में होलिका दहन करने से अशुभ फल मिलता है, इसलिए इसे सदैव भद्रा-रहित समय में ही किया जाता है।
प्रह्लाद अग्नि से कैसे बच गए?
होलिका के पास एक ऐसा वस्त्र था जो उसे अग्नि से सुरक्षित रखता था, परंतु भगवान विष्णु की कृपा से वह वस्त्र प्रह्लाद पर आ गया, जिससे होलिका जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित बच गया।
होलिका दहन और होली में क्या अंतर है?
होलिका दहन पूर्णिमा की रात्रि की जाने वाली अलाव-पूजा है, जबकि होली (धुलंडी) अगले दिन मनाया जाने वाला रंगों का पर्व है। दोनों मिलाकर एक ही उत्सव के दो चरण माने जाते हैं।
