पाठ विवरण
एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में अठासी हजार ऋषि-मुनि एकत्र हुए और सूत जी से पूछने लगे: हे मुनिश्रेष्ठ, इस कलियुग में मनुष्य के दुख-दरिद्रता दूर करने और उसे सुख-शांति देने वाला कोई सरल व्रत हो तो हमें बताइए, जिसे थोड़े परिश्रम से भी पूर्ण फल मिल सके।
सूत जी बोले: यही प्रश्न एक बार देवर्षि नारद ने भी भगवान विष्णु से पूछा था। पृथ्वीलोक में भ्रमण करते हुए नारद जी ने देखा कि मनुष्य कर्मों के फलस्वरूप भांति-भांति के कष्ट भोग रहे हैं। यह देखकर वे व्यथित हो उठे और वैकुंठ जाकर भगवान नारायण के सम्मुख उपस्थित हुए।
नारद जी ने प्रणाम कर निवेदन किया: हे प्रभु, संसार में जीव अनेक प्रकार के दुखों से पीड़ित हैं। कृपया कोई ऐसा सरल उपाय बताइए, जिससे वे शीघ्र ही इन कष्टों से मुक्त हो सकें। यह सुनकर भगवान विष्णु मुस्कुराए और बोले: हे नारद, एक अत्यंत उत्तम व्रत है, जिसका नाम है सत्यनारायण व्रत। जो कोई श्रद्धापूर्वक इसे करता या इसकी कथा सुनता है, उसके सारे दुख-दारिद्र्य नष्ट हो जाते हैं और अंततः वह परम गति को प्राप्त होता है।
भगवान ने आगे कहा: इस व्रत में न कोई विशेष खर्च है, न कोई कठिन नियम। संध्या के समय परिवार और ब्राह्मणों सहित सत्यनारायण भगवान की पूजा कर, केले, घी, दूध, शक्कर और गेहूं के आटे से बना प्रसाद अर्पित करें, कथा सुनें, फिर सबको प्रसाद बांटें। जो निष्काम भाव से यह व्रत करता है, उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है। नारद जी यह सुनकर संतुष्ट हुए और भगवान को प्रणाम कर मृत्युलोक में इस व्रत का प्रचार करने चल पड़े। यहीं प्रथम अध्याय पूर्ण होता है।
काशी नगरी में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था। वह प्रतिदिन भिक्षा मांगकर किसी तरह अपना और अपने परिवार का पेट भरता था, किंतु दरिद्रता उसका पीछा नहीं छोड़ती थी। एक दिन भगवान सत्यनारायण अति वृद्ध ब्राह्मण का रूप धरकर उसके पास आए और उसकी उदासी का कारण पूछा।
ब्राह्मण ने अपनी दीन दशा का सारा वृत्तांत सुनाया। वृद्ध रूपधारी भगवान ने कहा: हे विप्र, तुम्हारे सारे कष्ट सत्यनारायण व्रत करने से दूर हो जाएंगे। तुम श्रद्धापूर्वक भगवान सत्यनारायण की कथा सुनो और यथाशक्ति उनकी पूजा करो, तुम्हारा दारिद्र्य अवश्य मिटेगा। इतना कहकर वे अंतर्ध्यान हो गए।
अगले दिन भिक्षा में मिली सामग्री से ही ब्राह्मण ने विधिपूर्वक सत्यनारायण व्रत किया और कथा सुनी। व्रत के प्रभाव से धीरे-धीरे उसके घर में सुख-समृद्धि आने लगी, भिक्षा में पहले से अधिक मिलने लगा, और कुछ ही समय में उसकी दरिद्रता दूर हो गई। इससे प्रसन्न होकर उसने प्रतिमाह इस व्रत को करने का नियम बना लिया, और उसका घर धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया।
उसी नगर में एक लकड़हारा रहता था, जो प्रतिदिन जंगल से लकड़ी काटकर बेचता और अपना जीवन चलाता था। एक दिन उसने ब्राह्मण के घर यह पूजा होते देखी और उसका कारण पूछा। ब्राह्मण ने उसे सत्यनारायण व्रत की सारी विधि और महिमा बताई। लकड़हारे ने श्रद्धापूर्वक निश्चय किया कि लकड़ी बेचकर जो पहला धन मिलेगा, उसी से वह यह व्रत करेगा। नगर पहुंचकर उसकी लकड़ी सामान्य से कहीं अधिक मूल्य पर बिकी, और उसने उसी दिन सत्यनारायण भगवान की पूजा की। इस व्रत के प्रताप से उसका जीवन भी सुख-समृद्धि से भर गया, और इस प्रकार सत्यनारायण व्रत की महिमा दूर-दूर तक फैलने लगी। यहीं द्वितीय अध्याय पूर्ण होता है।
भद्रशिला नदी के तट पर उल्कामुख नामक एक धर्मपरायण राजा राज्य करता था। एक दिन वह उसी नदी तट पर विधिपूर्वक सत्यनारायण भगवान का व्रत कर रहा था, तभी वहां से साधु नामक एक वैश्य व्यापार के सिलसिले में गुजरा। राजा को इतनी श्रद्धा से पूजा करते देख उसने रुककर इस व्रत की विधि और महत्व पूछा।
राजा ने उसे बताया कि यह व्रत संतान, धन और सुख देने वाला है। साधु वैश्य निःसंतान था, अतः उसने मन में संकल्प लिया कि संतान होने पर वह भी यह व्रत अवश्य करेगा। घर लौटकर उसने अपनी पत्नी लीलावती को यह बात बताई। कुछ समय बाद भगवान की कृपा से लीलावती गर्भवती हुई और उसने एक अत्यंत सुंदर कन्या को जन्म दिया, जिसका नाम कलावती रखा गया।
पुत्री के जन्म से आनंदित साधु व्यापार-व्यस्तता में यह प्रतिज्ञा भूलता गया और व्रत करना टालता रहा। समय बीतता गया, कलावती बड़ी होकर विवाह योग्य हुई। साधु ने रत्नसारपुर नगर के एक वणिक-पुत्र के साथ उसका विवाह तय किया, किंतु विवाह की तैयारियों में डूबा हुआ वह अपनी प्रतिज्ञा फिर भी पूरी न कर सका।
विवाह संपन्न हुआ, कलावती अपने पति के साथ ससुराल चली गई, परंतु साधु वैश्य की भूली हुई प्रतिज्ञा भगवान सत्यनारायण को स्मरण थी। उन्होंने निश्चय किया कि उचित समय पर वे साधु को उसकी भूल का बोध कराएंगे, जिससे वह पुनः श्रद्धापूर्वक इस व्रत की ओर लौट सके। यहीं तृतीय अध्याय पूर्ण होता है।
कुछ समय बाद साधु वैश्य अपने दामाद के साथ व्यापार के लिए जलमार्ग से रत्नसारपुर की ओर प्रस्थान करता है, जहाज बहुमूल्य वस्तुओं से भरा हुआ था। मार्ग में चंद्रकेतुपुर राज्य के तट पर राजा के सैनिकों ने जहाज की जांच करनी चाही। भय और मोहवश साधु ने अपनी बहुमूल्य वस्तुओं को छिपाने का प्रयास किया।
भगवान सत्यनारायण की अवकृपा से, जब पेटियां खोली गईं तो उनमें बहुमूल्य वस्तुओं के स्थान पर तुच्छ वस्तुएं और पत्ते ही मिले। इसे चोरी और छल समझकर क्रोधित राजा ने साधु और उसके दामाद को बंदी बना लिया तथा उनका सारा धन राजकोष में जब्त कर लिया। साधु समझ नहीं पाया कि यह विपत्ति उसी की भूली हुई प्रतिज्ञा का फल है।
इसी बीच, साधु के घर में भी विपत्ति आई। चोरों ने लीलावती और कलावती का सारा धन लूट लिया, और मां-बेटी को अत्यंत कष्टपूर्ण जीवन बिताना पड़ा। एक दिन कलावती किसी काम से पड़ोस के एक ब्राह्मण के घर गई, जहां सत्यनारायण भगवान का व्रत हो रहा था। उसने वहीं इस व्रत के बारे में सुना और घर आकर अपनी मां को सब कुछ बताया।
लीलावती और कलावती ने श्रद्धापूर्वक सत्यनारायण भगवान का व्रत किया और साधु व दामाद की कुशलता के लिए प्रार्थना की। उसी रात्रि भगवान सत्यनारायण ने चंद्रकेतुपुर के राजा को स्वप्न में दर्शन देकर सत्य बताया और साधु-दामाद को तुरंत मुक्त कर उनका धन दुगना करके लौटाने का आदेश दिया। स्वप्न से जागते ही राजा ने वैसा ही किया। मुक्त होकर, दुगने धन के साथ घर लौटते हुए साधु को अपनी भूल का बोध हुआ, और घर पहुंचते ही उसने विधिपूर्वक सत्यनारायण व्रत संपन्न किया। इस प्रकार भूली हुई प्रतिज्ञा पूर्ण हुई और घर में पुनः सुख-समृद्धि लौट आई। यहीं चतुर्थ अध्याय पूर्ण होता है।
एक बार राजा तुंगध्वज वन में शिकार खेलने गया। मार्ग में उसने एक विशाल वट वृक्ष के नीचे कुछ ग्वाल-बालों को श्रद्धापूर्वक सत्यनारायण भगवान का व्रत करते और प्रसाद बांटते देखा। ग्वालों ने राजा को भी प्रसाद ग्रहण करने का निमंत्रण दिया, किंतु अपने राजसी अभिमान में डूबे तुंगध्वज ने साधारण ग्वालों द्वारा किए गए इस व्रत का तिरस्कार कर दिया और बिना प्रसाद ग्रहण किए आगे बढ़ गया।
नगर पहुंचकर राजा को अत्यंत भीषण समाचार मिला। उसके सभी पुत्रों की अकाल मृत्यु हो चुकी थी, और देखते ही देखते उसका सारा राजकोष भी रीता हो गया। यह विपत्ति देखकर राजा स्तब्ध रह गया, किंतु उसे इसका कारण समझ नहीं आया।
कुछ समय बाद राजा को अपनी भूल का बोध हुआ। उसने भगवान सत्यनारायण के प्रसाद का अनादर किया था, और यही उसके इस दुख का कारण था। पश्चाताप से भरकर वह उन्हीं ग्वालों के पास लौटा, उनसे क्षमा मांगी और विधिपूर्वक सत्यनारायण भगवान का व्रत कर श्रद्धापूर्वक प्रसाद ग्रहण किया।
भगवान सत्यनारायण की कृपा से राजा के पुत्र पुनः जीवित हो उठे और राज्य का खोया हुआ वैभव भी लौट आया। सूत जी कहते हैं: हे मुनिगण, जो कोई श्रद्धा और सच्चे मन से यह सत्यनारायण व्रत करता या इसकी कथा सुनता है, उसे धन, संतान और सुख की प्राप्ति होती है, दुख-दरिद्रता का नाश होता है, और अंततः वह परम गति को प्राप्त होता है। इसी के साथ श्री सत्यनारायण कथा के पांचों अध्याय संपूर्ण होते हैं।
श्री सत्यनारायण कथा पाठ विधि
पूर्णिमा, एकादशी या किसी भी गुरुवार को स्नान के पश्चात पीत वस्त्र पहनकर, दीप जलाकर परिवार सहित भगवान सत्यनारायण की पूजा करें। केले, घी, दूध, शक्कर व गेहूं के आटे से बना प्रसाद अर्पित करें, यह कथा सुनें, और अंत में सभी उपस्थित जनों को प्रसाद अवश्य बांटें। प्रसाद का अनादर वर्जित माना जाता है।
श्री सत्यनारायण कथा के बारे में
सत्यनारायण कथा भगवान विष्णु के सत्यस्वरूप, सत्यनारायण, की पूजा-विधि और महिमा बताने वाली कथा है, जो पांच अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में नारद जी का भगवान से प्रश्न है, दूसरे में एक निर्धन ब्राह्मण और लकड़हारे को व्रत से मिले फल का वर्णन है, तीसरे और चौथे में साधु वैश्य की भूली प्रतिज्ञा और उसके परिणाम की कथा है, और पांचवें में राजा तुंगध्वज के अभिमान व उसके पश्चाताप की कथा है।
यह व्रत विशेष रूप से पूर्णिमा, एकादशी और गुरुवार के दिन किया जाता है, और भारत के लगभग हर क्षेत्र में किसी शुभ कार्य के आरंभ या समापन पर, या किसी मनोकामना की पूर्ति पर श्रद्धापूर्वक संपन्न किया जाता है। इस पृष्ठ पर पांचों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
अज्ञात के बारे में
सत्यनारायण कथा का कोई एक नामित रचयिता नहीं है। यह भगवान विष्णु से जुड़ी एक प्राचीन पौराणिक कथा-परंपरा है, जिसे परंपरागत रूप से स्कंद पुराण के रेवाखंड से जोड़ा जाता है, जबकि कुछ स्रोत इसे भविष्य पुराण के प्रतिसर्ग पर्व से भी जोड़ते हैं। शताब्दियों से मौखिक व लिखित रूप में चली आ रही इस कथा के अध्यायों के विस्तृत विवरण में क्षेत्र और स्रोत के अनुसार थोड़ा-बहुत अंतर मिलता है। यहां कथा का मूल कथानक और पांचों अध्यायों का क्रम सुसंगत रूप में, सरल हिंदी में प्रस्तुत किया गया है।
सामान्य प्रश्न
सत्यनारायण कथा में कुल कितने अध्याय हैं?
इसमें कुल पांच अध्याय हैं, जो एक साथ पूर्ण पाठ के रूप में पढ़े या सुने जाते हैं।
सत्यनारायण व्रत किस दिन करना चाहिए?
पूर्णिमा का दिन सर्वाधिक शुभ माना जाता है, इसके अलावा एकादशी और गुरुवार को भी यह व्रत विशेष फलदायी माना जाता है।
सत्यनारायण कथा किस पुराण से ली गई है?
इसे परंपरागत रूप से स्कंद पुराण के रेवाखंड से जोड़ा जाता है, जबकि कुछ स्रोत इसे भविष्य पुराण से भी संबंधित बताते हैं।
सत्यनारायण व्रत के क्या लाभ हैं?
इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करने या इसकी कथा सुनने से धन, संतान और सुख की प्राप्ति होती है, तथा दुख-दरिद्रता दूर होती है।
क्या प्रसाद ग्रहण करना आवश्यक है?
हां, कथा के अनुसार प्रसाद का अनादर या अस्वीकार करना अशुभ माना जाता है। राजा तुंगध्वज की कथा इसी की सीख देती है।
