मुख्यचालीसाश्री लक्ष्मी चालीसा

श्री लक्ष्मी चालीसा

लक्ष्मी चालीसा माता लक्ष्मी की स्तुति में रचित चालीसा है, जिसका पूर्ण पाठ यहां अर्थ सहित मिलेगा।

श्री लक्ष्मी चालीसा
चौपाई/३९

पाठ विवरण

रचनाकाररामदास
संरचना४ दोहे · ३९ चौपाई
पाठ समय७ मिनट
दोहा

मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास।
मनोकामना सिद्ध करि, परुवहु मेरी आस॥

यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करूं।
सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥

चौपाई

सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही।
ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोही॥

तुम समान नहिं कोई उपकारी।
सब विधि पुरवहु आस हमारी॥

जय जय जगत जननि जगदम्बा।
सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥

तुम ही हो सब घट घट वासी।
विनती यही हमारी खासी॥

जगजननी जय सिन्धु कुमारी।
दीनन की तुम हो हितकारी॥

विनवौं नित्य तुमहिं महारानी।
कृपा करौ जग जननि भवानी॥

केहि विधि स्तुति करौं तिहारी।
सुधि लीजै अपराध बिसारी॥

कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी।
जगजननी विनती सुन मोरी॥

ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता।
संकट हरो हमारी माता॥

क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो।
चौदह रत्न सिन्धु में पायो॥

चौदह रत्न में तुम सुखरासी।
सेवा कियो प्रभु बनि दासी॥

जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा।
रुप बदल तहं सेवा कीन्हा॥

स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा।
लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥

तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं।
सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥

अपनाया तोहि अन्तर्यामी।
विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥

तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी।
कहं लौ महिमा कहौं बखानी॥

मन क्रम वचन करै सेवकाई।
मन इच्छित वांछित फल पाई॥

तजि छल कपट और चतुराई।
पूजहिं विविध भांति मनलाई॥

और हाल मैं कहौं बुझाई।
जो यह पाठ करै मन लाई॥

ताको कोई कष्ट नोई।
मन इच्छित पावै फल सोई॥

त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि।
त्रिविध ताप भव बंधन हारिणी॥

जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै।
ध्यान लगाकर सुनै सुनावै॥

ताकौ कोई न रोग सतावै।
पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥

पुत्रहीन अरु सम्पति हीना।
अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना॥

विप्र बोलाय कै पाठ करावै।
शंका दिल में कभी न लावै॥

पाठ करावै दिन चालीसा।
ता पर कृपा करैं गौरीसा॥

सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै।
कमी नहीं काहू की आवै॥

बारह मास करै जो पूजा।
तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥

प्रतिदिन पाठ करै मन माही।
उन सम कोइ जग में कहुं नाहीं॥

बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई।
लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥

करि विश्वास करै व्रत नेमा।
होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥

जय जय जय लक्ष्मी भवानी।
सब में व्यापित हो गुण खानी॥

तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं।
तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं॥

मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै।
संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥

भूल चूक करि क्षमा हमारी।
दर्शन दजै दशा निहारी॥

बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी।
तुमहि अछत दुःख सहते भारी॥

नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में।
सब जानत हो अपने मन में॥

रुप चतुर्भुज करके धारण।
कष्ट मोर अब करहु निवारण॥

केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई।
ज्ञान बुद्धि मोहि नहिं अधिकाई॥

अंतिम दोहा

त्राहि त्राहि दुःख हारिणी, हरो वेगि सब त्रास।
जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश॥

रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर।
मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर॥

पाठ गणना

व्रत में कई बार पाठ किया जाता है: ११, २१ या १०८ बार। गिनती इस डिवाइस पर सहेजी जाती है।

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श्री लक्ष्मी चालीसा पाठ विधि

शुक्रवार को अथवा दीपावली की रात्रि स्नान के पश्चात दीप जलाकर पाठ करें। पूर्ण पाठ के अंत में दोनों समापन दोहे अवश्य दोहराएँ।

पाठ दिवस
शुक्रवार एवं दीपावली
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हनुमान चालीसा
स्तोत्र · ८ मिनट
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श्री लक्ष्मी चालीसा के बारे में

लक्ष्मी चालीसा माता लक्ष्मी की स्तुति में रचित सबसे लोकप्रिय चालीसा है, जिसमें समुद्र-मंथन से उनके प्रकट होने, श्रीविष्णु की प्रत्येक अवतार में सेवा करने और भक्तों पर उनकी कृपा का वर्णन है। समापन दोहे में रचनाकार स्वयं को 'रामदास' नाम से पहचानते हैं। रचना एक दोहे और एक सोरठे से आरंभ होकर उन्तालीस चौपाइयों में आगे बढ़ती है और दो दोहों के साथ समाप्त होती है — 'चालीसा' नाम के बावजूद यह पाठ चालीस नहीं, उन्तालीस चौपाइयों का है।

इस पृष्ठ पर पूरा पाठ शुद्ध देवनागरी में, प्रत्येक चौपाई के सरल हिंदी अर्थ के साथ दिया गया है। अक्षरों का आकार बढ़ाया जा सकता है, और पूरा पाठ प्रिंट भी किया जा सकता है।

रचनाकार
रामदास
भक्तिकाल, रचनाकाल अज्ञात

रामदास के बारे में

यह चालीसा स्वयं को समापन दोहे में 'रामदास' नाम से पहचानती है, यद्यपि इनके जीवनकाल और अन्य रचनाओं की विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है। यह लक्ष्मी माता की सबसे व्यापक रूप से पढ़ी जाने वाली चालीसा है, जो विशेष रूप से दीपावली और शुक्रवार के दिन घर-घर में पाठ की जाती है।

सामान्य प्रश्न

लक्ष्मी चालीसा की रचना किसने की?

समापन दोहे में रचनाकार स्वयं को 'रामदास' नाम से पहचानते हैं, यद्यपि इनके जीवनकाल की विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है।

इसमें कुल कितनी चौपाई हैं?

एक दोहा, एक सोरठा, उन्तालीस चौपाई और दो समापन दोहे हैं। 'चालीसा' नाम के बावजूद यह चालीस नहीं, उन्तालीस चौपाइयों का पाठ है।

पाठ का उत्तम समय क्या है?

शुक्रवार को अथवा दीपावली की रात्रि, स्नान के पश्चात दीप जलाकर पढ़ना उत्तम माना जाता है।

क्या अर्थ जानना आवश्यक है?

आवश्यक नहीं, परंतु अर्थ सहित पाठ करने से भाव स्पष्ट होता है। इस पृष्ठ पर प्रत्येक चौपाई का सरल अर्थ साथ में दिया गया है।

क्या इसे बिना स्नान पढ़ा जा सकता है?

हाथ-मुँह धोकर स्वच्छ स्थान पर बैठकर पाठ किया जा सकता है। भाव और स्वच्छता दोनों का महत्व है।

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