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श्री गायत्री चालीसा

गायत्री चालीसा माता गायत्री की स्तुति में रचित चालीसा है, जिसका पूर्ण पाठ यहां अर्थ सहित मिलेगा।

श्री गायत्री चालीसा
चौपाई/४०

पाठ विवरण

रचनाकारअज्ञात
संरचना३ दोहे · ४० चौपाई
पाठ समय८ मिनट
दोहा

ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा, जीवन ज्योति प्रचंड।
शांति कांति जागृत प्रगति, रचना शक्ति अखंड॥

जगत जननी मंगल करनि, गायत्री सुखधाम।
प्रणवों सावित्री स्वधा, स्वाहा पूरन काम॥

चौपाई

भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी।
गायत्री नित कलिमल दहनी॥

अक्षर चौबीस परम पुनीता।
इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता॥

शाश्वत सतोगुणी सत रूपा।
सत्य सनातन सुधा अनूपा॥

हंसारूढ़ सिताम्बर धारी।
स्वर्ण कांति शुचि गगन बिहारी॥

पुस्तक पुष्प कमंडलु माला।
शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला॥

ध्यान धरत पुलकित हिय होई।
सुख उपजत दुःख दुर्मति खोई॥

कामधेनु तुम सुर तरु छाया।
निराकार की अद्भुत माया॥

तुम्हरी शरण गहै जो कोई।
तरै सकल संकट सों सोई॥

सरस्वती लक्ष्मी तुम काली।
दिपै तुम्हारी ज्योति निराली॥

तुम्हारी महिमा पार न पावैं।
जो शारद शत मुख गुन गावैं॥

चार वेद की मात पुनीता।
तुम ब्रह्माणी गौरी सीता॥

महामंत्र जितने जग माहीं।
कोउ गायत्री सम नाहीं॥

सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै।
आलस पाप अविद्या नासै॥

सृष्टि बीज जग जननि भवानी।
कालरात्रि वरदा कल्याणी॥

ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते।
तुम सों पावें सुरता तेते॥

तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे।
जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे॥

महिमा अपरम्पार तुम्हारी।
जय जय जय त्रिपदा भयहारी॥

पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना।
तुम सम अधिक न जग में आना॥

तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा।
तुमहिं पाय कछु रहै न क्लेशा॥

जानत तुमहिं तुमहिं व्है जाई।
पारस परसि कुधातु सुहाई॥

तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई।
माता तुम सब ठौर समाई॥

ग्रह नक्षत्र ब्रह्मांड घनेरे।
सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे॥

सकल सृष्टि की प्राण विधाता।
पालक पोषक नाशक त्राता॥

मातेश्वरी दया व्रत धारी।
तुम सन तरे पातकी भारी॥

जापर कृपा तुम्हारी होई।
तापर कृपा करें सब कोई॥

मंद बुद्धि ते बुधि बल पावें।
रोगी रोग रहित हो जावें॥

दरिद्र मिटै कटै सब पीरा।
नाशै दुःख हरै भव भीरा॥

गृह क्लेश चित चिंता भारी।
नासै गायत्री भय हारी॥

संतति हीन सुसंतति पावें।
सुख संपत्ति युत मोद मनावें॥

भूत पिशाच सबै भय खावें।
यम के दूत निकट नहिं आवें॥

जो सधवा सुमिरें चित लाई।
अछत सुहाग सदा सुखदाई॥

घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी।
विधवा रहें सत्य व्रत धारी॥

जयति जयति जगदंब भवानी।
तुम सम और दयालु न दानी॥

जो सतगुरु सो दीक्षा पावे।
सो साधन को सफल बनावे॥

सुमिरन करे सुरुचि बड़भागी।
लहै मनोरथ गृही विरागी॥

अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता।
सब समर्थ गायत्री माता॥

ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी।
आरत अर्थी चिंतित भोगी॥

जो जो शरण तुम्हारी आवें।
सो सो मन वांछित फल पावें॥

बल बुधि विद्या शील स्वभाउ।
धन वैभव यश तेज उछाउ॥

सकल बढ़ें उपजें सुख नाना।
जो यह पाठ करै धरि ध्याना॥

अंतिम दोहा

यह चालीसा भक्ति युत, पाठ करै जो कोई।
तापर कृपा प्रसन्नता, गायत्री की होय॥

पाठ गणना

व्रत में कई बार पाठ किया जाता है: ११, २१ या १०८ बार। गिनती इस डिवाइस पर सहेजी जाती है।

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श्री गायत्री चालीसा पाठ विधि

प्रातःकाल स्नान के पश्चात पूर्व दिशा की ओर मुख कर, आसन पर बैठकर पाठ करें। माला के साथ अथवा गायत्री जयंती पर पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है।

पाठ दिवस
प्रतिदिन प्रातः एवं गायत्री जयंती
आगे पढ़ें · Next
हनुमान चालीसा
स्तोत्र · ८ मिनट
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श्री गायत्री चालीसा के बारे में

गायत्री चालीसा माता गायत्री की स्तुति में रचित चालीसा है, जिन्हें वेदमाता और समस्त देवशक्तियों का मूल स्वरूप माना जाता है। इसमें गायत्री मंत्र के चौबीस अक्षरों की महिमा, माता के स्वरूप और उनकी कृपा से मिलने वाले फलों का वर्णन है। रचना दो दोहों से आरंभ होकर चालीस चौपाइयों में आगे बढ़ती है और एक दोहे के साथ समाप्त होती है।

इस पृष्ठ पर पूरा पाठ शुद्ध देवनागरी में, प्रत्येक चौपाई के सरल हिंदी अर्थ के साथ दिया गया है। अक्षरों का आकार बढ़ाया जा सकता है, और पूरा पाठ प्रिंट भी किया जा सकता है।

रचनाकार
अज्ञात
पारंपरिक रचना

अज्ञात के बारे में

गायत्री चालीसा का कोई रचयिता चालीसा में स्वयं नामित नहीं है, इस कारण इसे अज्ञात रचनाकार की परंपरागत रचना माना जाता है। इसमें माता गायत्री को वेदमाता और सभी देवशक्तियों के मूल रूप में वर्णित किया गया है। यह चालीसा भारत भर में गायत्री उपासकों द्वारा नित्य संध्या-वंदन में तथा गायत्री जयंती के अवसर पर व्यापक रूप से पढ़ी जाती है।

सामान्य प्रश्न

गायत्री चालीसा की रचना किसने की?

चालीसा में कोई रचयिता स्वयं नामित नहीं है, इसलिए इसे अज्ञात रचनाकार की परंपरागत रचना माना जाता है।

इसमें कुल कितनी चौपाई हैं?

दो आरंभिक दोहे, चालीस चौपाई और एक समापन दोहा है।

पाठ का उत्तम समय क्या है?

प्रातःकाल स्नान के पश्चात, पूर्व दिशा की ओर मुख कर पढ़ना उत्तम माना जाता है। गायत्री जयंती पर भी विशेष माना जाता है।

क्या अर्थ जानना आवश्यक है?

आवश्यक नहीं, परंतु अर्थ सहित पाठ करने से भाव स्पष्ट होता है। इस पृष्ठ पर प्रत्येक चौपाई का सरल अर्थ साथ में दिया गया है।

क्या इसे बिना स्नान पढ़ा जा सकता है?

हाथ-मुँह धोकर स्वच्छ स्थान पर बैठकर पाठ किया जा सकता है। भाव और स्वच्छता दोनों का महत्व है।

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