पाठ विवरण
ॐ जय जगदीश हरे,
स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट,
दास जनों के संकट,
क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी॥
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख फलकामी, कृपा करो भर्ता॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥
दीन-बन्धु दुःख-हर्ता, ठाकुर तुम मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥
विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥
व्रत में कई बार पाठ किया जाता है: ११, २१ या १०८ बार। इस काउंटर से अपनी पाठ गिनती सहेजें।
ॐ जय जगदीश हरे आरती पाठ विधि
संध्या समय दीप जलाकर पाठ करें। प्रत्येक कड़ी के बाद और पाठ के अंत में स्थायी पंक्ति 'ॐ जय जगदीश हरे' दोहराएं।
ॐ जय जगदीश हरे आरती के बारे में
ॐ जय जगदीश हरे पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी द्वारा सन् १८७० में रचित आरती है, जो मूलतः भगवान विष्णु (जगदीश) को समर्पित है। इसमें भगवान को परमात्मा, अंतर्यामी, करुणा के सागर और दीनों के बंधु के रूप में वर्णित किया गया है। इसकी लोकप्रियता इतनी अधिक है कि यह किसी भी देवता की पूजा में गाई जाती है, चाहे अवसर कोई भी हो। रचना एक स्थायी पंक्ति से आरंभ होकर सात कड़ियों में आगे बढ़ती है, प्रत्येक कड़ी के बाद स्थायी पंक्ति दोहराई जाती है।
इस पृष्ठ पर पूरा पाठ शुद्ध देवनागरी में, प्रत्येक कड़ी के सरल हिंदी अर्थ के साथ दिया गया है। अक्षरों का आकार बढ़ाया जा सकता है, और पूरा पाठ प्रिंट भी किया जा सकता है।
पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी के बारे में
पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी (सन् १८३७–१८८१) सनातन धर्म प्रचारक, ज्योतिषी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, संगीतज्ञ तथा हिंदी और पंजाबी के प्रसिद्ध साहित्यकार थे। उन्हें हिंदी साहित्य का पहला उपन्यासकार भी माना जाता है। उन्होंने यह आरती सन् १८७० में लिखी, जो मूलतः भगवान विष्णु (जगदीश) को समर्पित है। आज यह किसी भी देवता की पूजा, उत्सव अथवा अनुष्ठान में गाई जाने वाली भारत की सबसे लोकप्रिय आरती बन चुकी है।
सामान्य प्रश्न
ॐ जय जगदीश हरे आरती की रचना किसने की?
पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी ने सन् १८७० में इसकी रचना की। वे हिंदी साहित्य के पहले उपन्यासकार भी माने जाते हैं।
यह आरती किस देवता को समर्पित है?
यह मूलतः भगवान विष्णु (जगदीश) को समर्पित है, परंतु इसकी लोकप्रियता के कारण यह किसी भी देवता की पूजा में गाई जाती है।
आरती की संरचना क्या है?
एक स्थायी पंक्ति और सात कड़ियां हैं। प्रत्येक कड़ी के बाद स्थायी पंक्ति दोहराई जाती है।
क्या अर्थ जानना आवश्यक है?
आवश्यक नहीं, परंतु अर्थ सहित पाठ करने से भाव स्पष्ट होता है। इस पृष्ठ पर प्रत्येक कड़ी का सरल अर्थ साथ में दिया गया है।
