मुख्यकथासंतोषी माता व्रत कथा

संतोषी माता व्रत कथा

संतोषी माता व्रत कथा गंगा नामक एक गृहवधू की कथा है, जिसने शुक्रवार को संतोषी माता का व्रत करके अपने घर का दुःख-दारिद्र्य दूर किया, जो हर शुक्रवार सुनी-सुनाई जाती है और जिसका पूर्ण पाठ यहां उपलब्ध है।

संतोषी माता व्रत कथा
अध्याय/

अध्याय · गंगा का घर में अनादर

श्रीरंगपुर नाम का एक गांव था। वहां एक बुढ़िया रहती थी, जिसके सात पुत्र थे। बुढ़िया ने सभी का विवाह करवा दिया था, घर में बहुएँ आ गई थीं, और इस कारण बुढ़िया का घर भरा-पूरा लगता था। माँ का तो सभी पुत्रों पर समान स्नेह होना चाहिए, सब लड़के समान होने चाहिए, पर इस बुढ़िया को बड़े छह लड़कों पर अधिक स्नेह था, और सातवें पर तनिक भी स्नेह न रखती थी, सौतेले पुत्र की तरह उसके साथ व्यवहार करती थी। जब रसोई तैयार हो जाती, तब बुढ़िया बड़े छह लड़कों को पहले भोजन कराती, उन्हें अच्छा खिलाती, और उनकी थाली में जो जूठन बचता उसे इकट्ठा करके एक थाली में रखकर छोटे पुत्र को खाने को देती थी। छोटे पुत्र गोरधन को इस बात का पता नहीं था, इसलिए माँ जो उसे देती थी, वह उसे आनंद से खा लेता था। परंतु उस छोटे पुत्र की पत्नी गंगा चपल थी। बुढ़िया के इस भेदभाव को उसने बहुत दिनों तक देखा, फिर उसका मन बहुत दुःखी हुआ, यह तो बहुत बुरी बात है, अपनी ही कोख के पुत्र के साथ ऐसा व्यवहार?

एक दिन अवसर देखकर उसने अपने पति से यह बात कही: 'यदि मैं एक बात बताऊँ, तो आप मुझ पर क्रोध तो नहीं करेंगे न?' गोरधन ने कहा: 'नहीं, सच्ची बात पर मैं क्रोध करने वाला नहीं, बता क्या बात है?' उसने कहा: 'आपकी माता आपको हर रोज आपके भाइयों की जूठन खिलाती हैं, क्या आपको इस बात का पता है? आप ऐसे भोले स्वभाव के कब तक बने रहेंगे, जहाँ इस प्रकार भेदभाव हो, वहाँ एक क्षण भी कैसे रहा जा सके?' गोरधन ने कहा: 'यह बात मैं मान नहीं सकता।' उसने कहा: 'यदि ऐसा है, तो कल मैं आपको प्रत्यक्ष दिखा दूँगी, तब आपको विश्वास होगा न?' दूसरे दिन बुढ़िया ने छह बड़े पुत्रों को रसोईघर में भोजन करने बिठाया, तब वह छोटा पुत्र बगल वाले कमरे में दरवाज़े के पीछे छिपकर रसोईघर में देखने लगा। उस दिन खीर बनी थी, इसलिए बुढ़िया ने आग्रह करके छहों पुत्रों को खिलाई। उनके भोजन कर लेने के बाद उनकी थालियों में बची-खुची चीज़ें इकट्ठा करके एक थाली में रखीं। छोटा पुत्र यह सब देखकर समझ गया कि पत्नी की बात सच है, अभी माँ भोजन के लिए बुलाएगी, और यदि यही थाली मेरे आगे रखे तो मुझे खाना नहीं है, ऐसा निर्णय करके वह दूसरे कमरे में चला गया। उसी समय बुढ़िया ने आवाज़ दी: 'बेटा गोरधन, भोजन के लिए चल, थाली परोस दी है।' गोरधन रसोईघर में आया। माँ पर क्रोध तो बहुत आया था, पर माँ का मन दुःखी न हो इसलिए वह गंभीर बना रहा। 'बेटा, खड़ा क्यों है, खाने को बैठ जा,' बुढ़िया ने झूठा प्यार जताते हुए कहा। 'माँ, आज पेट में दुखता है, इसलिए कुछ खाना नहीं है।' ऐसा कहकर गोरधन अपनी पत्नी गंगा के पास गया और बोला: 'तेरी बात सच्ची है, अब इस घर में मुझे रहना नहीं चाहिए, जहाँ आदर न हो वहाँ सोने का कौर भी निकम्मा है। मैं आज ही यहाँ से किसी दूसरे स्थान पर भाग्य आज़माने निकल पड़ूँगा।' उसी समय बुढ़िया ने गंगा को आवाज़ दी और कहा: 'बहू, बातें कम करो, अभी बहुत दिन बाकी हैं, पहले गोबर थाप दो।' गंगा तुरंत ही घर के पीछे के आँगन में जाकर गोबर थापने लगी।

इधर वह छोटा बेटा गोरधन दूसरे गाँव जाने के लिए कपड़े पहनकर तैयार हो गया। घर में किसी से अनुमति लेने की उसे आवश्यकता न लगी, क्योंकि नाते-रिश्ते में कितनी मिठास है यह तो उसने देख ही लिया था। घर के पिछले दरवाज़े से वह आँगन में गया और गंगा को उपले थापती देख रोककर कहा: 'मैं अभी जाता हूँ, तू यहाँ सुख-दुःख से दिन काटना, जब मैं ठिकाने लगूँगा, तब तुझे लेने आऊँगा,' इतना कहते-कहते उसकी आँखों में आँसू छलक आए। गंगा ने सिसकते हुए कहा: 'आपके बिना मुझे चैन न होगा, यहाँ मुझे दुःख होगा, फिर किसके आगे हृदय का भार हल्का करूँगी? फिर भी आप प्रसन्नता से जाइए, पर जाने के बाद मुझे भूलना मत।' गोरधन ने हाथ की उँगली से पान के आकार की सोने की अँगूठी निकालकर गंगा की उँगली में पहना दी और बोला: 'यह मेरी निशानी तेरे पास रहेगी, इससे तुझे अकेलापन नहीं लगेगा, अब तू भी अपनी ओर से कोई निशानी दे।' 'यह रही मेरी निशानी,' ऐसा कहकर गंगा ने गोबर से सने हाथ का निशान गोरधन के कुर्ते के पिछले भाग पर लगा दिया, और गोरधन भारी हृदय से वहाँ से चल निकला।

अध्याय · गोरधन की परदेस-यात्रा और गंगा को व्रत का ज्ञान

दूसरे दिन दोपहर को गोरधन माधवपुर नामक एक शहर में जा पहुँचा। वहाँ नौकरी की तलाश की तो एक बनिया सेठ के यहाँ उसे नौकरी मिल गई। खाना-पीना और रहना सेठ के यहाँ ही था, इससे गोरधन को कोई चिंता न थी। वह हर रोज़ प्रातःकाल सबसे पहले दुकान पर जाता और शाम को सबके पीछे सेठ के घर खाने जाता था। वह हर काम में तथा बहीखाते का हिसाब लिखने में भी दक्ष था, इसलिए सेठ ने थोड़े ही समय में उसे अपना मुनीम बना दिया और सारी बागडोर उसे सौंप दी। समय भी पानी के प्रवाह की तरह बहने लगा, इसी बीच बनिया सेठ गोरधन को सारी दुकान सौंपकर तीर्थयात्रा को चल निकला। उसने बहुत धन कमाया था, अब वह पुण्य कमाने निकल पड़ा था, सच में, किया हुआ पुण्य ही साथ चलता है, पैसा तो साथ आता ही नहीं।

इधर श्रीरंगपुर में गोरधन की पत्नी गंगा दुःख में डूबी हुई थी। घर में पति की अनुपस्थिति थी, इससे बुढ़िया ने घर का सारा काम उसी के सिर डाल दिया था। घर भर का काम वह करती, और बदले में आटे की भूसी की कच्ची-पक्की रोटी और टूटे नारियल के खोपरे में पीने को पानी मिलता, ऐसा कष्ट वह मूक भाव से सहती रहती थी। एक बार गंगा गाँव के बाहर के कुएँ पर पानी भर रही थी, उसी समय उसने कुछ स्त्रियों को हाथों में थाल लिए खड़ी देखा। गंगा समझ गई कि ये सब कोई व्रत कर रही होंगी। वह पानी का घड़ा वहीं छोड़कर उनके पास गई और पूछने लगी: 'बहन, मुझे लगता है कि तुम कोई व्रत कर रही हो, मैं भी व्रत करना चाहती हूँ, मुझे बताओ तुम कौन-सा व्रत कर रही हो?' एक भले स्वभाव वाली स्त्री ने कहा: 'बहन, हम संतोषी माँ का व्रत कर रही हैं। यह व्रत ऐसा सरल और सादा है कि कम खर्च में गरीब स्त्री-पुरुष भी इसे कर सकते हैं।' गंगा बोली: 'बहन, तब तो इस प्रकार के व्रत की महिमा बड़ी होगी, यह बताओ कि इस व्रत को करने से क्या लाभ होता है?' उस भली स्त्री ने कहा: 'बहन, संतोषी माँ के व्रत के प्रभाव की बात अवर्णनीय है, जिसकी जो इच्छा हो वह संतोषी माँ पूर्ण करती हैं, निर्धन को धन मिलता है, बेकार को काम मिलता है, रोगी का रोग दूर होता है, परिवार की पीड़ा दूर होती है, संतानहीन के घर पालना बंधता है, कुँवारी कन्या को मनचाहा पति मिलता है, बिछड़े स्नेही जन एक-दूसरे से मिलते हैं, इस प्रकार के अनेक लाभ संतोषी माता के व्रत में हैं।' गंगा बोली: 'बहन, मेरे पति कई समय से परदेश कमाने गए हैं, पर उनकी ओर से कोई समाचार नहीं है, इससे मुझे बहुत चिंता होती है। बहन, मेरे दुःख का तो अंत नहीं, क्या व्रत करने से उनके समाचार मिलेंगे?' भली स्त्री ने कहा: 'बहन, तू भी संतोषी माँ का व्रत आरंभ कर दे, इससे थोड़े ही समय में तेरे पति की ओर से समाचार मिलेंगे और धीरे-धीरे तेरा दुःख कम होने लगेगा।'

गंगा के मन में संतोषी माँ का व्रत करने की प्रबल इच्छा जागी, पर यह व्रत किस प्रकार किया जाए, इसकी विधि का उसे पता न था, और संपूर्ण विधि के बिना व्रत फलता नहीं। इसलिए उसने उस भली स्त्री से पूछा: 'बहन, तुमसे बातें करके मैंने समय तो बहुत लिया, अब मुझे संतोषी माँ के व्रत की विधि बता दो, जिससे मैं व्रत का आरंभ कर दूँ।' भली स्त्री ने कहा: 'बहन, यह व्रत घर में या बाहर शांत वातावरण में हो सकता है, किसी भी शुक्रवार से यह व्रत आरंभ हो सकता है। जहाँ बैठना अनुकूल हो, वहाँ घी का दीपक जलाकर उसके आगे पानी से भरा कलश रखना, और कलश के ऊपर एक कटोरी में गुड़ तथा भुने हुए चने रखना। फिर वहाँ बैठकर एकचित्त होकर संतोषी माँ की कथा कहनी या सुननी चाहिए, कथा पूरी होने पर माँ की आरती उतारनी चाहिए, उसके बाद कटोरी के गुड़-चने प्रसाद के रूप में आस-पास के छोटे-बड़े सभी को बाँटने चाहिए। संतोषी माँ की भक्ति हर कोई अपनी शक्ति के अनुसार कर सकता है, सामर्थ्य हो तो सवा पाँच सेर गुड़-चने बाँटने चाहिए, और साधारण स्थिति हो तो सवा पाँच आने के भी बाँटे जा सकते हैं।' गंगा ने बीच में पूछा: 'संतोषी माँ के व्रत में विशेष रूप से किस बात का ध्यान रखना चाहिए?' भली स्त्री बोली: 'भूखी रहकर संतोषी माँ की कथा कहनी या सुननी चाहिए, उसके बाद ही भोजन किया जा सकता है। हर शुक्रवार को इस प्रकार विधिपूर्वक व्रत किया जाए तो व्रत का फल अवश्य मिलता है, संतोषी माँ की दया हो तो तीन दिन में भी फल मिलता है, तीन सप्ताह में, तीन महीने में भी फल मिलता है, और दशा प्रतिकूल हो और ग्रह अनुकूल न हों तो तीन वर्ष के बाद फल मिलता है। व्रत करने वाले को संतोषी माँ सुख-शांति अवश्य देती हैं।' गंगा ने पूछा: 'बहन, यदि माँ की कृपा से मनोकामना पूर्ण हो जाए, तो फिर कुछ करना शेष रहता है?' भली स्त्री ने कहा: 'हाँ बहन, मनोकामना पूर्ण होने पर व्रत का उद्यापन करना न भूलना। उद्यापन में सवा सेर आटे के सादे खाजे या घी में तली मीठी पूड़ी, और आवश्यकतानुसार खीर तथा चने का साग बनाना चाहिए। यह सब आठ बालकों को बुलाकर खिलाना चाहिए, अपने परिवार के बालक हों तो अच्छा, वरना पास-पड़ोस के बालक भी बुलाए जा सकते हैं। उन्हें भोजन कराकर दान-दक्षिणा में नकद कुछ नहीं, पर वस्त्र या फल देना चाहिए, और उन्हें प्रसन्न करके विदा करना। इस प्रकार इस व्रत का उद्यापन होता है। परंतु इतना ध्यान रखना कि उद्यापन के समय रसोईघर में इमली, कोकम या ऐसी कोई खटाई वाली चीज़ नहीं डालनी चाहिए, न किसी को नींबू, अचार या खटाई की चीज़ खाने को देनी चाहिए, न स्वयं खानी चाहिए।' गंगा ने उस भली स्त्री का आभार माना, फिर पानी का घड़ा लेकर जल्दी से घर गई। उसने संतोषी माँ का व्रत करने का पक्का निर्णय कर लिया।

अध्याय · पहला व्रत और गोरधन की वापसी

छह दिन बाद शुक्रवार आया। उस दिन गंगा ने कुछ खाया नहीं, क्योंकि आज उसे व्रत करना था। वह पहले से ही सवा आने का गुड़ तथा भुने चने माँ के प्रसाद के लिए ले आई थी। शाम हुई तो उसने नहा-धोकर साफ-सुथरे वस्त्र पहनकर अपने कमरे के एक कोने में संतोषी माँ के नाम का दीपक जलाया, उसके समीप पानी से भरा कलश रखा, कलश के ऊपर एक कटोरी रखी और उसमें गुड़-चने रखे। फिर संतोषी माँ की जय बोलकर उसने माँ से विनती की: 'हे संतोषी माँ! मेरा दुःख आप जानती हैं, मेरी इच्छा पूर्ण करके मेरा दुःख दूर करना।' इस प्रकार विनती के बाद गंगा ने संतोषी माँ की आरती उतारी, फिर स्वयं प्रसाद लिया और बाकी प्रसाद बच्चों में बाँट दिया। सुबह से उसने कुछ खाया न था। सास ने जो खाने को दिया था, उसे ढककर रखा था, वह उसने एक पहर बाद खाया और फिर काम करने लगी। आज उसके आनंद का पार न था, क्योंकि उसे विश्वास था कि संतोषी माँ उसका संकट अवश्य दूर करेंगी।

तीसरे शुक्रवार को गंगा ने व्रत की पूर्णाहुति की, उस समय माधवपुर से एक आदमी वहाँ आया, जो दो सौ रुपये लेकर आया था। वे रुपये गोरधन ने गंगा के लिए भेजे थे, और यह भी कहलवाया था कि वह स्वयं थोड़े दिनों बाद श्रीरंगपुर आएगा। इस दिन गंगा का आनंद और बढ़ गया, शाम को उसने माँ के नाम का दीपक जलाया और माँ के गरबे गाकर माँ को बहुत धन्यवाद दिया। परंतु गंगा की जिठानियाँ उससे ईर्ष्या करने लगीं, क्योंकि आज गंगा के पति ने दो सौ रुपये भेजे थे। गंगा को रुपयों की आवश्यकता न थी, उसे तो अपने पति के दर्शन चाहिए थे, इसलिए उसने रोज़ माताजी से यह प्रार्थना करनी शुरू की: 'हे माता, जब मेरे पति आएँगे, तभी मैं अन्न खाऊँगी, मुझसे उनका वियोग सहा नहीं जाता।' उसी रात संतोषी माँ ने माधवपुर में गंगा के पति गोरधन को स्वप्न में दर्शन दिए और कहा: 'बेटा, तूने यहाँ खूब कमाया है, और श्रीरंगपुर में तेरी पत्नी दुःख में दिन बिता रही है, तेरे विरह में वह दुर्बल हो गई है, इसलिए सारा व्यापार समेटकर जल्दी वहाँ पहुँच जा।'

माँ की दया से गोरधन को अपना व्यापार समेटने में अधिक समय न लगा। सारा प्रबंध करके वह दूसरे ही दिन माल-सामान और पूँजी के साथ श्रीरंगपुर जाने को निकला, दो बैलगाड़ियाँ जोड़कर चल पड़ा। दूसरे दिन दोपहर को गोरधन श्रीरंगपुर की सीमा पर आ पहुँचा। उस समय गंगा लकड़ी काटने आई थी, वह लकड़ी का गट्ठर बाँधकर संतोषी माँ के मंदिर के आँगन में थकान दूर करने बैठी थी। आज उसके मन में हो रहा था कि आज ज़रूर मेरे पति आ पहुँचेंगे। उसी समय बैलों की घुँघरू की ध्वनि सुनाई दी, इसलिए वह मंदिर में माता की मूर्ति के आगे जाकर गिड़गिड़ाकर कहने लगी: 'माँ, मेरे धैर्य की सीमा अब आ चुकी है, आज मुझे ऐसा लगता है कि मेरे पति आएँगे, क्या यह सच है?' तब मानो माता की मूर्ति बोल रही हो, ऐसी अदृश्य वाणी सुनाई दी: 'बेटी, बात सच्ची है, अभी तेरे पति सकुशल लौट आए हैं और वह तेरे घर जा रहे हैं। पर तू घर जाने की जल्दी न करना, घंटे भर बाद तू सिर पर लकड़ी का गट्ठर रखकर घर जाना, और आँगन में गट्ठर रखकर अपनी सास से कहना, सासजी रे सासजी, आज भी रोज़ की तरह बड़ी मुसीबत से लकड़ी काटकर लाई हूँ, अब मुझे आटे की मोटी रोटी खाने को दीजिए और नारियल के खोपरे में पानी न दीजिए।' यह सुनकर गंगा उलझन में पड़ गई कि सास से ऐसा कैसे कहा जाए। तब फिर वही अदृश्य वाणी आई: 'बेटी, तू घबराना नहीं, इसी में तेरी भलाई है, ऐसा करने से ही तेरे पति को मालूम होगा कि तुझे कितना कष्ट है।' गंगा हर्ष से पागल हो गई, क्योंकि माँ की संपूर्ण कृपा उस पर उतरी थी। इसके बाद वह माँ के गरबे और भजन गाती हुई वहीं बैठी रही। देखते-देखते घंटा भर बीत गया, और गंगा सिर पर लकड़ी का गट्ठर रखकर उल्लास से भरकर घर जाने को निकली।

अध्याय · घर लौटना और सच्चाई का उजागर होना

इस बीच गोरधन घर पहुँच गया, और उसकी माँ बड़ी लगन से उसे खिलाने की तैयारियाँ कर रही थी, पर गोरधन को पहले का कड़वा अनुभव याद था, इसलिए खाने से मना करके वह द्वार पर गंगा की राह देखते बैठा रहा। बुढ़िया ने तो गोरधन के आगे गंगा के सुखी होने की बात कही थी, कहा था कि उसे कोई दुःख नहीं है, पर गोरधन को यह बात माने नहीं आ रही थी, क्योंकि संतोषी माँ ने स्वप्न में गंगा के दुःख की बात बताई थी और इसीलिए वह सब समेटकर जल्दी घर आया था। बुढ़िया को चिंता हुई कि अभी गंगा गट्ठर लेकर घर आ पहुँचेगी तो सारी पोल खुल जाएगी, इसलिए वह गोरधन को भीतर बैठक में जाने का आग्रह कर रही थी, पर गोरधन वहीं द्वार पर बैठा रहा, जिससे वह जल्दी गंगा का मुख देख सके।

उसी समय गंगा लकड़ी का गट्ठर लिए आ पहुँची। उसकी यह दशा और दुर्बल देह देखकर गोरधन की आँखों में आँसू आ गए, मानो यह गंगा है ही नहीं, ऐसा लगा। गंगा ने आते ही कहा: 'सासजी रे सासजी, आज भी रोज़ की तरह कष्ट उठाकर लकड़ी काट लाई हूँ, अब मुझे आटे की मोटी रोटी खाने को दीजिए और नारियल के खोपरे में पानी पीने को दीजिए।' यह सुनते ही बुढ़िया की ऐसी दशा हो गई कि काटो तो खून न निकले, बहू ने उसकी पोल खोल दी थी। पर गोरधन ने कुछ कहा नहीं, वह गंगा को अपने कमरे में ले गया। वहाँ गंगा ने अपने दुःख की सारी बात कही, और यह भी बताया कि वह स्वयं संतोषी माँ का व्रत करती है। गोरधन को भी संतोषी माँ ने स्वप्न में दर्शन दिए थे, आज उसे पूरा भरोसा हो गया था कि माँ के व्रत के प्रभाव से उसका संसार सुखी होगा। जब वह यह सोच रहा था, तब तक गंगा ने कमरे की सफाई कर दी।

बुढ़िया के मन में अब भी डर था, इसलिए वह गोरधन के पास आकर कहने लगी: 'तुम दोनों पहले भोजन तो कर लो।' गोरधन ने कहा: 'हमें भोजन नहीं करना है, आज से हमारी रसोई अलग होगी, इसलिए माँ, तुम हमारी चिंता न करना।' बुढ़िया मुँह लटकाकर चली गई। गोरधन बाज़ार से सारी सामग्री ले आया, और उस दिन बहुत दिनों के बाद गोरधन और गंगा ने साथ बैठकर लापसी खाई। गंगा ने भी आज पहली बार भरपेट भोजन किया, दोनों को आज अपार आनंद हुआ।

शाम को गोरधन के छहों भाई कामकाज से घर लौटे तो उन्हें गोरधन के आने का समाचार मिला। उन्हें गोरधन मिला और सभी भाइयों ने सुख-दुःख की बहुत-सी बातें कीं। रात को गंगा ने संतोषी माँ का दीपक जलाया, प्रार्थना की और गरबा गाया। गोरधन ने यह सब देखा, और गंगा की धार्मिक भावना के लिए उसके मन में आदर उत्पन्न हुआ।

अध्याय · उद्यापन की परीक्षा और पुत्र-प्राप्ति

दिन बीतने लगे और शुक्रवार आया। आज गंगा ने संतोषी माँ के व्रत का उद्यापन करने का निर्णय किया, इसलिए वह अपनी जिठानियों से कह आई: 'आज माँ के व्रत का उद्यापन है, इसलिए सब मिलाकर आठ बालकों को शाम को भोजन के लिए भेजना।' गंगा की ईर्ष्यालु जिठानियाँ ऐसा ही अवसर ढूँढ़ रही थीं, वे किसी भी प्रकार गंगा के व्रत को भंग करना चाहती थीं, और यह काम बच्चों के द्वारा आसानी से हो सकता था। उन सबने अपने पुत्रों को समझा दिया: 'तुम अपनी काकी के यहाँ भोजन करने बैठते समय खटाई माँगना, और खटाई खाने को न दे तो पैसे माँगना, और उन पैसों से खट्टी चीज़ लेकर खाना।'

शाम के समय गंगा ने संतोषी माँ के नाम का दीपक जलाया, प्रणाम किया और भोजन का थाल भरा। उसके बाद लड़कों को खाने बिठाया, सबकी थाली में खाजा, खीर और चने का साग परोसा, पर किसी ने भोजन को हाथ न लगाया। गंगा ने कहा: 'सब आ गया, अब भोजन करना शुरू करो।' तब सब लड़के एक साथ बोल उठे: 'ऐसा स्वादहीन भोजन हमारे गले से नीचे नहीं उतरेगा, इसलिए अचार, मुरब्बा या नींबू जैसी खट्टी चीज़ खाने को दीजिए।' गंगा ने नम्रता से कहा: 'माँ के व्रत के उद्यापन के समय खटाई नहीं खाई जाती, इसीलिए तो मैंने रसोई में भी खटाई नहीं डाली।' लड़कों ने खटाई के लिए ज़िद की, और वह न दे तो एक-एक पैसा देने को कहा। भली गंगा ने उन्हें राजी करने के लिए एक-एक पैसा दे दिया। लड़कों ने खाया-न-खाया कि वे पंसारी की दुकान पर दौड़ गए और इमली खरीद लाए, गंगा के कमरे में ही बैठकर खाने लगे। गंगा उस समय काम में लगी थी, इसलिए उसे पता न चला। लड़के खाकर अपनी-अपनी माँ के पास गए और बताया: 'माँ माँ, हमने काकी से खटाई माँगी तो उन्होंने न दी, फिर पैसे माँगे तो दिए, और हमने इमली खरीदकर खाई, क्या माँ यह ठीक है?' गंगा की जिठानियाँ बहुत प्रसन्न हुईं, क्योंकि वे अपने प्रयत्न में सफल हुई थीं।

दूसरे दिन प्रातःकाल गंगा के पति के पास राजा का बुलावा आया। गंगा डर गई कि क्या काम होगा, कहीं उसके ऊपर कोई दोष तो नहीं आया? वह माँ से प्रार्थना करने बैठ गई। इस बीच गोरधन तैयार होकर राजा के दरबार में गया और प्रणाम करके अदब से खड़ा रहा। गंगा की जिठानियों ने पड़ोस में यह बात फैला दी कि गंगा के पति ने राज्य का कर नहीं चुकाया, इसलिए उसे दंड देने बुलाया गया है। यह सुनकर गंगा का डर और बढ़ गया। उसने माँ के नाम का दीपक जलाया और प्रार्थना करने लगी: 'हे संतोषी माँ! आपके व्रत में या व्रत के उद्यापन में यदि कोई भूल हो गई हो, तो क्षमा करना।' इस प्रकार बहुत प्रार्थना करने पर अदृश्य वाणी सुनाई दी: 'बेटी, तूने मेरे व्रत का उद्यापन किया, उस समय तेरी जिठानियों के पुत्रों को खटाई खाने को न दी, यह अच्छा किया, पर तूने उन्हें पैसे दिए, जिससे वे इमली ले आए और तेरे कमरे में बैठकर खाई, क्या इससे व्रत का भंग हुआ या नहीं?' गंगा बोली: 'भूल हो गई माँ, फिर भी मैंने जानबूझकर ऐसा नहीं किया, मैंने भोले भाव से लड़कों को पैसे दे दिए थे। हे मैया, अब भूल नहीं करूँगी। मेरे पति को राजा का बुलावा आया है, वे वहाँ गए हैं, इससे मुझे चिंता हो रही है कि वे कब लौटेंगे?' अदृश्य वाणी आई: 'बेटी, तेरी भक्ति सच्ची है, तेरे शत्रु भी तेरे दास हो जाएँगे, जो बलवान होंगे वे निर्बल हो जाएँगे, इसी प्रकार राजा भी उसके प्रति रोष नहीं करेगा, मेरे भक्तों को दुःख हो, ऐसा होगा ही नहीं।'

घंटे भर बाद गोरधन घर आ पहुँचा। राजा उसकी चतुराई पर मुग्ध होकर उसे हीरे जड़ित अँगूठी भेंट कर चुका था, और उसकी उँगली पर झिलमिलाती अँगूठी देखकर गंगा समझ गई कि शुभ समाचार है। इस बात की खबर सुनकर गंगा की जिठानियाँ और अधिक जलने लगीं। फिर से शुक्रवार आया, और गंगा ने माँ के व्रत का उद्यापन फिर से किया। इस बार वह आस-पड़ोस के ब्राह्मणों के बालकों को भोजन के लिए बुला लाई और सबको भलीभाँति खिलाकर, वस्त्र देकर विदा किया। गंगा की अटल भक्ति और अविचल श्रद्धा देखकर संतोषी माँ उस पर प्रसन्न हुईं। उसे सारा सुख था, पर पुत्र की कमी थी, संतोषी माँ ने यह कमी भी दूर कर दी। गंगा के अच्छे दिन आए, और नौ महीने बाद गंगा ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। इससे गंगा का पति गोरधन इतना प्रसन्न हुआ कि उसने सवा पाँच मन के पेड़े लाकर गाँव में बँटवाए। सबने मुँह मीठा किया, पर गंगा की जिठानियों ने न स्वयं पेड़े खाए, न अपने लड़कों को खाने दिया, उस दिन सबके गले के नीचे भोजन न उतरा, क्योंकि उनकी देवरानी को पुत्र हुआ था। सवा महीना होने पर गंगा नहा-धोकर पुत्र को लेकर संतोषी माँ के मंदिर गई। वहाँ पुत्र को माँ की मूर्ति के समक्ष रखकर कहने लगी: 'माँ, यह आपके व्रत का फल है, अब हमें आशीर्वाद दीजिए कि हम सब सुख-संतोष में रहें और सदा आपकी भक्ति करते रहें।' उस समय अदृश्य वाणी सुनाई दी: 'बेटी, आज नहीं, मैं किसी भी समय स्वयं वहाँ आकर तुझे आशीर्वाद दे जाऊँगी, पर उस समय तू मुझे पहचानने में भूल न करना, वरना तेरा दुर्भाग्य, इसे ध्यान में रखना।'

अध्याय · वेश बदलकर आई संतोषी माँ

गंगा पुत्र को लेकर घर आई, उस दिन से उसने घर के आँगन में आने वाले हर एक व्यक्ति पर ध्यान रखना शुरू किया।

एक दिन अस्सी वर्ष की एक बुढ़िया गुड़ और भुने चने खाती-खाती, पुकारती हुई, उसके घर के आगे आई। उसके मुँह पर मक्खियाँ भिनभिनाती थीं, और उसके शरीर से ऐसी दुर्गंध निकलती थी कि सिर फट जाए। सब उसे मार-मारकर भगाने लगे और गालियाँ देने लगे, पर वह बुढ़िया घर के आगे ही डटी रही। उस समय गंगा पुत्र को लेकर खिड़की के पास खड़ी थी। उसके मन में हुआ कि संतोषी माँ ऐसा ही रूप धरकर आई हैं, इसलिए वह आशीर्वाद लेने नीचे उतर आई, पर उसकी सास ने घर के किवाड़ बंद कर दिए, सबको उस आई हुई बुढ़िया से डर लगता था।

गंगा उलझन में पड़ गई कि अब क्या करे। फिर वह ऊपरी मंज़िल की खिड़की के पास आई और संतोषी माँ के भरोसे पुत्र को नीचे फेंकने के लिए हाथ आगे बढ़ाया। नीचे खड़ी बुढ़िया ने भी हाथ फैलाए, और ज्यों ही गंगा ने पुत्र को नीचे फेंका, उस बुढ़िया ने उसे झेल लिया। साथ ही किवाड़ खुलने की आवाज़ सुनाई दी। गंगा नीचे उतरकर बुढ़िया के पास गई, तो देखा कि उस बुढ़िया के आसपास प्रकाश फैला हुआ है और पुत्र उसके हाथों में खेल रहा है।

गंगा बुढ़िया के चरणों में गिर पड़ी, वह बुढ़िया स्वयं संतोषी माँ थीं। उन्होंने गंगा को उठाकर आशीर्वाद दिया: 'तुम्हारा कल्याण हो, और जब तक जियो तब तक आनंद करो।' इतना कहकर वह बुढ़िया अंतर्धान हो गईं। सबने यह चमत्कार अपनी आँखों से देखा, और फिर वे मन-ही-मन बहुत पछताने लगे, क्योंकि उन्होंने माँ का आशीर्वाद पाने का सुनहरा अवसर गँवा दिया था। उसी दिन से सारे गाँव में गंगा का आदर बढ़ गया। घर में भी उसकी जिठानियों और सास ने द्वेष भाव छोड़ दिया, वे भी संतोषी माँ का व्रत करने लगीं, इससे थोड़े ही दिनों में घर भर में शांति स्थापित हो गई, और संतोषी माता के प्रभाव से हर एक गृहिणी के घर में समृद्धि फिर लौट आई।

हे संतोषी माँ! जिस प्रकार आपने गंगा बहू पर प्रसन्न होकर उसकी मनोकामना पूर्ण की, उसी प्रकार संतोषी माँ के शुक्रवार को इस कथा को कहने-सुनने वाले सभी की मनोकामना पूर्ण करना। आपकी जय-जयकार हो, संतोषी मैया, आपकी महिमा अपार है, संतोषी मैया।

इसी देवता की चालीसा
श्री संतोषी माता चालीसा
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इसी देवता की आरती
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संतोषी माता व्रत कथा पाठ विधि

यह व्रत किसी भी शुक्रवार से आरंभ करें। संध्या समय स्नान कर घी का दीपक जलाएं, जल भरा कलश रखें और उस पर कटोरी में गुड़-चने रखकर एकचित्त हो व्रत-कथा सुनें, फिर आरती कर प्रसाद बांटें। कथा सुनने तक निराहार रहें, और उद्यापन तक किसी भी दिन खटाई का सेवन न करें। मनोकामना पूर्ण होने पर आठ बालकों को भोजन-वस्त्र देकर उद्यापन करें।

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संतोषी माता व्रत कथा के बारे में

संतोषी माता व्रत कथा एक गृहवधू गंगा की कथा है, जो छह अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में गंगा अपने पति गोरधन के घर में हो रहे अनादर की सच्चाई उजागर करती है, जिससे गोरधन परदेस कमाने निकल पड़ता है। दूसरे अध्याय में गोरधन माधवपुर में व्यापार में सफल होता है और इधर गंगा एक स्त्री से संतोषी माता के व्रत की विधि सीखती है। तीसरे अध्याय में गंगा का पहला व्रत और संतोषी माता की कृपा से गोरधन की वापसी है। चौथे अध्याय में घर लौटकर सास के अनादर की सच्चाई सबके सामने आती है। पांचवें अध्याय में जिठानियों द्वारा व्रत के उद्यापन को भंग करने का प्रयास, राजा का बुलावा और पुत्र-प्राप्ति की कथा है, और छठे अध्याय में संतोषी माता स्वयं वृद्धा का रूप धरकर गंगा की परीक्षा लेती हैं।

यह व्रत विशेष रूप से शुक्रवार को सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ति की कामना से किया जाता है। इस पृष्ठ पर छहों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।

संतोषी माता व्रत कथा का कोई प्राचीन पौराणिक स्रोत नहीं है। संतोषी माता की पूजा एक लोक-परंपरा है जो बीसवीं सदी में, विशेषकर सन् १९७५ की फिल्म 'जय संतोषी माँ' के बाद, घर-घर में फैली, और यह कथा शुक्रवार व्रत के साथ मौखिक व मुद्रित रूप में प्रचलित हुई। यहां प्रस्तुत पाठ एक प्रकाशित हिंदी व्रत-कथा संग्रह पुस्तिका में छपी संतोषी माता व्रत कथा का यथावत रूपांतरण है, जिसमें केवल स्पष्ट मुद्रण-त्रुटियां सुधारी गई हैं, कथा में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। चूंकि इस कथा का कोई एकल, प्राचीन मूल पाठ नहीं है, अन्य मुद्रित संस्करणों में पात्रों के नाम व शब्दों का हेरफेर मिल सकता है।

रचनाकार
अज्ञात
लोक-प्रचलित व्रत कथा

सामान्य प्रश्न

संतोषी माता व्रत कथा में कुल कितने अध्याय हैं?

इसमें कुल छह अध्याय हैं, जो गंगा नामक गृहवधू की कथा को क्रमबद्ध रूप से बताते हैं और एक साथ पूर्ण पाठ के रूप में पढ़े या सुने जाते हैं।

संतोषी माता व्रत कब किया जाता है?

यह व्रत प्रत्येक शुक्रवार को किया जाता है, अक्सर लगातार सोलह शुक्रवार तक।

संतोषी माता व्रत में खटाई क्यों वर्जित है?

जैसा कथा के पांचवें अध्याय में बताया गया है, व्रत और विशेषकर उसके उद्यापन के समय खटाई (इमली, नींबू, अचार आदि) का सेवन वर्जित माना जाता है, अन्यथा व्रत भंग होने की मान्यता है।

संतोषी माता व्रत कथा में गंगा कौन हैं?

गंगा एक गृहवधू हैं जिनकी भक्ति और सहनशीलता की परीक्षा इस कथा में ली जाती है। उनके धैर्य और श्रद्धा से संतोषी माता प्रसन्न होकर उनके घर में सुख-समृद्धि लौटाती हैं।

क्या संतोषी माता व्रत में विशेष पूजन सामग्री चाहिए?

नहीं, जैसा कथा में बताया गया है, यह व्रत घी का दीपक, जल से भरा कलश और गुड़-चने जैसी सामान्य सामग्री से ही किया जा सकता है, इसलिए यह गरीब से गरीब व्यक्ति भी कर सकता है।

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पाठ विवरण

रचनाकारअज्ञात
संरचना६ अध्याय
पाठ समय१३ मिनट