पाठ विवरण
बन्दौं सन्तोषी चरण, रिद्धि-सिद्धि दातार।
ध्यान धरत ही होत नर, दुःख सागर से पार॥
भक्तन को सन्तोष दे, सन्तोषी तव नाम।
कृपा करहु जगदम्ब, अब आया तेरे धाम॥
जय सन्तोषी मात अनूपम।
शान्ति दायिनी रूप मनोरम॥
सुन्दर वरण चतुर्भुज रूपा।
वेश मनोहर ललित अनुपा॥
श्वेताम्बर रूप मनहारी।
माँ तुम्हारी छवि जग से न्यारी॥
दिव्य स्वरूपा आयत लोचन।
दर्शन से हो संकट मोचन॥
जय गणेश की सुता भवानी।
रिद्धि-सिद्धि की पुत्री ज्ञानी॥
अगम अगोचर तुम्हरी माया।
सब पर करो कृपा की छाया॥
नाम अनेक तुम्हारे माता।
अखिल विश्व है तुमको ध्याता॥
तुमने रूप अनेकों धारे।
को कहि सके चरित्र तुम्हारे॥
धाम अनेक कहाँ तक कहिये।
सुमिरन तब करके सुख लहिये॥
विन्ध्याचल में विन्ध्यवासिनी।
कोटेश्वर सरस्वती सुहासिनी॥
कलकत्ते में तू ही काली।
दुष्ट नाशिनी महाकराली॥
सम्बल पुर बहुचरा कहाती।
भक्तजनों का दुःख मिटाती॥
ज्वाला जी में ज्वाला देवी।
पूजत नित्य भक्त जन सेवी॥
नगर बम्बई की महारानी।
महा लक्ष्मी तुम कल्याणी॥
मदुरा में मीनाक्षी तुम हो।
सुख दुख सबकी साक्षी तुम हो॥
राजनगर में तुम जगदम्बे।
बनी भद्रकाली तुम अम्बे॥
पावागढ़ में दुर्गा माता।
अखिल विश्व तेरा यश गाता॥
काशी पुराधीश्वरी माता।
अन्नपूर्णा नाम सुहाता॥
सर्वानन्द करो कल्याणी।
तुम्हीं शारदा अमृत वाणी॥
तुम्हरी महिमा जल में थल में।
दुःख दारिद्र सब मेटो पल में॥
जेते ऋषि और मुनीशा।
नारद देव और देवेशा॥
इस जगती के नर और नारी।
ध्यान धरत हैं मात तुम्हारी॥
जापर कृपा तुम्हारी होती।
वह पाता भक्ति का मोती॥
दुःख दारिद्र संकट मिट जाता।
ध्यान तुम्हारा जो जन ध्याता॥
जो जन तुम्हरी महिमा गावै।
ध्यान तुम्हारा कर सुख पावै॥
जो मन राखे शुद्ध भावना।
ताकी पूरण करो कामना॥
कुमति निवारि सुमति की दात्री।
जयति जयति माता जगधात्री॥
शुक्रवार का दिवस सुहावन।
जो व्रत करे तुम्हारा पावन॥
गुड़ छोले का भोग लगावै।
कथा तुम्हारी सुने सुनावै॥
विधिवत पूजा करे तुम्हारी।
फिर प्रसाद पावे शुभकारी॥
शक्ति-सामरथ हो जो धनको।
दान-दक्षिणा दे विप्रन को॥
वे जगती के नर औ नारी।
मनवांछित फल पावें भारी॥
जो जन शरण तुम्हारी जावे।
सो निश्चय भव से तर जावे॥
तुम्हरो ध्यान कुमारी ध्यावे।
निश्चय मनवांछित वर पावै॥
सधवा पूजा करे तुम्हारी।
अमर सुहागिन हो वह नारी॥
विधवा धर के ध्यान तुम्हारा।
भवसागर से उतरे पारा॥
जयति जयति जय संकट हरणी।
विघ्न विनाशन मंगल करनी॥
हम पर संकट है अति भारी।
वेगि खबर लो मात हमारी॥
निशिदिन ध्यान तुम्हारो ध्याता।
देह भक्ति वर हम को माता॥
यह चालीसा जो नित गावे।
सो भवसागर से तर जावे॥
संतोषी माँ के सदा, बंदहूँ पग निश वास।
पूर्ण मनोरथ हो सकल, मात हरौ भव त्रास॥
व्रत में कई बार पाठ किया जाता है: ११, २१ या १०८ बार। इस काउंटर से अपनी पाठ गिनती सहेजें।
श्री संतोषी माता चालीसा पाठ विधि
प्रतिदिन अथवा विशेषकर शुक्रवार को स्नान के पश्चात दीप जलाकर इस चालीसा का पाठ करें, तथा गुड़-चने का भोग अर्पित करें। पूर्ण पाठ के अंत में समापन दोहा अवश्य दोहराएँ।
श्री संतोषी माता चालीसा के बारे में
श्री संतोषी माता चालीसा माँ संतोषी की स्तुति में रचित चालीसा है, जिसमें उनके स्वरूप, भगवान गणेश की पुत्री के रूप में उनके उद्भव, तथा भारत भर की विभिन्न देवियों के साथ उनकी एकरूपता का वर्णन है। रचना दो दोहों से आरंभ होकर चालीस चौपाइयों में आगे बढ़ती है और एक दोहे के साथ समाप्त होती है।
इस पृष्ठ पर पूरा पाठ शुद्ध देवनागरी में, प्रत्येक चौपाई के सरल हिंदी अर्थ के साथ दिया गया है। अक्षरों का आकार बढ़ाया जा सकता है, और पूरा पाठ प्रिंट भी किया जा सकता है।
श्री संतोषी माता चालीसा में कोई रचयिता स्वयं नामित नहीं है, इस कारण इसे अज्ञात रचनाकार की परंपरागत रचना माना जाता है। ध्यान रहे, एक अन्य भिन्न संतोषी माता चालीसा भी प्रचलित है, जो 'जय संतोषी मां जग जननी' पंक्ति से आरंभ होती है, यह पृष्ठ 'जय सन्तोषी मात अनूपम' से आरंभ होने वाली उस चालीसा को प्रस्तुत करता है, जो भगवान गणेश व ऋद्धि-सिद्धि की पुत्री के रूप में संतोषी माता का वर्णन करती है, तथा उन्हें भारत भर के विभिन्न शक्तिपीठों की देवियों, विंध्यवासिनी, काली, महालक्ष्मी, मीनाक्षी, दुर्गा, अन्नपूर्णा आदि, के समान बताती है।
संतोषी माता चालीसा पाठ के लाभ
मान्यता है कि नियमित पाठ व शुक्रवार व्रत से दुःख, दरिद्रता व संकट दूर होते हैं तथा मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं; चालीसा में स्वयं कहा गया है कि जो भी इनकी शरण लेता है, वह निश्चय ही भवसागर से पार हो जाता है।
सामान्य प्रश्न
श्री संतोषी माता चालीसा की रचना किसने की?
चालीसा में कोई रचयिता स्वयं नामित नहीं है, इसलिए इसे अज्ञात रचनाकार की परंपरागत रचना माना जाता है।
क्या संतोषी माता की एक ही चालीसा है?
नहीं, एक अन्य भिन्न चालीसा भी प्रचलित है जो 'जय संतोषी मां जग जननी' पंक्ति से आरंभ होती है। यह पृष्ठ 'जय सन्तोषी मात अनूपम' से आरंभ होने वाली चालीसा प्रस्तुत करता है।
इसमें कुल कितनी चौपाई हैं?
दो आरंभिक दोहे, चालीस चौपाई और एक समापन दोहा है।
पाठ का उत्तम समय क्या है?
प्रतिदिन अथवा विशेषकर शुक्रवार को, स्नान के पश्चात दीप जलाकर पढ़ना उत्तम माना जाता है।
क्या अर्थ जानना आवश्यक है?
आवश्यक नहीं, परंतु अर्थ सहित पाठ करने से भाव स्पष्ट होता है। इस पृष्ठ पर प्रत्येक चौपाई का सरल अर्थ साथ में दिया गया है।
संतोषी माता चालीसा पढ़ने के क्या लाभ हैं?
मान्यता है कि नियमित पाठ व शुक्रवार व्रत से दुःख, दरिद्रता व संकट दूर होते हैं तथा मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं; चालीसा में स्वयं कहा गया है कि जो भी इनकी शरण लेता है, वह निश्चय ही भवसागर से पार हो जाता है।
