पाठ विवरण
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।
अपने सेवक जन की, सुख सम्पत्ति दाता॥
सुंदर चीर सुनहरी, मां धारण कीन्हों।
हीरा पन्ना दमके, तन श्रृंगार लीन्हों॥
गेरू लाल छटा छवि, बदन कमल सोहे।
मंद हंसत करुणामयी, त्रिभुवन जन मोहे॥
स्वर्ण सिंहासन बैठी, चंवर ढुरे प्यारे।
धूप दीप मधु मेवा, भोग धरे न्यारे॥
गुड़ अरु चना परम प्रिय, तामें संतोष कियो।
संतोषी कहलाई, भक्तन वैभव दियो॥
शुक्रवार प्रिय मानत, आज दिवस सोही।
भक्त मंडली छाई, कथा सुनत मोही॥
मंदिर जगमग ज्योति, मंगल ध्वनि छाई।
विनय करें हम बालक, चरनन सिर नाई॥
भक्ति भावमय पूजा, अंगीकृत कीजै।
जो मन बसे हमारे, इच्छित फल दीजै॥
दुखी दरिद्री रोगी, संकटमुक्त किए।
बहु धनधान्य भरे घर, सुख सौभाग्य दिए॥
ध्यान धर्यो जिस जन ने, मनवांछित फल पायो।
पूजा कथा श्रवण कर, घर आनंद आयो॥
शरण गहे की लज्जा, राखियो जगदंबे।
संकट तू ही निवारे, दयामयी अंबे॥
संतोषी माता की आरती, जो कोई नर गावे।
ऋद्धि-सिद्धि सुख संपत्ति, जी भरकर पावे॥
व्रत में कई बार पाठ किया जाता है: ११, २१ या १०८ बार। इस काउंटर से अपनी पाठ गिनती सहेजें।
श्री संतोषी माता आरती पाठ विधि
शुक्रवार के दिन व्रत रखकर, गुड़-चने का भोग लगाकर पाठ करें। खट्टी वस्तु का सेवन इस दिन वर्जित माना जाता है। प्रत्येक कड़ी के बाद स्थायी पंक्ति 'जय संतोषी माता' दोहराएं।
श्री संतोषी माता आरती के बारे में
संतोषी माता आरती माँ संतोषी की स्तुति में गाई जाने वाली आरती है, जिसमें उनके स्वर्ण सिंहासन, गुड़-चने के प्रिय भोग और शुक्रवार व्रत की महिमा का वर्णन है। रचना एक स्थायी पंक्ति से आरंभ होकर ग्यारह कड़ियों में आगे बढ़ती है, प्रत्येक कड़ी के बाद स्थायी पंक्ति दोहराई जाती है।
इस पृष्ठ पर पूरा पाठ शुद्ध देवनागरी में, प्रत्येक कड़ी के सरल हिंदी अर्थ के साथ दिया गया है। अक्षरों का आकार बढ़ाया जा सकता है, और पूरा पाठ प्रिंट भी किया जा सकता है।
अज्ञात के बारे में
इस आरती के रचयिता का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता, और न ही किसी कड़ी में कोई हस्ताक्षर मिलता है। संतोषी माता की पूजा उत्तर भारत में विशेष रूप से बीसवीं सदी में लोकप्रिय हुई, और सन् १९७५ की फिल्म 'जय संतोषी माँ' ने इसे घर-घर तक पहुंचाया — यद्यपि लोक-परंपरा में उन्हें गणेश जी की पुत्री और शुक्रवार व्रत की देवी के रूप में पहले से पूजा जाता रहा है। यह आरती आज शुक्रवार व्रत का एक अनिवार्य भाग मानी जाती है।
सामान्य प्रश्न
संतोषी माता आरती की रचना किसने की?
इसके रचयिता का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता — किसी भी कड़ी में कोई हस्ताक्षर नहीं मिलता।
संतोषी माता कौन हैं?
लोक-परंपरा में उन्हें गणेश जी की पुत्री और संतोष की देवी माना जाता है। उनकी पूजा शुक्रवार व्रत के साथ जुड़ी है, और सन् १९७५ की फिल्म 'जय संतोषी माँ' के बाद यह और अधिक लोकप्रिय हुई।
आरती की संरचना क्या है?
एक स्थायी पंक्ति और ग्यारह कड़ियां हैं। प्रत्येक कड़ी के बाद स्थायी पंक्ति दोहराई जाती है।
शुक्रवार व्रत की विधि क्या है?
शुक्रवार को व्रत रखकर गुड़-चने का भोग अर्पित किया जाता है, और इस दिन खट्टी वस्तुओं का सेवन वर्जित माना जाता है।
क्या अर्थ जानना आवश्यक है?
आवश्यक नहीं, परंतु अर्थ सहित पाठ करने से भाव स्पष्ट होता है। इस पृष्ठ पर प्रत्येक कड़ी का सरल अर्थ साथ में दिया गया है।