निशीथ काल पूजा का सटीक समय प्रतिवर्ष व शहर अनुसार बदलता है, इसलिए नज़दीकी पंचांग देखें। ध्यान रहे कि यह वार्षिक महाशिवरात्रि है, जो प्रत्येक मास आने वाली 'मासिक शिवरात्रि' से अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है।
महाशिवरात्रि का महत्व
महाशिवरात्रि की रात्रि को अनेक पौराणिक कथाएं जुड़ी हैं। एक मान्यता है कि इसी रात्रि भगवान शिव और मां पार्वती का विवाह हुआ था। एक अन्य कथा के अनुसार, समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को इसी दिन भगवान शिव ने कंठ में धारण किया था, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे 'नीलकंठ' कहलाए। तीसरी मान्यता के अनुसार, इसी रात्रि भगवान शिव पहली बार 'ज्योतिर्लिंग' के रूप में प्रकट हुए थे।
महाशिवरात्रि की रात्रि को चार प्रहरों में विभाजित कर पूजा की जाती है, जिसे 'चार प्रहर पूजा' कहा जाता है। प्रत्येक प्रहर में शिवलिंग का अभिषेक भिन्न-भिन्न पदार्थों, जल, दूध, दही, शहद और घी, से किया जाता है, तथा 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप किया जाता है।
भक्त इस रात्रि को निर्जला व्रत रखकर जागरण करते हैं, यह मानते हुए कि रात्रि जागकर तमस (आलस्य व अज्ञान) पर विजय पाई जा सकती है। महाशिवरात्रि को शिव भक्तों के लिए वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण रात्रि माना जाता है।
महाशिवरात्रि कैसे मनाई जाती है
प्रातःकाल स्नान कर भक्त शिव मंदिर जाकर शिवलिंग पर जल, दूध व बेलपत्र अर्पित करते हैं। दिनभर निर्जला अथवा फलाहार व्रत रखा जाता है।
रात्रि को चार प्रहर पूजा की जाती है, जिसमें प्रत्येक प्रहर में शिवलिंग का अभिषेक कर आरती की जाती है, तथा शिव चालीसा, महामृत्युंजय मंत्र व रुद्राभिषेक का पाठ किया जाता है।
अनेक मंदिरों में रात्रिभर भजन-कीर्तन व जागरण का आयोजन होता है। अगली सुबह निशीथ काल पूजा के पश्चात, ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर व्रत का पारण किया जाता है।
महाशिवरात्रि पूजा विधि
प्रातःकाल स्नान कर शिव मंदिर में जल, दूध व बेलपत्र अर्पित करें। दिनभर निर्जला अथवा फलाहार व्रत रखें। रात्रि को चार प्रहरों में शिवलिंग का जल, दूध, दही, शहद व घी से अभिषेक कर, प्रत्येक प्रहर में आरती करें तथा 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करें। अगली सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर व्रत का पारण करें।
महाशिवरात्रि के बारे में
महाशिवरात्रि भगवान शिव की आराधना की सर्वाधिक महत्वपूर्ण रात्रि है, जो फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी को मनाई जाती है। इस पृष्ठ पर महाशिवरात्रि का महत्व, शिव-पार्वती विवाह व नीलकंठ की कथा, चार प्रहर पूजा तथा घर व मंदिर में पूजा-विधि की जानकारी दी गई है।
इस पृष्ठ की जानकारी बड़े अक्षरों व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है, ताकि रात्रि जागरण के दौरान भी सुविधापूर्वक पढ़ी जा सके।
सामान्य प्रश्न
महाशिवरात्रि कब मनाई जाती है?
महाशिवरात्रि प्रत्येक वर्ष फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है, जो सामान्यतः फरवरी-मार्च में आती है।
चार प्रहर पूजा क्या है?
महाशिवरात्रि की रात्रि को चार प्रहरों (हिस्सों) में बांटकर पूजा की जाती है, जिसमें हर प्रहर में शिवलिंग का भिन्न पदार्थ से अभिषेक कर आरती की जाती है।
महाशिवरात्रि और मासिक शिवरात्रि में क्या अंतर है?
मासिक शिवरात्रि प्रत्येक हिंदी माह की कृष्ण चतुर्दशी को आती है, जबकि महाशिवरात्रि वर्ष में एक बार फाल्गुन मास में आती है और सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है।
व्रत के दौरान जल ग्रहण किया जा सकता है?
यह श्रद्धा व सामर्थ्य पर निर्भर करता है, अधिकांश भक्त निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कुछ फलाहार व जल ग्रहण करते हुए व्रत रखते हैं।
शिवलिंग पर बेलपत्र क्यों अर्पित किया जाता है?
बेलपत्र भगवान शिव को अत्यंत प्रिय माना जाता है, और इसे तीन पत्तियों के रूप में त्रिनेत्र अथवा त्रिशूल का प्रतीक मानकर अर्पित किया जाता है।
