अध्याय १ · कैलाश पर पार्वती का प्रश्न
श्री परम पावन भूमि कैलाश पर्वत पर विशाल वट वृक्ष के नीचे भगवान शिव, पार्वती सभी गणों सहित बाघाम्बर पर विराजमान थे। बलवान वीरभद्र, भृंगी, श्रृंगी, नंदी आदि अपने-अपने पहरों पर सदाशिव के दरबार की शोभा बढ़ा रहे थे। गंधर्वगण, किन्नर, ऋषिवर भगवान शंकर की विधि-विधान अनुष्ठान छंदों से स्तुति गान स्वर आलापों से वाद्यों में संलग्न थे। उसी सुअवसर पर महारानी पार्वती जी ने भगवान शिव से दोनों हाथ जोड़कर प्रश्न किया कि हे महेश्वर, मेरे बड़े सौभाग्य हैं जो मैंने आप सरीखे अर्धांगी पति को वरण किया। क्या मैं जान सकती हूं कि मैंने वह कौन-सा पुण्य अर्जन किया है, आप अंतर्यामी हैं, मुझ दासी को वर्णन करने की कृपा करें।
महारानी पार्वती की ऐसी प्रार्थना सुनने पर शिवजी बोले: हे पार्वती, तुमने अति उत्तम पुण्य का संग्रह किया था, जिससे मुझे प्राप्त किया है। वह अति गुप्त व्रत है, पर तुम्हारे आग्रह पर प्रगट करता हूं। वह यह कि भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की तीज व्रत के नाम से प्रसिद्ध है। यह व्रत जैसे तारागणों में चंद्रमा, नवग्रहों में सूर्य, वर्णों में ब्राह्मण, देवताओं में गंगा, पुराणों में महाभारत, वेदों में साम, इंद्रियों में मन, ऐसा ही यह श्रेष्ठ व्रत है, जो तीज हस्त नक्षत्र युक्त पड़े वह और भी महान पुण्यदायक होता है।
ऐसा सुनकर माता पार्वती जी ने कहा: हे महेश्वर, मैंने कब और कैसे तीज व्रत किया था, विस्तार के साथ श्रवण करने की इच्छा है। इतना सुनकर भगवान शंकर बोले कि भाग्यवान उमा, भारतवर्ष के उत्तर में हिमाचल श्रेष्ठ पर्वत है, उसके राजा का नाम हिमाचल है। वहां तुम भाग्यवती रानी मैना से पैदा हुई थीं, तुमने बाल्यकाल से ही मेरी आराधना करना आरंभ कर दिया था।
अध्याय २ · कठोर तपस्या और नारद जी का संदेश
कुछ उम्र बढ़ने पर तुमने हिमाचल की दुर्गम गुफाओं में जाकर सहेली सहित मुझे पाने हेतु तप आरंभ कर दिया। तुमने ग्रीष्म ऋतु में बाहर पानी में तप किया, हिम ऋतु में पानी में खड़े होकर मेरे ध्यान में संलग्न रहीं। इस प्रकार छः ऋतुओं में तपस्या करके भी जब मेरे दर्शन न मिले, तब तुम ऊर्ध्वमुख होकर केवल वायु सेवन की, फिर वृक्षों के सूखे पत्ते खाकर इस शरीर को क्षीण किया।
ऐसी तपस्या में लीन देखकर महाराज हिमाचल को अति चिंता हुई और तुम्हारे विवाह हेतु चिंता करने लगे, इस सुअवसर पर महर्षि नारद जी उपस्थित हो गये। राजा ने अति हर्ष के साथ स्वागत-पूजन किया और आगमन का कारण पूछा।
नारद जी ने कहा: हे राजन, मुझे भगवान विष्णु ने भेजा है। मैं चाहता हूं कि आपकी सुंदर कन्या को योग्य वर प्राप्त हो, सो वैकुंठ निवासी शेषशायी भगवान ने आपकी कन्या का वरण स्वीकार किया है, क्या आपको स्वीकार है? राजा हिमाचल ने कहा: महाराज, मेरा सौभाग्य है जो मेरी कन्या को विष्णु जी ने स्वीकार किया, और मैं अवश्य ही उन्हें अपनी कन्या का कन्यादान करूंगा। यह सुनिश्चित हो जाने पर नारद जी वैकुंठ पहुंचकर श्री विष्णु भगवान से पार्वती के विवाह का पूर्ण होना सुनाया।
अध्याय ३ · सखी के साथ वन-गमन
इधर महाराज हिमाचल ने वन में पहुंचकर पार्वती जी से कहा कि भगवान विष्णु से विवाह होना निश्चय हो चुका है। ऐसा सुनते ही पार्वती जी को महान दुःख हुआ। उस दुःख से विह्वल होकर अपनी सखी के पास पहुंचकर विलाप करने लगीं, तो तुम्हारा विलाप देखकर सखी ने तुम्हारी इच्छा जानकर कहा: देवी, मैं तुम्हें ऐसी गुफा में तपस्या को ले चलूंगी, जहां महाराज हिमाचल भी न जा सकेंगे।
ऐसा कह उमा सहेली सहित हिमाचल के गहन गह्वर में विलीन हो गईं। तब महाराज हिमाचल घबराकर पार्वती को ढूंढ़ते हुए विलाप करने लगे कि मैंने विष्णु को वचन दिया है, यह कैसे पूर्ण हो सकेगा, ऐसा कह मूर्च्छित हो गये। तब सभी पुरवासियों को साथ लेकर ढूंढ़ने को महाराज ने प्रस्थान किया, यह चिंता करते हुए कि कहीं मेरी कन्या को व्याघ्र खा गया, या सर्प ने डस लिया, या राक्षस हर के ले गया।
उस समय तुम अपनी सखी के साथ ही गहन गुफा में पहुंचकर, बिना जल-अन्न के, मेरे व्रत का आरंभ करके नदी की बालू से शिव प्रतिमा स्थापित कर विविध वन-पुष्प, फलों से पूजन करने लगीं।
अध्याय ४ · शिवलिंग की स्थापना और भगवान का प्रकट होना
उसी दिन भाद्रमास तृतीया शुक्ल पक्ष हस्त नक्षत्र युक्त प्राप्त थी। मेरी पूजा के फलस्वरूप मैं और मेरा सिंहासन हिल उठा। मैंने जाकर तुम्हें दर्शन दिया और तुमसे कहा: हे देवी, मैं तुम्हारे व्रत और पूजन से अति प्रसन्न हूं, तुम अपनी कामना मुझसे वर्णन करो। इतना सुन तुमने लज्जित भाव से प्रार्थना की कि आप अंतर्यामी हैं, मेरे मन के भाव आपसे छिपे नहीं हैं, आपको पति के रूप में चाहती हूं। इतना सुनकर मैंने तुम्हें एवमस्तु कहकर इच्छित वरदान देकर अंतर्धान हो गया।
इसके बाद तुम्हारे पिता हिमाचल मंत्रियों सहित तुम्हें ढूंढते-ढूंढते नदी तट पर पहुंचे। उसी समय तुम सहेली के साथ मेरी बालू की मूर्ति विसर्जन हेतु नदी तट पर ले पहुंचीं। उसी समय तुम्हारे नगर निवासी, मंत्रीगण सहित राजा हिमाचल तुम्हारे दर्शन कर अति प्रसन्नता को प्राप्त हुए और तुमसे लिपट-लिपट कर रोने लगे और कहा: तुम अपनी सहेली के साथ इस भयंकर वन में कैसे चली आईं, जो अति भयानक है, जहां सिंह, व्याघ्र, जहरीले भयंकर सर्पों का निवास है, जहां मनुष्य के प्राण संकट में हो सकते हैं। इसलिए हे पुत्री, इस भयंकर वन को त्यागकर अपने गृह को प्रस्थान करो।
अध्याय ५ · पिता की स्वीकृति और विवाह
पिता के ऐसा कहने पर तुमने कहा: हे पिताश्री, मेरा विवाह आपने भगवान विष्णु के साथ स्वीकार कर दिया, इससे मैं इसी वन में रहकर अपने प्राण विसर्जन करूंगी। यह सुनकर महाराज हिमाचल अति दुखी हुए और बोले: प्यारी पुत्री, तुम शोक मत करो, मैं तुम्हारा विवाह कदापि भगवान विष्णु के साथ न करूंगा, तुम्हारा अभीष्ट वर जो तुम्हें प्राप्त है, उन्हीं सदाशिव के साथ करूंगा। तुम पुत्री मुझ पर अति प्रसन्न हो, तब सखी के साथ नगर में उपस्थित होकर अपनी माता, सखियों से मिलने लगीं।
कुछ समय बाद शुभ मुहूर्त में मेरा विवाह वेदविधि के साथ महाराज हिमाचल व महारानी मैना ने मेरे साथ कर पुण्य का अर्जन किया। हे सौभाग्यशाली, जो सखी ने हरण कर हिमालय की गुफा में रख, मेरा तीज व्रत किया, इसी से इस व्रत का नाम हरतालिका पड़ा, और यह व्रत सब व्रतों का व्रतराज हुआ।
यह सुनकर मां पार्वती ने कहा: हे प्रभो, आपने मिलने की सुखद कथा सुनाकर मुझे प्रसन्न किया, पर इस व्रत के करने का जो विधान व इसका फल मुझे नहीं सुनाया, इसलिए कृपया करके मुझे इसके करने की विधि व पृथक-पृथक फल भी सुनाइए। इतना सुनकर भगवान सदाशिव ने कहा: प्रिये, मैं इस व्रतराज का फल सुना रहा हूं, सावधान होकर सुनो। यह व्रत सौभाग्यवती नारी व पति चाहने वाली कन्याओं को करना चाहिए। इससे श्री शंकर भगवान व माता पार्वती जी की कृपा से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। श्री शंकर-पार्वती जी से प्रार्थना करो कि हे प्रभु! जैसी आपने माता पार्वती जी की सुनी वैसी ही प्रभु आप हमारी भी सुनियो। बोलिये माता पार्वती-शंकर भगवान की जय!
अध्याय ६ · व्रत विधि, फल व महात्म्य
यह व्रत भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की द्वितीया की शाम से आरंभ करें, यह व्रत निराहार और निर्जला होकर रहना चाहिए। भगवान शिव-पार्वती की प्रतिमा सुवर्ण की स्थापित कर केले, पुष्प आदि के खंभे स्थापित करें, रेशमी वस्त्र का चंदोवा तानकर वंदनवार लगाएं, फिर बालू का शिवलिंग स्थापित कर वैदिक मंत्र, स्तुति-गान तथा भेरी, घंटा, मृदंग, झांझर आदि वाद्यों सहित रात्रि जागरण करें।
भगवान शिव के पूजन के बाद फल, फूल, पकवान, लड्डू, मेवा, मिष्ठान आदि तरह-तरह की भोग सामग्री समर्पित करें। ब्राह्मण को अन्न, वस्त्र, पान आदि श्रद्धायुक्त देना चाहिए। भगवान शिव के प्रति वस्तु को सिद्ध पंचाक्षरी मंत्र (ॐ नमः शिवाय) कहकर समर्पित करना चाहिए। प्रार्थना करते समय अपनी कामना, जो इच्छा हो, भगवान के सामने निवेदन कर प्रणाम करें, फिर माता पार्वती जी से यह प्रार्थना करें: जय जग माता, जय जग माता, मेरी भाग्य विधाता। तुम हो पार्वती, शिव प्यारी, तुम दाता नंक पुरारी। सती सत में रेख तुम्हारी, जय हो आनंद दाता। इच्छित वर मुझको तुमसे पाऊं, भूल चूक का दुख न उठाऊं, भाव-भक्ति से तुमको पाऊं, कर दो पूरन बाता।
प्रार्थना करने के बाद पुष्पों को दोनों हाथों में लेकर पुष्पांजलि समर्पण करें। फिर चतुर्थी को शिवलिंग किसी नदी व तालाब में विसर्जन करें, फिर तीन ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा दें। इस प्रकार यह व्रत पूर्ण करने से नारी सौभाग्यवती होती है व धन-धान्य व पुत्र-पौत्रों से सुखी होकर जीवन व्यतीत करती है। कन्याओं को व्रत करने से कुलीन, विद्वान, धनवान वर को प्राप्त होने का सौभाग्य होता है।
हे उमा! जो इस व्रत को श्रद्धा-विधि से धारण करती है, वह मुझसा पति प्राप्त करती है और दूसरे जन्म में तुम्हारे समान स्वरूपवान होकर संसार में उत्तम सुख भोगती है। इस व्रत को करने के बाद नारियां श्री शिवलोक की वासी होती हैं। बोलिये श्री शंकर भगवान व पार्वती माता की जय!
हरतालिका तीज व्रत कथा पाठ विधि
यह व्रत भाद्रपद शुक्ल द्वितीया की शाम से आरंभ कर निराहार-निर्जला रहें। शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित कर बालू का शिवलिंग बनाएं, वैदिक मंत्रों व वाद्यों सहित रात्रि जागरण करें, फल-फूल व मिठाई अर्पित कर व्रत-कथा सुनें, और ब्राह्मण को भोजन-दक्षिणा दें। चतुर्थी को प्रतिमा का विसर्जन कर व्रत का पारण करें। पूर्ण विधि, प्रार्थना पद और फल इस पृष्ठ के अंतिम अध्याय में विस्तार से दिए गए हैं।
हरतालिका तीज व्रत कथा के बारे में
हरतालिका तीज व्रत कथा माता पार्वती द्वारा भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए की गई तपस्या की कथा है, जो छह अध्यायों में विभक्त है और स्वयं भगवान शिव द्वारा कैलाश पर माता पार्वती को सुनाई गई है। पहले अध्याय में पार्वती का शिव से प्रश्न है, दूसरे में उनकी कठोर तपस्या और नारद जी द्वारा लाया गया विष्णु-विवाह का संदेश है, तीसरे में सखी के साथ वन-गमन की कथा है, चौथे में शिवलिंग की स्थापना और भगवान के प्रकट होने की कथा है, पांचवें में पिता की स्वीकृति और विवाह की कथा है, और छठे में व्रत की पूर्ण विधि, प्रार्थना पद और फल दिए गए हैं।
यह व्रत विशेष रूप से भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष तृतीया को विवाहित और अविवाहित स्त्रियों द्वारा सुयोग्य वर या सुखी दांपत्य जीवन की कामना से किया जाता है। इस पृष्ठ पर छहों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
हरतालिका तीज व्रत कथा का कोई एक नामित रचयिता नहीं है। यह कैलाश पर भगवान शिव द्वारा माता पार्वती को उनके ही पूर्व जन्म का स्मरण कराने हेतु सुनाई गई कथा के रूप में प्रचलित है, और इसे प्रायः भविष्य पुराण की परंपरा से जोड़ा जाता है, यद्यपि इसका कोई एकल, सर्वसम्मत पुराण-स्रोत नहीं मिलता। यहां प्रस्तुत पाठ एक प्रकाशित हिंदी हरतालिका तीज व्रत-कथा पुस्तिका का यथावत रूपांतरण है, जिसमें केवल स्पष्ट मुद्रण-त्रुटियां सुधारी गई हैं, कथा में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। शताब्दियों से चली आ रही इस कथा-परंपरा के विस्तृत विवरण में क्षेत्र और संस्करण के अनुसार थोड़ा-बहुत अंतर मिलता रहा है, इसलिए अन्य मुद्रित संस्करणों में शब्दों का हेरफेर मिल सकता है।
सामान्य प्रश्न
हरतालिका तीज व्रत कथा में कुल कितने अध्याय हैं?
इसमें कुल छह अध्याय हैं, पांच अध्यायों में कथा और अंतिम अध्याय में व्रत की पूर्ण विधि व फल, जो सब एक साथ पूर्ण पाठ के रूप में पढ़े या सुने जाते हैं।
हरतालिका तीज कब मनाई जाती है?
यह व्रत भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष तृतीया को हस्त नक्षत्र में मनाया जाता है।
हरतालिका शब्द का क्या अर्थ है?
इसे प्रायः 'हरण' और 'आलिका' (सखी) से मिलकर बना माना जाता है, अर्थात सखी द्वारा हर ली गई कन्या का व्रत, जैसा कथा के तीसरे अध्याय में वर्णित है।
हरतालिका तीज व्रत के क्या लाभ हैं?
इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करने से सुयोग्य पति की प्राप्ति होती है और दांपत्य जीवन सुखी रहता है, जैसा स्वयं भगवान शिव ने माता पार्वती को बताया था।
क्या हरतालिका तीज व्रत में जल ग्रहण किया जा सकता है?
नहीं, यह पारंपरिक रूप से निर्जला व्रत है, जो द्वितीया की शाम से आरंभ होकर तृतीया भर चलता है, और चतुर्थी को प्रतिमा-विसर्जन व पूजा के पश्चात ही इसका पारण होता है।
