अध्याय १ · कंजूस साहूकारनी की परीक्षा
किसी गांव में एक साहूकार रहता था, जिसके घर में अन्न, वस्त्र और धन किसी की कोई कमी नहीं थी, परंतु उसकी स्त्री बहुत ही कृपण थी। किसी भी भिक्षार्थी को कुछ नहीं देती, सारे दिन घर के कामकाज में लगी रहती। एक समय एक साधु-महात्मा बृहस्पतिवार के दिन उसके द्वार पर आए और भिक्षा की याचना की। स्त्री उस समय घर का आंगन लीप रही थी, इस कारण साधु महाराज से कहने लगी: 'महाराज, इस समय तो मैं घर लीप रही हूँ, आपको कुछ नहीं दे सकती, फिर किसी अवकाश के समय आना।' साधु महात्मा खाली हाथ चले गए। कुछ दिनों के पश्चात् वही साधु महात्मा आए, उसी तरह भिक्षा मांगी। साहूकारनी उस समय लड़के को खिला रही थी, कहने लगी: 'महाराज, मैं क्या करूं, अवकाश नहीं है, इसलिए आपको भिक्षा नहीं दे सकती।' तीसरी बार महात्मा आए तो उसने उन्हें उसी तरह टालना चाहा, परंतु महात्मा जी कहने लगे: 'यदि तुमको बिल्कुल ही अवकाश हो जाए, तो क्या मुझको दोगी?' साहूकारनी कहने लगी: 'हां महाराज, यदि ऐसा हो जाए तो आपकी बड़ी कृपा होगी।'
साधु-महात्मा जी कहने लगे: 'अच्छा, मैं एक उपाय बताता हूं। तुम बृहस्पतिवार को दिन चढ़े उठो, और सारे घर में झाड़ू लगाकर कूड़ा एक कोने में जमा करके रख दो। घर में चौका इत्यादि मन लगाओ। फिर स्नान आदि करके घरवालों से कह दो कि उस दिन सब हजामत अवश्य बनवाएं। रसोई बनाकर चूल्हे के पीछे रखा करो, सामने कभी न रक्खो। सायंकाल अंधेरा होने के बाद दीपक जलाओ, तथा बृहस्पतिवार को पीले वस्त्र मत धारण करो, न पीले रंग की चीज़ों का भोजन करो। यदि ऐसा करोगी तो तुमको घर का कोई काम नहीं करना पड़ेगा।' साहूकारनी ने ऐसा ही किया। बृहस्पतिवार को दिन चढ़े उठी, झाड़ू लगाकर कूड़े को घर के एक कोने में जमा करके रख दिया, पुरुषों ने हजामत बनवाई, भोजन बनवाकर चूल्हे के पीछे रखा। वह सब बृहस्पतिवारों को ऐसा ही करती रही। अब कुछ काल बाद उसके घर में खाने को दाना न रहा।
अध्याय २ · सच्ची विधि और बृहस्पति देव की कृपा
थोड़े दिनों में महात्मा फिर आए और भिक्षा मांगी, परंतु सेठानी ने कहा: 'महाराज, मेरे घर में खाने को अन्न नहीं है, आपको क्या दे सकती हूं।' तब महात्मा ने कहा: 'जब तुम्हारे घर में सब कुछ था, तब भी कुछ नहीं देती थी, अब पूरा-पूरा अवकाश है तब भी कुछ नहीं दे रही हो, तुम क्या चाहती हो वह कहो।' तब सेठानी ने हाथ जोड़कर कहा: 'महाराज, अब कोई ऐसा उपाय बताओ कि मेरे पहले जैसा धन-धान्य हो जाए, अब मैं प्रतिज्ञा करती हूं कि अवश्यमेव आप जैसा कहेंगे वैसा ही करूंगी।'
तब महात्मा जी बोले: 'बृहस्पतिवार को प्रातःकाल उठकर स्नानादि से निवृत्त हो घर को गो के गोबर से लीपो, तथा घर के पुरुष हजामत न बनवाएं, भूखों को अन्न-जल देती रहा करो, ठीक सायंकाल दीपक जलाओ। यदि ऐसा करोगी तो तुम्हारी सब मनोकामनाएं भगवान् बृहस्पति जी की कृपा से पूर्ण होंगी।' सेठानी ने ऐसा ही किया, और उसके घर में धन-धान्य वैसा ही हो गया जैसा पहले था। इस प्रकार भगवान् बृहस्पति जी की कृपा से वह अनेक प्रकार के सुख भोगकर दीर्घकाल तक जीवित रही।
श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा पाठ विधि
इस दिन बृहस्पतेश्वर महादेव जी की पूजा होती है। दिन में एक समय ही भोजन करें, पीले वस्त्र धारण करें, और भोजन चने की दाल का हो, नमक न खाएं। पीले रंग के फल, चने की दाल, पीले कपड़े तथा पीले चंदन से पूजा करनी चाहिए, और पूजन के पश्चात् कथा सुननी चाहिए। इस व्रत में केले का पूजन भी होता है। इस व्रत को करने से बृहस्पति जी अति प्रसन्न होते हैं तथा धन और विद्या का लाभ होता है।
श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा के बारे में
बृहस्पतिवार व्रत कथा एक कंजूस साहूकारनी की कथा है, जो दो अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में एक साधु-महात्मा तीन बार भिक्षा मांगने आते हैं, और हर बार साहूकारनी उन्हें टाल देती है, जिसके बाद महात्मा उसे जानबूझकर एक ऐसी विधि बताते हैं जो वास्तव में बृहस्पतिवार के नियमों के विपरीत है, और इसे अपनाने से उसके घर में अभाव आ जाता है। दूसरे अध्याय में जब वह सचमुच निर्धन हो जाती है और सच्चे मन से क्षमा मांगती है, तब महात्मा उसे बृहस्पति देव की सच्ची पूजा-विधि बताते हैं, जिसे अपनाकर उसके घर में पुनः धन-धान्य लौट आता है।
यह व्रत विशेष रूप से गुरुवार को धन, विद्या और सुख-समृद्धि की कामना से किया जाता है। इस पृष्ठ पर दोनों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
बृहस्पतिवार व्रत कथा का कोई नामित रचयिता नहीं है। यह गुरुवार के व्रत के साथ मौखिक व मुद्रित रूप में प्रचलित एक लोक-कथा है, जो साप्ताहिक वार-व्रत कथाओं की परंपरा का भाग है। यहां प्रस्तुत पाठ एक प्रकाशित हिंदी व्रत-कथा संग्रह पुस्तिका में छपी बृहस्पतिवार व्रत कथा का यथावत रूपांतरण है, जिसमें केवल स्पष्ट मुद्रण-त्रुटियां सुधारी गई हैं, कथा में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। चूंकि इस कथा का कोई एकल, प्राचीन मूल पाठ नहीं है, अन्य मुद्रित संस्करणों में शब्दों का हेरफेर मिल सकता है।
सामान्य प्रश्न
बृहस्पतिवार व्रत कथा में कुल कितने अध्याय हैं?
इसमें कुल दो अध्याय हैं, जो एक साथ पूर्ण पाठ के रूप में पढ़े या सुने जाते हैं।
बृहस्पतिवार व्रत कब किया जाता है?
यह व्रत प्रत्येक गुरुवार (बृहस्पतिवार) को किया जाता है।
बृहस्पतिवार व्रत में पीले वस्त्र क्यों पहने जाते हैं?
पीला रंग बृहस्पति देव का प्रिय रंग माना जाता है, इसलिए इस दिन पीले वस्त्र, पीले फल और चने की दाल से पूजा करने की परंपरा है, जैसा पूजा-विधि में बताया गया है।
कथा में साधु ने साहूकारनी को गलत विधि क्यों बताई?
जैसा कथा के पहले अध्याय में बताया गया है, साहूकारनी की कंजूसी की परीक्षा लेने के लिए महात्मा ने उसे जानबूझकर बृहस्पतिवार के नियमों के विपरीत विधि बताई, जिसका फल उसे अभाव के रूप में भुगतना पड़ा, जब तक उसने सच्चे मन से सही विधि नहीं मांगी।
क्या बृहस्पतिवार व्रत में विशेष पूजन सामग्री चाहिए?
जैसा पूजा-विधि में बताया गया है, इस व्रत में पीले फल, चने की दाल, पीले वस्त्र, पीला चंदन और केले के पौधे का पूजन किया जाता है।