मुख्यत्योहारदुर्गा अष्टमी
संधि पूजा एवं कन्या पूजन · आश्विन शुक्ल अष्टमी

दुर्गा अष्टमी

दुर्गा अष्टमी शारदीय नवरात्रि का आठवां दिन है, जिस पर मां महागौरी का पूजन, संधि पूजा और कन्या पूजन विशेष रूप से किया जाता है।

दुर्गा अष्टमी
अगली तिथि
१८ अक्टूबर २०२६

वर्ष 2028 में अष्टमी और नवमी तिथि एक ही दिन (26 सितंबर) पड़ रही हैं, ऐसे में संधि पूजा व कन्या पूजन का सही समय जानने हेतु उस वर्ष नज़दीकी पंचांग अवश्य देखें।

दुर्गा अष्टमी का महत्व

दुर्गा अष्टमी शारदीय नवरात्रि का आठवां दिन है, जिस पर मां दुर्गा के सातवें स्वरूप कालरात्रि के पश्चात आने वाली महागौरी की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इसी तिथि पर देवी चामुंडा ने चंड और मुंड नामक असुरों का वध किया था, इसलिए इस दिन शक्ति की उग्र स्वरूपा चामुंडा की भी आराधना होती है।

अष्टमी तिथि की समाप्ति और नवमी तिथि के आरंभ के संधि-काल को सबसे शक्तिशाली और शुभ क्षण माना जाता है, इसीलिए इस अवधि में 'संधि पूजा' की जाती है। कहा जाता है कि इसी संधि-काल में देवी दुर्गा ने महिषासुर की सेना के दो प्रमुख असुरों, चंड और मुंड, का वध किया था।

अष्टमी को अनेक स्थानों पर कन्या पूजन भी किया जाता है, जिसमें छोटी कन्याओं को साक्षात देवी का स्वरूप मानकर पूजा जाता है। बंगाल की दुर्गा पूजा में यह दिन 'महाअष्टमी' कहलाता है और विशेष भव्यता से मनाया जाता है।

दुर्गा चालीसा
चालीसा · अष्टमी पूजन में पाठ

दुर्गा अष्टमी कैसे मनाई जाती है

इस दिन भक्त प्रातःकाल स्नान कर मां महागौरी की पूजा करते हैं, दुर्गा सप्तशती अथवा दुर्गा चालीसा का पाठ करते हैं। अनेक भक्त इस दिन निर्जला व्रत रखते हैं और शाम की संधि पूजा के बाद ही अन्न ग्रहण करते हैं।

संधि पूजा के दौरान 108 दीपक जलाकर, मां चामुंडा को पुष्प, नारियल तथा मालपुए का भोग अर्पित किया जाता है। यह पूजा ठीक 48 मिनट की संधि-काल अवधि में ही संपन्न की जाती है, जिसका समय प्रतिवर्ष पंचांग अनुसार बदलता है।

कन्या पूजन में नौ कन्याओं (और एक बालक को भैरव स्वरूप मानकर) के पैर धोकर तिलक किया जाता है, तथा हलवा-पूरी-चने का भोग खिलाकर वस्त्र या भेंट दी जाती है। बंगाल में इसी दिन बड़े पंडालों में महाअष्टमी की भव्य पूजा होती है।

दुर्गा अष्टमी पूजा विधि

प्रातःकाल स्नान कर मां महागौरी की पूजा करें तथा दुर्गा सप्तशती या दुर्गा चालीसा का पाठ करें। संध्या के समय अष्टमी-नवमी संधि-काल में 108 दीपक जलाकर मां चामुंडा की संधि पूजा करें। तत्पश्चात नौ कन्याओं व एक बालक का पूजन कर उन्हें भोजन व भेंट देकर व्रत का पारण करें।

महिषासुर वध कथा पढ़ें
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दुर्गा अष्टमी के बारे में

दुर्गा अष्टमी शारदीय नवरात्रि का आठवां और सबसे शक्तिशाली दिन माना जाता है, जिस पर मां महागौरी का पूजन, चंड-मुंड वध की कथा से जुड़ी संधि पूजा, तथा कन्या पूजन किया जाता है। इस पृष्ठ पर अष्टमी का महत्व, संधि पूजा का शुभ समय, कन्या पूजन विधि तथा बंगाल की महाअष्टमी परंपरा की जानकारी दी गई है।

नवरात्रि के अन्य दिनों, जैसे घटस्थापना, महा नवमी और दशहरे की जानकारी हेतु उनके अलग पृष्ठ भी देखें। इस पृष्ठ की जानकारी बड़े अक्षरों व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।

सामान्य प्रश्न

दुर्गा अष्टमी कब मनाई जाती है?

दुर्गा अष्टमी शारदीय नवरात्रि के आठवें दिन, आश्विन मास की शुक्ल अष्टमी तिथि को मनाई जाती है।

संधि पूजा क्या है?

संधि पूजा अष्टमी तिथि की समाप्ति और नवमी तिथि के आरंभ के 48 मिनट के संधि-काल में की जाने वाली पूजा है, जिसे सबसे शुभ व शक्तिशाली क्षण माना जाता है, तथा जिसमें मां चामुंडा की पूजा होती है।

कन्या पूजन किस उम्र की कन्याओं का किया जाता है?

सामान्यतः 2 से 10 वर्ष तक की कन्याओं का पूजन किया जाता है, जिन्हें देवी का साक्षात स्वरूप माना जाता है।

क्या अष्टमी और नवमी एक ही दिन पड़ सकते हैं?

हां, कुछ वर्षों में तिथि क्षय के कारण अष्टमी और नवमी एक ही दिन पड़ जाती हैं, जैसे वर्ष 2028 में। ऐसे में संधि पूजा व कन्या पूजन का समय पंचांग अनुसार तय करें।

संबंधित खोज

मुख्य जानकारी

देवतामां महागौरी, मां चामुंडा
तिथिआश्विन शुक्ल अष्टमी
विशेष अनुष्ठानसंधि पूजा, कन्या पूजन
शुभ समयअष्टमी की अंतिम 24 व नवमी की प्रथम 24 मिनट (संधि काल)
व्रत प्रकारनिर्जला अथवा फलाहार, श्रद्धानुसार