2026 में अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर सुबह 8:27 से 19 अक्टूबर सुबह 10:51 तक है, इसलिए दुर्गा अष्टमी और महा नवमी दोनों सोमवार, 19 अक्टूबर को हैं। संधि पूजा प्रातः 10:27 से 11:15 तक है, और अष्टमी का कन्या पूजन 10:51 से पहले करें (नई दिल्ली)। बंगाल में महाअष्टमी भी 19 अक्टूबर को है।
दुर्गा अष्टमी का महत्व
दुर्गा अष्टमी शारदीय नवरात्रि का आठवां दिन है, जिस पर मां दुर्गा के सातवें स्वरूप कालरात्रि के पश्चात आने वाली महागौरी की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इसी तिथि पर देवी चामुंडा ने चंड और मुंड नामक असुरों का वध किया था, इसलिए इस दिन शक्ति की उग्र स्वरूपा चामुंडा की भी आराधना होती है।
अष्टमी तिथि की समाप्ति और नवमी तिथि के आरंभ के संधि-काल को सबसे शक्तिशाली और शुभ क्षण माना जाता है, इसीलिए इस अवधि में 'संधि पूजा' की जाती है। कहा जाता है कि इसी संधि-काल में देवी ने चामुंडा रूप में शुम्भ-निशुम्भ के दो सेनापतियों, चंड और मुंड, का वध किया था, जिसकी कथा दुर्गा सप्तशती के सातवें अध्याय में है।
अष्टमी को अनेक स्थानों पर कन्या पूजन भी किया जाता है, जिसमें छोटी कन्याओं को साक्षात देवी का स्वरूप मानकर पूजा जाता है। बंगाल की दुर्गा पूजा में यह दिन 'महाअष्टमी' कहलाता है और विशेष भव्यता से मनाया जाता है।
महागौरी का अर्थ है अत्यंत गौर वर्ण वाली। मान्यता है कि शिव को पाने के कठोर तप से देवी का शरीर श्याम पड़ गया था, और प्रसन्न होकर भगवान शिव ने गंगाजल से उन्हें स्नान कराया, जिससे उनका वर्ण अत्यंत उज्ज्वल हो गया। वे श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, वृषभ पर सवार हैं, और उनके हाथों में त्रिशूल व डमरू हैं। उन्हें नारियल का भोग प्रिय है।
दुर्गा अष्टमी कैसे मनाई जाती है
इस दिन भक्त प्रातःकाल स्नान कर मां महागौरी की पूजा करते हैं, दुर्गा सप्तशती अथवा दुर्गा चालीसा का पाठ करते हैं। अनेक भक्त इस दिन निर्जला या फलाहार व्रत रखते हैं। उत्तर भारत के अनेक परिवार कन्या पूजन के बाद व्रत खोलते हैं, जबकि शास्त्रीय पारण नवमी समाप्त होकर दशमी लगने पर किया जाता है।
संधि पूजा के दौरान 108 दीपक जलाकर मां चामुंडा को 108 कमल या लाल पुष्प अर्पित किए जाते हैं। यह पूजा ठीक 48 मिनट के संधि काल में ही संपन्न की जाती है, जो दिन या रात किसी भी समय पड़ सकता है और जिसका समय प्रतिवर्ष पंचांग अनुसार बदलता है।
कन्या पूजन में नौ कन्याओं (और एक बालक को भैरव स्वरूप मानकर) के पैर धोकर तिलक किया जाता है, तथा हलवा-पूरी-चने का भोग खिलाकर वस्त्र या भेंट दी जाती है। बंगाल में इसी दिन सुबह उपवास रखकर पुष्पांजलि दी जाती है और कई स्थानों, जैसे बेलूर मठ, पर एक कन्या को देवी रूप मानकर कुमारी पूजा होती है।
दुर्गा अष्टमी पूजा विधि
प्रातःकाल स्नान कर मां महागौरी की पूजा करें, नारियल का भोग लगाएं और दुर्गा सप्तशती या दुर्गा चालीसा का पाठ करें। अष्टमी तिथि रहते नौ कन्याओं व एक बालक का पूजन कर उन्हें भोजन व भेंट दें। पंचांग में दिए अष्टमी-नवमी के संधि काल में 108 दीपक जलाकर मां चामुंडा की संधि पूजा करें।
दुर्गा अष्टमी के बारे में
दुर्गा अष्टमी शारदीय नवरात्रि का आठवां और सबसे शक्तिशाली दिन माना जाता है, जिस पर मां महागौरी का पूजन, चंड-मुंड वध की कथा से जुड़ी संधि पूजा, तथा कन्या पूजन किया जाता है। इस पृष्ठ पर अष्टमी का महत्व, संधि पूजा का शुभ समय, कन्या पूजन विधि तथा बंगाल की महाअष्टमी परंपरा की जानकारी दी गई है।
नवरात्रि के अन्य दिनों, जैसे घटस्थापना, महा नवमी और दशहरे की जानकारी हेतु उनके अलग पृष्ठ भी देखें।
सामान्य प्रश्न
दुर्गा अष्टमी कब मनाई जाती है?
दुर्गा अष्टमी शारदीय नवरात्रि के आठवें दिन, आश्विन मास की शुक्ल अष्टमी तिथि को मनाई जाती है।
संधि पूजा क्या है?
संधि पूजा अष्टमी तिथि की समाप्ति और नवमी तिथि के आरंभ के 48 मिनट के संधि-काल में की जाने वाली पूजा है, जिसे सबसे शुभ व शक्तिशाली क्षण माना जाता है, तथा जिसमें मां चामुंडा की पूजा होती है।
कन्या पूजन किस उम्र की कन्याओं का किया जाता है?
सामान्यतः 2 से 10 वर्ष तक की कन्याओं का पूजन किया जाता है, जिन्हें देवी का साक्षात स्वरूप माना जाता है।
क्या अष्टमी और नवमी एक ही दिन पड़ सकते हैं?
हां। जब अष्टमी तिथि सूर्योदय के कुछ घंटे बाद समाप्त हो जाती है, तो उसी दिन नवमी भी लग जाती है, जैसे 2026 में 19 अक्टूबर को। ऐसे में अष्टमी का पूजन और कन्या पूजन अष्टमी रहते, और नवमी का हवन उसके बाद करें।
दुर्गा अष्टमी 2026 कब है?
दुर्गा अष्टमी 2026 सोमवार, 19 अक्टूबर को है। अष्टमी तिथि उस दिन प्रातः 10:51 तक है, और संधि पूजा 10:27 से 11:15 तक (नई दिल्ली)।
अष्टमी पर मां महागौरी को क्या भोग लगाएं?
मां महागौरी को नारियल का भोग प्रिय माना जाता है। कन्या पूजन में कन्याओं को हलवा, पूरी और काले चने का प्रसाद खिलाया जाता है।
