दशहरा 'साढ़े तीन मुहूर्तों' में से एक पूर्ण शुभ मुहूर्त माना जाता है, अर्थात इस दिन किसी भी शुभ कार्य हेतु अलग से मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती। उत्तर भारत में इस दिन रावण-दहन होता है, जबकि बंगाल में इसी दिन दुर्गा प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।
दशहरा (विजयादशमी) का महत्व
'दशहरा' शब्द का अर्थ है 'दस का हरण', जो रावण के दस सिरों अथवा दस दुर्गुणों के नाश का प्रतीक है। मान्यता है कि इसी तिथि को भगवान श्रीराम ने रावण का वध कर लंका पर विजय प्राप्त की थी, तथा मां सीता को उसके बंधन से मुक्त कराया था। इसीलिए इस दिन को विजयादशमी भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है 'दशमी तिथि की विजय'।
पौराणिक कथा के अनुसार, रावण से युद्ध से पहले भगवान श्रीराम ने विजय की कामना से मां दुर्गा का 'अकाल बोधन' अर्थात असमय आवाहन कर उनकी उपासना की थी। यही कारण है कि शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा की पूजा और दशहरे पर श्रीराम की विजय, दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए मनाए जाते हैं।
बंगाल की परंपरा में विजयादशमी के दिन ही नौ दिनों तक पूजी गई दुर्गा प्रतिमा का नदी अथवा जलाशय में विसर्जन किया जाता है, यह मानते हुए कि मां दुर्गा अपने पीहर (मायके) से पुनः कैलाश लौट जाती हैं। दशहरा भारत के सबसे शुभ दिनों में से एक 'साढ़े तीन मुहूर्तों' में गिना जाता है, जिस दिन बिना मुहूर्त देखे भी कोई भी शुभ कार्य आरंभ किया जा सकता है।
दशहरा (विजयादशमी) कैसे मनाई जाती है
उत्तर भारत के अनेक नगरों में इस दिन विशाल मैदानों में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले बनाकर, रामलीला के मंचन के पश्चात, संध्या समय उन्हें आग लगाई जाती है, जिसे 'रावण-दहन' कहा जाता है। यह आयोजन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है।
पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम में इसी दिन दुर्गा प्रतिमा का भव्य शोभायात्रा के साथ विसर्जन किया जाता है। विवाहित स्त्रियां मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित कर एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं, जिसे 'सिंदूर खेला' कहा जाता है।
अनेक स्थानों पर शमी वृक्ष की पूजा की जाती है, जिसे 'अपराजिता पूजा' कहा जाता है, और शमी के पत्तों को सोने के प्रतीक स्वरूप एक-दूसरे को भेंट कर विजयादशमी की शुभकामनाएं दी जाती हैं। दक्षिण भारत में आयुध पूजा की परंपरा इसी दिन तक जारी रहती है।
दशहरा (विजयादशमी) पूजा विधि
प्रातःकाल स्नान कर भगवान श्रीराम और मां दुर्गा की पूजा करें। शमी वृक्ष के समक्ष अपराजिता पूजा करें और शमी के पत्ते भेंट स्वरूप बांटें। संध्या समय रामलीला मैदान में रावण-दहन देखें अथवा घर पर श्रीराम व दुर्गा की आरती कर नवरात्रि व्रत का पारण करें।
दशहरा (विजयादशमी) के बारे में
दशहरा, अर्थात विजयादशमी, शारदीय नवरात्रि के दसवें दिन भगवान श्रीराम की रावण पर विजय और मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय के उपलक्ष्य में मनाया जाने वाला पर्व है। इस पृष्ठ पर दशहरे का महत्व, रावण-दहन, दुर्गा विसर्जन, शमी पूजा तथा साढ़े तीन मुहूर्तों में इसके स्थान की जानकारी दी गई है।
नवरात्रि के पिछले दिनों, जैसे घटस्थापना, अष्टमी और महा नवमी की जानकारी हेतु उनके अलग पृष्ठ भी देखें। इस पृष्ठ की जानकारी बड़े अक्षरों व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
सामान्य प्रश्न
दशहरा कब मनाया जाता है?
दशहरा शारदीय नवरात्रि के दसवें दिन, आश्विन मास की शुक्ल दशमी तिथि को मनाया जाता है।
दशहरा और विजयादशमी में क्या अंतर है?
दोनों एक ही पर्व के दो नाम हैं, 'दशहरा' दस दुर्गुणों के नाश को दर्शाता है, जबकि 'विजयादशमी' दशमी तिथि की विजय को दर्शाता है।
रावण-दहन क्यों किया जाता है?
रावण-दहन भगवान श्रीराम की रावण पर विजय का स्मरण कराता है, तथा रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाकर बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश दिया जाता है।
दुर्गा विसर्जन दशहरे को ही क्यों होता है?
नवरात्रि के नौ दिनों की पूजा के पश्चात दशमी तिथि को मां दुर्गा अपने पीहर से कैलाश लौटती हैं, इसी मान्यता के अनुसार इसी दिन प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।
क्या दशहरे पर शुभ कार्य किए जा सकते हैं?
हां, दशहरा साढ़े तीन मुहूर्तों में से एक पूर्ण शुभ मुहूर्त माना जाता है, इसलिए इस दिन बिना पंचांग में मुहूर्त देखे भी नया कार्य, वाहन-खरीद या गृह-प्रवेश किया जा सकता है।
