यह पक्ष के आरंभ (पूर्णिमा श्राद्ध) की तिथि है। पक्ष का समापन 'सर्वपितृ अमावस्या' को होता है, वर्ष 2026 में यह 10 अक्टूबर को, तथा 2027 में 29 सितंबर को पड़ रही है। यही सोलहवां व सबसे महत्वपूर्ण दिन है, जिस दिन सभी पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध किया जा सकता है।
पितृ पक्ष का महत्व
मान्यता है कि पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों की आत्माएं अपने वंशजों से जल व अन्न की अपेक्षा रखते हुए पृथ्वी पर लौटती हैं। इसी कारण इन सोलह दिनों में तर्पण व श्राद्ध कर उन्हें तृप्त करना तथा उनका आशीर्वाद प्राप्त करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके विपरीत, पितरों की उपेक्षा से 'पितृ दोष' उत्पन्न होने की मान्यता भी प्रचलित है।
महाभारत की एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, अत्यंत दानी होते हुए भी कर्ण को स्वर्ग में केवल सोना-आभूषण भोजन स्वरूप मिले, क्योंकि उन्होंने जीवनभर अपने पूर्वजों को कभी अन्न-जल का दान नहीं किया था, अपने वास्तविक कुल की जानकारी न होने के कारण। भगवान इंद्र के परामर्श पर कर्ण को सोलह दिनों के लिए पुनः पृथ्वी पर भेजा गया, ताकि वे अपने पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध व दान कर सकें। मान्यता है कि इसी घटना से पितृ पक्ष की सोलह दिनों की अवधि प्रचलित हुई।
प्रत्येक पूर्वज का श्राद्ध सामान्यतः उसी तिथि को किया जाता है जिस तिथि को उनका देहांत हुआ था। जिन्हें अपने पूर्वज की मृत्यु-तिथि ज्ञात नहीं, अथवा जिनके कोई वंशज शेष नहीं, उन सभी पूर्वजों का श्राद्ध पक्ष के अंतिम दिन, सर्वपितृ अमावस्या को सामूहिक रूप से किया जा सकता है, इसीलिए इसे सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।
पितृ पक्ष कैसे मनाई जाती है
प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान कर, दक्षिण दिशा की ओर मुख कर, जल में काला तिल व जौ मिलाकर पूर्वजों के निमित्त तर्पण किया जाता है। यह कार्य सामान्यतः परिवार के सबसे बड़े पुत्र द्वारा किया जाता है, तथा संभव हो तो किसी पवित्र नदी तट पर किया जाना विशेष पुण्यदायी माना जाता है।
पिंडदान में चावल व जौ के आटे से बने पिंड अर्पित किए जाते हैं, तथा ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। कौवों, गायों व कुत्तों को भी भोजन कराने की परंपरा है, यह मानते हुए कि कौवे पूर्वजों तक भोजन पहुंचाने के माध्यम हैं।
पितृ पक्ष के अंतिम दिन, सर्वपितृ अमावस्या को, सभी ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों के निमित्त सामूहिक श्राद्ध किया जाता है। बिहार के गया में स्थित विष्णुपद मंदिर पिंडदान हेतु सर्वाधिक पवित्र तीर्थ माना जाता है, जहां देशभर से श्रद्धालु इस अवधि में पहुंचते हैं।
पितृ पक्ष पूजा विधि
प्रातःकाल स्नान कर दक्षिण दिशा की ओर मुख करें। जल में काला तिल व जौ मिलाकर हाथों से पूर्वजों के निमित्त तर्पण करें। यथासंभव पिंडदान करें तथा ब्राह्मणों, कौवों, गायों व कुत्तों को भोजन कराएं। जिस तिथि को पूर्वज की मृत्यु हुई हो, उसी तिथि को श्राद्ध करें, अन्यथा सर्वपितृ अमावस्या को सामूहिक श्राद्ध करें।
पितृ पक्ष के बारे में
पितृ पक्ष भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक चलने वाला सोलह दिन का पक्ष है, जो पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध व तर्पण को समर्पित है। इस पृष्ठ पर पितृ पक्ष का महत्व, कर्ण की कथा, तथा श्राद्ध-तर्पण की विधि की जानकारी दी गई है।
पितृ पक्ष के समापन के तुरंत पश्चात शारदीय नवरात्रि का आरंभ होता है। इस पृष्ठ की जानकारी बड़े अक्षरों व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
सामान्य प्रश्न
पितृ पक्ष कब मनाया जाता है?
पितृ पक्ष प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास की पूर्णिमा से आरंभ होकर आश्विन मास की अमावस्या तक, सोलह दिनों तक चलता है, जो सामान्यतः सितंबर-अक्टूबर में आता है।
सर्वपितृ अमावस्या क्या है?
सर्वपितृ अमावस्या पितृ पक्ष का अंतिम व सबसे महत्वपूर्ण दिन है, जिस दिन सभी ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों के निमित्त सामूहिक श्राद्ध किया जा सकता है, विशेषकर उनके लिए जिन्हें अपने पूर्वज की मृत्यु-तिथि ज्ञात नहीं।
तर्पण किस दिशा में किया जाता है?
तर्पण दक्षिण दिशा की ओर मुख करके किया जाता है, क्योंकि इसी दिशा को यमराज व पितरों की दिशा माना जाता है।
पितृ पक्ष में कौवों को भोजन क्यों कराया जाता है?
मान्यता है कि कौवे पूर्वजों तक अर्पित भोजन को पहुंचाने का माध्यम हैं, इसीलिए पितृ पक्ष में उन्हें भोजन कराने की परंपरा है।
