जीवित्पुत्रिका व्रत (जितिया)
जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे जितिया भी कहा जाता है, आश्विन मास की कृष्ण अष्टमी को माताओं द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु व कल्याण हेतु रखा जाने वाला कठोर निर्जला व्रत है।

यह व्रत पितृ पक्ष के दौरान ही पड़ता है, तथा बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश व नेपाल के मिथिला क्षेत्र में विशेष रूप से मनाया जाता है। अष्टमी-नवमी की गणना क्षेत्रीय पंचांग अनुसार एक दिन आगे-पीछे भी हो सकती है, इसलिए नज़दीकी पंचांग देखें।
जीवित्पुत्रिका व्रत (जितिया) का महत्व
जीवित्पुत्रिका व्रत का नाम राजा जीमूतवाहन से जुड़ा है, जो एक अत्यंत दयालु व त्यागी राजा थे। कथा के अनुसार, उन्होंने गरुड़ द्वारा नागों को भोजन के रूप में खाए जाने की क्रूर प्रथा को समाप्त करने हेतु स्वयं अपने प्राणों की आहुति देने का संकल्प लिया, तथा एक नाग-बालक को बचाने के लिए स्वयं गरुड़ के समक्ष प्रस्तुत हो गए।
जीमूतवाहन के इस त्याग व करुणा से प्रभावित होकर गरुड़ ने नागों को खाने की प्रथा सदा के लिए त्याग दी, तथा जीमूतवाहन को जीवनदान दिया। इसी घटना के स्मरण में माताएं अपनी संतान की दीर्घायु व कल्याण की कामना से यह व्रत रखती हैं, तथा राजा जीमूतवाहन की कथा सुनती हैं।
यह व्रत बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग तथा नेपाल के मिथिला क्षेत्र में अत्यंत श्रद्धा व निष्ठा से मनाया जाता है, तथा इसे करवा चौथ व अहोई अष्टमी की भांति ही संतान-कल्याण के सबसे कठोर व्रतों में गिना जाता है।
जीवित्पुत्रिका व्रत (जितिया) कैसे मनाई जाती है
यह व्रत तीन दिनों में संपन्न होता है। पहले दिन 'नहाय-खाय' होता है, जिसमें माताएं स्नान कर सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। दूसरे दिन अष्टमी तिथि को संपूर्ण निर्जला व्रत रखा जाता है, अर्थात संपूर्ण दिन-रात बिना जल व अन्न ग्रहण किए व्रत रखा जाता है।
व्रत के दिन माताएं राजा जीमूतवाहन व जितिया माता का पूजन करती हैं, कथा सुनती हैं, तथा कहीं-कहीं जीमूतवाहन व गरुड़-नाग प्रसंग का चित्रण भी किया जाता है। तीसरे दिन प्रातःकाल स्नान कर व्रत का पारण किया जाता है।
यह व्रत अत्यंत कठोर माना जाता है, अतः वृद्ध, गर्भवती, अस्वस्थ अथवा अत्यंत छोटी आयु की स्त्रियों को परंपरागत रूप से इसमें छूट दी जाती है, अथवा वे केवल फलाहार व्रत रखकर संकल्प पूर्ण करती हैं।
जीवित्पुत्रिका व्रत (जितिया) पूजा विधि
पहले दिन नहाय-खाय के रूप में स्नान कर सात्विक भोजन करें। दूसरे दिन अष्टमी को संपूर्ण निर्जला व्रत रखें, तथा राजा जीमूतवाहन व जितिया माता का पूजन कर कथा सुनें। तीसरे दिन प्रातःकाल स्नान कर व्रत का पारण करें। अस्वस्थ, वृद्ध अथवा गर्भवती महिलाएं फलाहार व्रत रख सकती हैं।
जीवित्पुत्रिका व्रत (जितिया) के बारे में
जीवित्पुत्रिका व्रत (जितिया) आश्विन मास की कृष्ण अष्टमी को माताओं द्वारा अपनी संतान के कल्याण हेतु रखा जाने वाला व्रत है। इस पृष्ठ पर इस व्रत का महत्व, राजा जीमूतवाहन की कथा, तथा तीन दिवसीय अनुष्ठान की जानकारी दी गई है।
इस पृष्ठ की जानकारी बड़े अक्षरों व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
सामान्य प्रश्न
जीवित्पुत्रिका व्रत (जितिया) कब मनाया जाता है?
यह व्रत प्रत्येक वर्ष आश्विन मास की कृष्ण अष्टमी तिथि को मनाया जाता है, तथा यह पितृ पक्ष के दौरान ही पड़ता है।
जितिया व्रत तीन दिनों में क्यों मनाया जाता है?
पहले दिन नहाय-खाय, दूसरे दिन संपूर्ण निर्जला व्रत, तथा तीसरे दिन पारण किया जाता है, यह क्रम शरीर को कठोर व्रत हेतु तैयार करने व सुरक्षित रूप से पारण करने की परंपरा का भाग है।
राजा जीमूतवाहन कौन थे?
राजा जीमूतवाहन एक अत्यंत दयालु राजा थे, जिन्होंने गरुड़ द्वारा नागों को खाए जाने की प्रथा समाप्त करने हेतु एक नाग-बालक के स्थान पर स्वयं को समर्पित कर दिया था, तथा उनके त्याग से प्रभावित होकर गरुड़ ने यह प्रथा त्याग दी।
जितिया व्रत कहां सबसे अधिक मनाया जाता है?
यह व्रत बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग तथा नेपाल के मिथिला क्षेत्र में सर्वाधिक श्रद्धा से मनाया जाता है।