मुख्यकथाजीवित्पुत्रिका (जितिया) व्रत कथा

जीवित्पुत्रिका (जितिया) व्रत कथा

जीवित्पुत्रिका व्रत कथा राजा जीमूतवाहन के त्याग की तथा उसी व्रत को करने वाली चिल्ही व उसकी सखी सियारिन की कथा है, जो आश्विन कृष्ण अष्टमी को सुनी-सुनाई जाती है और जिसका पूर्ण पाठ यहां उपलब्ध है।

जीवित्पुत्रिका (जितिया) व्रत कथा
अध्याय/

अध्याय · कथा का आरंभ, सूत, गौतम व द्रौपदी

एक समय नैमिषारण्य में रहने वाले सब मुनि लोग संसार पर कृपा की इच्छा से सूत जी से पूछने लगे कि इस भयंकर घोर कलियुग में बालक बहुत काल तक जीने वाले कैसे होंगे। सूत जी बोले:

द्वापर के अंत में जब कलियुग का प्रारंभ हुआ, तब दुखी स्त्रियां अपने पुत्रों की दीर्घायु का उपाय जानने हेतु विचार करने लगीं। जहां महात्मा गौतम सुखपूर्वक एकांत में बैठे थे, वहां वे स्त्रियां विनम्रतापूर्वक खड़ी होकर कहने लगीं, इस भयंकर समय में किस व्रत से अथवा तप से हम लोगों के लड़के जीवित रहेंगे, ऐसा निश्चय करके हे प्रभो, आप कहिए।

ऐसा उन स्त्रियों का वचन सुनकर गौतम जी कहने लगे कि हे स्त्रियों, जैसा मैंने पहले सुना है, वह आप लोग सुनो, महाभारत का युद्ध जब समाप्त हो गया, युधिष्ठिर जी दुखी हुए। अश्वत्थामा ने जब उनके पुत्रों को मार डाला, तब पुत्र-शोक से पीड़ित, अपनी सखियों सहित द्रौपदी उस महाभाग्यशाली श्रेष्ठ ब्राह्मण धौम्य जी के पास गईं।

द्रौपदी बोलीं, हे द्विजश्रेष्ठ, कृपा करके मुझे यथार्थ रूप से बताइए। धौम्य जी बोले: सत्ययुग में सत्य बोलने वाले, सच्चाई रखने वाले, सबको समान दृष्टि से देखने वाले, दयालु जीमूतवाहन नाम के राजा हुए। वे किसी समय अपने ससुराल में जाकर अपनी पत्नी के साथ रहने लगे।

उस गांव में आधी रात के समय पुत्र-शोक से घबराई हुई, पुत्र को पुनः देखने की आशा खोई हुई एक दुखिनी स्त्री करुण स्वर में रुदन करने लगी, 'हाय-हाय! मुझ बुढ़िया के सामने मेरा जवान पुत्र नष्ट होने जा रहा है!' ऐसा उसका रोना सुनकर दयालु राजा का हृदय द्रवित हो गया। राजा ने वहां जाकर पूछा: मृत्यु का कारण बताओ। उसने कहा: हे राजन, गरुड़ जी प्रतिदिन एक पुत्र को खा जाते हैं। बुढ़िया का वचन सुनकर दयालु राजा ने कहा: हे मां, ठहरो, मैं सुखपूर्वक तुम्हारे पुत्र की रक्षा का प्रयत्न करूंगा।

अध्याय · राजा जीमूतवाहन का त्याग

ऐसा कहकर राजा भय को त्यागकर भोजन-स्थान पर गए, जहां गरुड़ जी आकर राजा के शरीर का मांस खाने लगे। बड़े तेजस्वी गरुड़ ने जब बायां अंग खा लिया, तब करवट बदलकर राजा ने दाहिना अंग भी दे दिया।

यह देखकर गरुड़ जी ने पूछा: देव-योनियों में आप कौन हैं? हे वीर, आप मनुष्य नहीं हैं, अपना जन्म व कुल बताइए। इसके बाद पीड़ा से व्याकुल राजा स्वयं बोले: हे गरुड़, आप अपनी इच्छानुसार भोजन कीजिए, व्यर्थ के प्रश्नों से क्या प्रयोजन?

यह वचन सुनकर गरुड़ ने स्वयं खाना छोड़ दिया, तथा आग्रहपूर्वक राजा से उसका जन्म व कुल पूछने लगे। राजा बोले: मेरी माता रानी शैव्या हैं, और मेरे पिता राजा शालिवाहन हैं। सूर्यवंश में उत्पन्न, मैं राजा जीमूतवाहन हूं।

अध्याय · गरुड़ का वरदान एवं व्रत की उत्पत्ति

राजा की इस दयालुता को देखकर गरुड़ शीघ्र ही बोले: हे महाराज, जो आपके मन में हो, वह वर मांगिए। राजा बोले: हे गरुड़, यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं, तो मैं यही मांगता हूं कि जिन्हें आपने पहले भोजन बनाया है, वे सब जीवित हो जाएं, तथा अब आप किसी भी जीव को न खाएं, यही मेरी प्रार्थना है, और जो भी संतान उत्पन्न हों, वे दीर्घकाल तक जिएं, ऐसा उपाय कीजिए।

इस पर आनंदपूर्वक वर देकर पक्षीराज गरुड़ स्वयं राजा की इच्छा से अमृत लाने के लिए गए, और अमृत लाकर पृथ्वी पर मृत शरीरों व हड्डियों पर चारों ओर से खूब बरसाया। इससे जो लोग पूर्व में खाए गए थे, वे सब गरुड़ की प्रसन्नता व राजा की कृपा से जीवित हो उठे। राजा का शरीर पहले से दुगुना सुशोभित हुआ।

राजा की दयालुता देखकर गरुड़ जी पुनः बोले: मैं दूसरा वरदान भी लोक-हित की कामना से स्वयं देता हूं, आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, जो सप्तमी से रहित हो, अत्यंत शुभ है। इस तिथि में हे वत्स, तुमने प्रजाओं को जिलाया है, अतः यह दिन ज्ञानमय होगा। श्री दुर्गा जी की मूर्ति के अनेक भेद हैं, जो तीनों लोकों में पूजनीय हैं, हे वत्स, आज अमृत लाने के कारण इस अष्टमी का नाम 'जीवपुत्रिका' हुआ, और यही देवी दुर्गा हैं।

इस अष्टमी तिथि में जो स्त्रियां जीवपुत्रिका का पूजन करेंगी, तथा कुशा से आपका रूप बनाकर श्रद्धा-भक्ति सहित पूजा करेंगी, उनके सौभाग्य व वंश की निरंतर वृद्धि होगी, हे महाराज, इसमें कोई संशय नहीं है। सप्तमी से रहित जो अष्टमी हो, उसी में उपवास करना चाहिए, जिसमें सूर्योदय हो वही अष्टमी है, तथा पारण नवमी के दिन करना चाहिए। सप्तमी-सहित अष्टमी कभी नहीं करनी चाहिए, अन्यथा कोई फल प्राप्त नहीं होता तथा सौभाग्य भी अवश्य नष्ट हो जाता है।

इस प्रकार गरुड़ जी राजा को वरदान देकर विष्णुपुर वैकुंठ को चले गए, तथा राजा भी अपनी पत्नी सहित अपने नगर को लौट गए। हे देवी, यह अत्यंत दुर्लभ व्रत मैंने आपसे कहा, जिसके प्रभाव से पुत्र दीर्घकाल तक जीवित रहते हैं। इसलिए हे देवी, इस व्रत को पूर्वोक्त विधि से करें, तथा इसमें पार्वती जी के शैलपुत्री स्वरूप का पूजन करें, तब आपको फल की प्राप्ति होगी। मुनि के इस वचन को सुनकर द्रौपदी अत्यंत प्रसन्न होकर गांव की सभी स्त्रियों को बुलाकर इस उत्तम व्रत को करने लगीं।

अध्याय · चिल्ही और सियारिन की कथा

गौतम जी बोले: इस व्रत के प्रभाव को सुनकर चिल्ही नामक एक सियारिन ने अपनी सुंदर सखी सियारिन से यह बात कही, तथा उसने भी इस व्रत को स्वीकार किया। किसी पीपल की डाल की छाया में रहकर चिल्ही व्रतपरायण होकर व्रत करने लगी, तथा उसी पीपल के खोखले में उसकी सखी सियारिन भी व्रत करने लगी।

कहीं किसी उत्तम ब्राह्मण से यह कथा सुनकर चिल्ही ने खोखले में बैठी अपनी सखी सियारिन को यह कथा सुनाई। आधी कथा सुनकर, भूख से व्याकुल शरीर वाली सियारिन खोखले से निकलकर शीघ्र ही मुर्दों से भरे श्मशान की ओर चली गई। वहां जाकर उसने अपनी इच्छानुसार मांस खाया, जबकि चिल्ही ने निर्जला व्रत पूरा किया, और इस प्रकार प्रातःकाल हो गया।

उसने गोशाला में जाकर सुगंधित सुंदर जल पिया, तथा वहीं स्वस्थ चित्त से नवमी के दिन पारण किया। कुछ ही दिनों के बाद दोनों ने अपने शरीर त्याग दिए। इसके पश्चात कोशलपुर में किसी धनी सार्थवाह के घर, संयोगवश दोनों का एक ही घर में जन्म हुआ, बड़ी बहन सियारिन का जन्म हुआ, तथा छोटी बहन चिल्ही का।

अध्याय · फल-प्राप्ति की कथा

दोनों बहनें पूर्ण लक्षणों से युक्त थीं तथा उन्हें अपने पूर्वजन्म का स्मरण था। बड़ी बहन का विवाह काशीराज से हुआ, तथा छोटी बहन का विवाह काशीराज के मंत्री से, दोनों का विवाह विधिपूर्वक गार्हपत्य अग्नि के समीप संपन्न हुआ। पूर्वजन्म के फलस्वरूप, मृगनयनी रानी ने जो भी पुत्र उत्पन्न किए, वे सभी यमराज के घर चले गए।

जाति-स्मरण रखने वाली मंत्री-पत्नी ने आठ वसुओं की माता के समान आठ पुत्र उत्पन्न किए। उन्हें देखकर रानी ईर्ष्यावश राजा के समक्ष बोली: हे नाथ, मेरी बात पूर्ण कीजिए, जिस मार्ग से मेरे पुत्र यमराज के यहां गए हैं, यदि आप हमारा कल्याण चाहते हैं, तो मेरी बहन के पुत्रों को भी उसी मार्ग से भेज दीजिए। यह सुनकर राजा ने वैसा ही किया।

तब जीवपुत्रिका देवी ने उन मृत बालकों को पुनः जीवित कर दिया। एक बार वन में उनके सिर काटकर बांस के पात्रों में उस घर भेजे गए, तथा वे सिर उसी क्षण नाना प्रकार के रत्नों में बदल गए। यह देखकर रानी अत्यंत आश्चर्यचकित हुई, तथा अपनी बहन के पास आकर पूछने लगी, तुमने कौन-सा व्रत किया है, जिससे तुम्हारे पुत्र बार-बार मरकर भी जीवित हो उठते हैं?

मंत्री-पत्नी बोली: पूर्वजन्म में मैं चिल्ही थी, और तुम सियारिन थीं। व्रत का सम्यक् पालन करते हुए तुमने उसे ठीक से नहीं निभाया, इसी दोष से हे बहन, तुम्हारे पुत्र जीवित नहीं रहते। मेरा व्रत खंडित नहीं हुआ था, इसीलिए मेरे पुत्र जीवित रहते हैं। हे प्रिय बहन, अब तुम व राजा दोनों इस व्रत को करो, इसके प्रभाव से तुम्हारे पुत्र भी जीवित रहेंगे, हे भाग्यवती, मैं सत्य कहती हूं।

यह वचन सुनकर रानी ने भी इस व्रत को किया। उस दिन से राजा जीवित-पुत्रों वाले हो गए, तथा रानी के पुत्र भी अत्यंत सुंदर हुए। वे इस पृथ्वी पर राजा बने तथा दीर्घकाल तक जीवित रहे। सूत जी ऋषियों से बोले: यह मैंने संपूर्ण सौभाग्य बढ़ाने वाला सुंदर व्रत आपसे कहा है। जो स्त्रियां पुत्रों के दीर्घ जीवन की कामना रखती हों, वे इस व्रत को करें।

जीवित्पुत्रिका (जितिया) व्रत कथा पाठ विधि

आश्विन कृष्ण अष्टमी को, जो सप्तमी से रहित हो, दिनभर निर्जला व्रत रखें, तथा जीवत्पुत्रिका देवी (पार्वती के शैलपुत्री स्वरूप) का कुशा से रूप बनाकर श्रद्धा-भक्ति सहित पूजन करें। नवमी के दिन पारण करें। सप्तमी-युक्त अष्टमी कभी न करें, अन्यथा व्रत का फल नहीं मिलता। पूर्ण विधि इस पृष्ठ के तीसरे अध्याय में दी गई है।

पाठ दिवस
आश्विन कृष्ण अष्टमी
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दुर्गा चालीसा
स्तोत्र · ८ मिनट
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जीवित्पुत्रिका (जितिया) व्रत कथा के बारे में

जीवित्पुत्रिका व्रत कथा राजा जीमूतवाहन के त्याग तथा उसी व्रत को करने वाली सियारिन चिल्ही व उसकी सखी की कथा है, जो पांच अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में सूत, गौतम व द्रौपदी की कथा-श्रृंखला है, दूसरे व तीसरे अध्याय में राजा जीमूतवाहन का त्याग व गरुड़ का वरदान है, चौथे अध्याय में चिल्ही व सियारिन की कथा है, तथा पांचवें अध्याय में उनके फल-प्राप्ति की कथा दी गई है।

यह व्रत आश्विन मास की कृष्ण अष्टमी को, पितृ पक्ष के दौरान, माताओं द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु की कामना से किया जाता है। इस पृष्ठ पर सभी पांचों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।

जीवित्पुत्रिका (जितिया) व्रत कथा का कोई एक नामित रचयिता नहीं है। यह सूत जी द्वारा नैमिषारण्य के ऋषियों को, गौतम ऋषि द्वारा शोकाकुल स्त्रियों को, तथा धौम्य जी द्वारा द्रौपदी को सुनाई गई कथा के रूप में गुंथी हुई है, तथा परंपरागत रूप से भविष्य पुराण व भविष्योत्तर पुराण से जोड़ी जाती है। यहां प्रस्तुत पाठ एक प्रकाशित संस्कृत-हिंदी व्रत-कथा पुस्तिका में दी गई कथा के हिंदी भावार्थ का यथावत रूपांतरण है, जिसमें केवल स्पष्ट मुद्रण-त्रुटियां सुधारी गई हैं व एक-दो स्थानों पर अत्यंत लघु अंतराल को अर्थ की निरंतरता हेतु सहज रूप से जोड़ा गया है, कथा में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। मूल पुस्तिका में दिए गए संस्कृत श्लोक इस पृष्ठ पर सम्मिलित नहीं हैं, केवल उनका हिंदी भावार्थ ही यहां दिया गया है। अन्य मुद्रित संस्करणों में शब्दों का हेरफेर मिल सकता है।

रचनाकार
अज्ञात
पौराणिक कथा (भविष्य पुराण व भविष्योत्तर पुराण परंपरा)

सामान्य प्रश्न

जीवित्पुत्रिका व्रत कथा में कुल कितने अध्याय हैं?

इसमें कुल पांच अध्याय हैं, जो एक साथ पूर्ण पाठ के रूप में पढ़े या सुने जाते हैं।

जितिया व्रत कब मनाया जाता है?

यह व्रत प्रत्येक वर्ष आश्विन मास की कृष्ण अष्टमी तिथि को मनाया जाता है, जो सप्तमी से रहित होनी चाहिए, तथा पारण नवमी के दिन किया जाता है।

राजा जीमूतवाहन ने क्या त्याग किया था?

एक दुखिनी वृद्धा के पुत्र को गरुड़ जी से बचाने हेतु राजा जीमूतवाहन स्वयं गरुड़ जी के समक्ष भोजन के रूप में प्रस्तुत हो गए, जिनकी दयालुता से प्रसन्न होकर गरुड़ जी ने उन्हें व समस्त पूर्व में खाए गए प्राणियों को जीवनदान दिया।

चिल्ही व सियारिन की कथा से क्या शिक्षा मिलती है?

चिल्ही ने व्रत को पूर्ण निष्ठा से निभाया, जबकि उसकी सखी सियारिन ने बीच में ही भोजन कर व्रत खंडित कर दिया, अगले जन्म में इसी कारण चिल्ही (मंत्री-पत्नी) के पुत्र सदैव जीवित रहे, जबकि सियारिन (रानी) के पुत्र नहीं बचे, जब तक उसने भी व्रत का सम्यक् पालन नहीं किया।

संबंधित खोज

पाठ विवरण

रचनाकारअज्ञात
संरचना५ अध्याय
पाठ समय९ मिनट