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पितरों की मुक्ति का व्रत · आश्विन कृष्ण एकादशी

इंदिरा एकादशी

इंदिरा एकादशी आश्विन मास की कृष्ण एकादशी को, पितृ पक्ष के दौरान ही मनाई जाती है, तथा इसे पितरों की मुक्ति व सद्गति की कामना से रखा जाता है।

इंदिरा एकादशी
अगली तिथि
२६ सितम्बर २०२७

यह एकादशी पितृ पक्ष के दौरान ही आती है, तथा जीवित्पुत्रिका व्रत (जितिया) के कुछ दिन पश्चात व शारदीय नवरात्रि के प्रारंभ से पूर्व पड़ती है। सटीक तिथि हेतु नज़दीकी पंचांग देखें।

इंदिरा एकादशी का महत्व

पद्म पुराण के अनुसार, सत्ययुग में महिष्मती पुरी के राजा इंद्रसेन धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करते थे और भगवान विष्णु की भक्ति में लगे रहते थे। एक दिन देवर्षि नारद उनकी सभा में आए और बताया कि वे ब्रह्मलोक से यमलोक गए थे, जहां यमराज की सभा में उन्होंने राजा के पिता को देखा। वे व्रतभंग के दोष से वहां आए थे।

इंदिरा एकादशी व्रत कथा
कथा · राजा इंद्रसेन और नारद मुनि की पूरी कथा

पिता ने नारद के हाथ संदेश भेजा था: 'बेटा, मुझे इंदिरा के व्रत का पुण्य देकर स्वर्ग भेजो।' नारद जी ने विधि बताई: आश्विन कृष्ण दशमी को प्रातः और मध्याह्न में स्नान करें, मध्याह्न में पितरों का श्राद्ध करें, एक समय भोजन करें और रात में भूमि पर सोएं। एकादशी को उपवास का नियम लेकर मध्याह्न में शालग्राम शिला के आगे स्नान-पूजन करें और रात में भगवान हृषीकेश के समीप जागरण करें। द्वादशी को प्रातः हरि की पूजा कर गेहूं के आटे से पितरों का श्राद्ध करें, ब्राह्मणों को भोजन कराएं, और परिवार सहित मौन होकर भोजन करें।

राजा इंद्रसेन ने रानियों, पुत्रों और सेवकों सहित यह व्रत किया। व्रत पूरा होने पर आकाश से फूल बरसे, और उनके पिता गरुड़ पर बैठकर विष्णुधाम को चले गए। राजा ने भी निष्कंटक राज्य भोगकर पुत्र को राज्य सौंपा और स्वर्ग गए। इसी कारण पितृ पक्ष में आने वाली यह एकादशी नीच योनि में पड़े पितरों को भी सद्गति देने वाली मानी जाती है।

इंदिरा एकादशी कैसे मनाई जाती है

भक्तगण दशमी को मध्याह्न में पितरों का श्राद्ध कर एक समय भोजन करते हैं, और एकादशी को व्रत का संकल्प लेते हैं। मध्याह्न में शालग्राम के आगे स्नान-पूजन होता है, भगवान विष्णु का पूजन कर इंदिरा एकादशी की कथा सुनी जाती है, और रात में जागरण किया जाता है।

अगले दिन द्वादशी को प्रातः भगवान की पूजा कर, गेहूं के आटे से पितरों का श्राद्ध कर, ब्राह्मणों को भोजन कराकर, शास्त्रोक्त पारण-मुहूर्त में परिवार सहित मौन होकर भोजन से व्रत खोला जाता है, और व्रत का पुण्य पितरों को अर्पित किया जाता है।

ॐ जय जगदीश हरे आरती
आरती · एकादशी पूजन में गाई जाने वाली आरती

चूंकि यह एकादशी पितृ पक्ष के दौरान ही आती है, अनेक परिवार अपने पितरों के श्राद्ध की तिथि से जोड़कर भी इस व्रत को रखते हैं, तथा इसे विशेष रूप से पितरों के कल्याण हेतु समर्पित मानते हैं।

इंदिरा एकादशी पूजा विधि

दशमी को मध्याह्न में पितरों का श्राद्ध करें, एक समय भोजन करें और भूमि पर सोएं। एकादशी को उपवास का संकल्प लें, मध्याह्न में शालग्राम के आगे स्नान-पूजन करें, भगवान हृषीकेश का पूजन कर रात्रि जागरण करें। द्वादशी को प्रातः पूजा कर गेहूं के आटे से श्राद्ध करें, ब्राह्मणों को भोजन कराएं, फिर मौन होकर पारण करें।

इंदिरा एकादशी व्रत कथा पढ़ें
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इंदिरा एकादशी के बारे में

इंदिरा एकादशी आश्विन मास की कृष्ण एकादशी को, पितृ पक्ष के दौरान पितरों की मुक्ति की कामना से रखा जाने वाला व्रत है। इस पृष्ठ पर इस व्रत का महत्व, राजा इंद्रसेन की कथा, तथा व्रत-विधि की जानकारी दी गई है।

सामान्य प्रश्न

इंदिरा एकादशी कब मनाई जाती है?

यह व्रत प्रत्येक वर्ष आश्विन मास की कृष्ण एकादशी तिथि को, पितृ पक्ष के दौरान मनाया जाता है।

इंदिरा एकादशी पितरों की मुक्ति से कैसे जुड़ी है?

कथा के अनुसार देवर्षि नारद ने राजा इंद्रसेन को बताया कि उनके पिता व्रतभंग के दोष से यमलोक में हैं और उन्होंने इंदिरा व्रत का पुण्य मांगा है। राजा ने यह व्रत कर पुण्य पिता को दिया, जिससे वे गरुड़ पर बैठकर विष्णुधाम गए।

इंदिरा एकादशी व जीवित्पुत्रिका व्रत में क्या संबंध है?

दोनों ही आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में, पितृ पक्ष के दौरान आते हैं, जीवित्पुत्रिका व्रत अष्टमी को संतान-कल्याण हेतु, तथा इंदिरा एकादशी उसके कुछ दिन पश्चात पितरों की मुक्ति हेतु रखी जाती है।

इंदिरा एकादशी के दिन क्या करना चाहिए?

पद्म पुराण के अनुसार इस दिन उपवास रखकर मध्याह्न में शालग्राम के आगे स्नान-पूजन करना चाहिए, भगवान विष्णु का पूजन कर रात में जागरण करना चाहिए। पितरों का श्राद्ध एक दिन पहले दशमी को और अगले दिन द्वादशी को किया जाता है, और द्वादशी को ब्राह्मण भोजन के बाद पारण होता है।

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मुख्य जानकारी

देवताभगवान विष्णु
तिथिआश्विन कृष्ण एकादशी
महत्वपितरों की मुक्ति व सद्गति
साथ मेंपितृ पक्ष
व्रत प्रकारदशमी व द्वादशी को श्राद्ध, एकादशी को उपवास