दुर्गा पूजा
दुर्गा पूजा बंगाल और पूर्वी भारत का सबसे बड़ा उत्सव है, जिसमें षष्ठी से दशमी तक, पांच दिन, मां दुर्गा की प्रतिमा की पूजा होती है। मान्यता है कि इन दिनों उमा अपने बच्चों के साथ मायके आती हैं।

तिथियां कोलकाता के अनुसार हैं। बंगाल के कुछ पंजिकाओं में 2026 का बोधन 16 अक्टूबर की संध्या को बताया गया है, सप्तमी से दशमी (18 से 21 अक्टूबर) सबमें एक ही है। उत्तर भारत में इस वर्ष नवमी 19 और विजयादशमी 20 अक्टूबर को है।
दुर्गा पूजा का महत्व
दुर्गा पूजा मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय का उत्सव है, जिसकी कथा दुर्गा सप्तशती के दूसरे और तीसरे अध्याय में है। पंडालों में देवी की प्रतिमा महिषासुरमर्दिनी रूप में होती है, और उनके साथ लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिकेय भी विराजते हैं।
बंगाल में इसे देवी के मायके आने के रूप में भी देखा जाता है: हिमालय की पुत्री उमा वर्ष में एक बार अपने बच्चों के साथ घर लौटती हैं, और दशमी को उन्हें विदा किया जाता है। इसीलिए विदाई का दिन आनन्द के साथ भावुकता से भी भरा होता है।
शरद ऋतु की इस पूजा को 'अकाल बोधन' भी कहते हैं, यानी असमय जागरण। बंगाल की कृत्तिवासी रामायण के अनुसार रावण से युद्ध से पहले श्रीराम ने शरद में देवी को जगाकर उनकी पूजा की थी, जबकि देवी की पारंपरिक पूजा वसन्त में होती थी। दिसंबर 2021 में यूनेस्को ने 'कोलकाता की दुर्गा पूजा' को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की सूची में शामिल किया।
दुर्गा पूजा कैसे मनाई जाती है
उत्सव की आहट महालया से मिलती है, जब पितृ पक्ष समाप्त होकर देवी पक्ष आरंभ होता है। बंगाल में इस भोर रेडियो पर 'महिषासुरमर्दिनी' का प्रसारण सुनने की परंपरा है, और इसी दिन प्रतिमाओं की आंखें बनाई जाती हैं, जिसे 'चक्षुदान' कहते हैं।
पांचों दिन पंडालों में पूजा, पुष्पांजलि, ढाक की थाप पर धुनुची नाच और भोग का वितरण होता है। अष्टमी की सुबह की पुष्पांजलि में सबसे अधिक भक्त जुटते हैं, और खिचड़ी, लाबड़ा व पायस का भोग प्रसाद रूप में बंटता है।
दशमी को विवाहित स्त्रियां देवी को मिठाई खिलाकर और सिंदूर लगाकर विदा करती हैं, फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं, जिसे 'सिंदूर खेला' कहते हैं। इसके बाद प्रतिमाएं जल में विसर्जित की जाती हैं और लोग 'शुभो बिजोया' कहकर बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं।
दुर्गा पूजा पूजा विधि
षष्ठी की संध्या बेल वृक्ष के नीचे देवी का बोधन और आमंत्रण होता है। सप्तमी की भोर नवपत्रिका को स्नान कराकर प्रतिमा के पास स्थापित किया जाता है और प्राण प्रतिष्ठा होती है। अष्टमी को पुष्पांजलि, कुमारी पूजा और अष्टमी-नवमी के संधि-काल में 108 दीपों व कमलों से संधि पूजा होती है। नवमी को होम होता है और दशमी को दर्पण विसर्जन, सिंदूर खेला व प्रतिमा विसर्जन।
दुर्गा पूजा 2026: दिन-प्रतिदिन
तिथियां कोलकाता के अनुसार।
- १
महालया, शनिवार 10 अक्टूबर
पितृ पक्ष का अन्त और देवी पक्ष का आरंभ। पितरों का तर्पण, भोर में 'महिषासुरमर्दिनी' का पाठ, और प्रतिमाओं का चक्षुदान।
- २
महाषष्ठी, शनिवार 17 अक्टूबर
कल्पारम्भ (पूजा का संकल्प), संध्या को बेल वृक्ष के नीचे देवी का बोधन, आमंत्रण और अधिवास। इसी दिन पंडालों में प्रतिमा का मुख खोला जाता है।
- ३
महासप्तमी, रविवार 18 अक्टूबर
भोर में नवपत्रिका (कोलाबोउ) को नदी या जल में स्नान कराया जाता है: केले के पौधे के साथ अरबी, हल्दी, जयन्ती, बेल, अनार, अशोक, मानकचु और धान, ये नौ पौधे बांधकर, लाल किनारी की साड़ी पहनाकर गणेश जी के पास स्थापित किए जाते हैं। फिर प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा होती है।
- ४
महाअष्टमी, सोमवार 19 अक्टूबर
सुबह पुष्पांजलि और कुमारी पूजा, जिसमें एक छोटी कन्या को देवी रूप में पूजा जाता है (बेलूड़ मठ की कुमारी पूजा प्रसिद्ध है)। अष्टमी तिथि प्रातः 10:51 पर समाप्त होगी, इसलिए संधि पूजा लगभग 10:27 से 11:15 तक, 108 दीपों और 108 कमलों के साथ होगी।
- ५
महानवमी, मंगलवार 20 अक्टूबर
नवमी पूजा, नवमी होम और भोग। पूजा का यह अन्तिम पूरा दिन है, जिसकी रात पंडालों में सबसे अधिक भीड़ होती है।
- ६
विजया दशमी, बुधवार 21 अक्टूबर
दशमी पूजा के बाद दर्पण विसर्जन (देवी के प्रतिबिम्ब का प्रतीकात्मक विसर्जन), विवाहित स्त्रियों का देवी बरन और सिंदूर खेला, फिर प्रतिमा विसर्जन और बिजोया की शुभकामनाएं।
दुर्गा पूजा के बारे में
दुर्गा पूजा बंगाल, असम, ओडिशा, बिहार और त्रिपुरा का प्रमुख शारदीय उत्सव है, जो नवरात्रि के अन्तिम पांच दिनों में मनाया जाता है। इस पृष्ठ पर महालया से विजया दशमी तक हर दिन की तिथि, कोलाबोउ, कुमारी पूजा, संधि पूजा और सिंदूर खेला जैसे अनुष्ठानों की जानकारी दी गई है।
सामान्य प्रश्न
2026 में दुर्गा पूजा कब है?
कोलकाता में महाषष्ठी 17 अक्टूबर, सप्तमी 18, अष्टमी 19, नवमी 20 और विजया दशमी 21 अक्टूबर 2026 को है। महालया 10 अक्टूबर को है।
दुर्गा पूजा और नवरात्रि में क्या अंतर है?
दोनों एक ही समय पर, आश्विन शुक्ल पक्ष में होते हैं। नवरात्रि में नौ दिन देवी के नौ स्वरूपों की पूजा और व्रत होते हैं, जबकि बंगाल की दुर्गा पूजा मुख्यतः षष्ठी से दशमी तक, महिषासुरमर्दिनी प्रतिमा की सामूहिक पूजा का उत्सव है।
कोलाबोउ (नवपत्रिका) क्या है?
केले के पौधे के साथ नौ पौधों को बांधकर बनाई गई नवपत्रिका, जिसे सप्तमी की भोर स्नान कराकर लाल किनारी की साड़ी पहनाई जाती है और गणेश जी के पास रखा जाता है। ये नौ पौधे देवी के नौ रूपों के प्रतीक माने जाते हैं।
सिंदूर खेला कब और क्यों होता है?
विजया दशमी को, प्रतिमा विसर्जन से पहले। विवाहित स्त्रियां देवी को सिंदूर लगाकर विदा करती हैं और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सौभाग्य की कामना करती हैं।