मुख्यकथाश्री मोक्षदा एकादशी व्रत कथा

श्री मोक्षदा एकादशी व्रत कथा

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा राजा वैखानस और उनके नरक में पड़े पितरों की मुक्ति की कथा है, जो मार्गशीर्ष मास के शुक्लपक्ष में सुनी-सुनाई जाती है और जिसका पूर्ण पाठ यहां उपलब्ध है।

श्री मोक्षदा एकादशी व्रत कथा
अध्याय/

अध्याय · राजा वैखानस का स्वप्न

युधिष्ठिर बोले: 'देवदेवेश्वर, मार्गशीर्ष मास के शुक्लपक्ष में कौन सी एकादशी होती है, उसकी क्या विधि है, तथा उसमें किस देवता का पूजन किया जाता है, स्वामिन्, यह सब यथार्थ रूप से बताइए।' श्रीकृष्ण ने कहा: 'नृपश्रेष्ठ, मार्गशीर्ष मास के शुक्लपक्ष की एकादशी का वर्णन करूंगा, जिसके श्रवण-मात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है, उसका नाम मोक्षदा एकादशी है, जो सब पापों का अपहरण करने वाली है। राजन्, उस दिन यत्नपूर्वक तुलसी की मंजरी तथा धूप-दीपादि से भगवान दामोदर का पूजन करना चाहिए, मोक्षदा एकादशी बड़े-बड़े पातकों का नाश करने वाली है, उस दिन रात्रि में मेरी प्रसन्नता के लिए नृत्य, गीत और स्तुति के द्वारा जागरण करना चाहिए। जिसके पितर पापवश नीच योनि में पड़े हों, वे इस एकादशी का व्रत करके इसका पुण्य-दान अपने पितरों को करें, तो पितर मोक्ष को प्राप्त होते हैं, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।'

पूर्वकाल की बात है, वैष्णवों से विभूषित परम रमणीय चंपक नगर में वैखानस नामक राजा रहते थे, वे अपनी प्रजा का पुत्र की भांति पालन करते थे। इस प्रकार राज्य करते हुए राजा ने एक दिन रात को स्वप्न में अपने पितरों को नीच योनि में पड़ा हुआ देखा, उन सबको इस अवस्था में देखकर राजा के मन में बड़ा विस्मय हुआ, और प्रातःकाल ब्राह्मणों से उन्होंने उस स्वप्न का सारा हाल कह सुनाया। राजा बोले: 'ब्राह्मणो, मैंने अपने पितरों को नरक में गिरा हुआ देखा है, वे बारंबार रोते हुए मुझसे यों कह रहे थे कि तुम हमारे तनुज हो, इसलिए इस नरक-समुद्र से हम लोगों का उद्धार करो, द्विजवरो, इस रूप में मुझे पितरों के दर्शन हुए हैं, इससे मुझे चैन नहीं मिलता, क्या करूं, कहां जाऊं, मेरा हृदय रुंधा जा रहा है, द्विजोत्तमो, वह व्रत, वह तप और वह योग, जिससे मेरे पूर्वज तत्काल नरक से छुटकारा पा जाएं, बताने की कृपा करें, मुझ बलवान तथा साहसी पुत्र के जीते जी मेरे माता-पिता घोर नरक में पड़े हुए हैं, अतः ऐसे पुत्र से क्या लाभ है?' ब्राह्मण बोले: 'राजन्, यहां से निकट ही पर्वत मुनि का महान आश्रम है, वे भूत और भविष्य के भी ज्ञाता हैं, नृपश्रेष्ठ, आप उन्हीं के पास चले जाइए।'

अध्याय · पर्वत मुनि का उपाय और पितरों की मुक्ति

ब्राह्मणों की बात सुनकर महाराज वैखानस शीघ्र ही पर्वत मुनि के आश्रम पर गए, और वहां उन मुनिश्रेष्ठ को देखकर उन्होंने दंडवत् प्रणाम करके मुनि के चरणों का स्पर्श किया, मुनि ने भी राजा से राज्य के सातों अंगों की कुशलता पूछी। राजा बोले: 'स्वामिन्, आपकी कृपा से मेरे राज्य के सातों अंग सकुशल हैं, किंतु मैंने स्वप्न में देखा है कि मेरे पितर नरक में पड़े हैं, अतः बताइए कि किस पुण्य के प्रभाव से उनका वहां से छुटकारा होगा?' राजा की यह बात सुनकर मुनिश्रेष्ठ पर्वत एक मुहूर्त तक ध्यानस्थ रहे, इसके बाद वे राजा से बोले: 'महाराज, मार्गशीर्ष के शुक्लपक्ष में जो मोक्षदा नाम की एकादशी होती है, तुम सब लोग उसका व्रत करो, और उसका पुण्य पितरों को दे डालो, उस पुण्य के प्रभाव से उनका नरक से उद्धार हो जाएगा।'

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: युधिष्ठिर, मुनि की यह बात सुनकर राजा पुनः अपने घर लौट आए, जब उत्तम मार्गशीर्ष मास आया, तब राजा वैखानस ने मुनि के कथनानुसार मोक्षदा एकादशी का व्रत करके उसका पुण्य समस्त पितरों सहित पिता को दे दिया, पुण्य देते ही क्षणभर में आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी, वैखानस के पिता पितरों सहित नरक से छुटकारा पा गए, और आकाश में आकर राजा के प्रति यह पवित्र वचन बोले: 'बेटा, तुम्हारा कल्याण हो।' यह कहकर वे स्वर्ग में चले गए। राजन्, जो इस प्रकार कल्याणमयी मोक्षदा एकादशी का व्रत करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं, और मरने के बाद वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है, यह मोक्ष देने वाली मोक्षदा एकादशी मनुष्यों के लिए चिंतामणि के समान समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली है।

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श्री मोक्षदा एकादशी व्रत कथा पाठ विधि

मोक्षदा एकादशी को तुलसी की मंजरी तथा धूप-दीप से भगवान दामोदर का पूजन करें, और रात्रि में नृत्य, गीत व स्तुति से जागरण करें। जिसके पितर दुर्गति में हों, वह इस व्रत का पुण्य संकल्पपूर्वक अपने पितरों को अर्पित करे, इससे पितरों को मोक्ष प्राप्त होता है। इस माहात्म्य के पढ़ने-सुनने मात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।

पाठ दिवस
मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष एकादशी
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विष्णु चालीसा
स्तोत्र · ६ मिनट
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श्री मोक्षदा एकादशी व्रत कथा के बारे में

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा राजा वैखानस की कथा है, जो दो अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में राजा वैखानस स्वप्न में अपने पितरों को नरक में पड़ा हुआ देखते हैं, और ब्राह्मणों की सलाह पर सिद्ध मुनि पर्वत के आश्रम जाते हैं। दूसरे अध्याय में मुनि पर्वत उन्हें मोक्षदा एकादशी व्रत का पुण्य पितरों को अर्पित करने की विधि बताते हैं, जिससे राजा के पितर नरक से मुक्त होकर स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।

यह व्रत मार्गशीर्ष मास के शुक्लपक्ष की एकादशी को पितरों की मुक्ति और मोक्ष-प्राप्ति की कामना से किया जाता है। इस पृष्ठ पर दोनों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा का कोई नामित रचयिता नहीं है। यह भगवान श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को सुनाई गई कथा के रूप में प्रचलित है, और परंपरागत रूप से पद्म पुराण व भविष्य पुराण की एकादशी-माहात्म्य परंपरा से जोड़ी जाती है। यहां प्रस्तुत पाठ एक प्रकाशित हिंदी व्रत-कथा संग्रह पुस्तिका में छपी मोक्षदा एकादशी व्रत कथा का यथावत रूपांतरण है, जिसमें केवल स्पष्ट मुद्रण-त्रुटियां सुधारी गई हैं, कथा में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। अन्य मुद्रित संस्करणों में शब्दों का हेरफेर मिल सकता है।

रचनाकार
अज्ञात
पौराणिक कथा (कृष्ण-युधिष्ठिर संवाद परंपरा)

सामान्य प्रश्न

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा में कुल कितने अध्याय हैं?

इसमें कुल दो अध्याय हैं, जो एक साथ पूर्ण पाठ के रूप में पढ़े या सुने जाते हैं।

मोक्षदा एकादशी कब मनाई जाती है?

यह मार्गशीर्ष मास के शुक्लपक्ष की एकादशी को मनाई जाती है, यही तिथि गीता जयंती के रूप में भी मनाई जाती है।

मोक्षदा एकादशी का व्रत क्यों किया जाता है?

जैसा कथा में बताया गया है, यह व्रत विशेष रूप से पितरों की दुर्गति दूर कर उन्हें मोक्ष दिलाने के लिए किया जाता है, इसीलिए इसका नाम मोक्षदा (मोक्ष देने वाली) पड़ा।

क्या सभी एकादशियों के लिए एक ही कथा है?

नहीं, वर्ष में २४ एकादशियां होती हैं और परंपरा में हर एक की अपनी अलग कथा है। मोक्षदा एकादशी की यह पितृ-मुक्ति की कथा है, जबकि अन्य एकादशियों की कथाएं इस साइट पर अलग-अलग पृष्ठों पर उपलब्ध हैं।

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पाठ विवरण

रचनाकारअज्ञात
संरचना२ अध्याय
पाठ समय३ मिनट