निर्जला एकादशी
निर्जला एकादशी ज्येष्ठ मास की शुक्ल एकादशी को, गंगा दशहरा के अगले दिन मनाई जाती है। पद्म पुराण के अनुसार इस एक दिन बिना जल के उपवास करने से वर्ष भर की सब एकादशियों का फल मिलता है।

यह एकादशी गंगा दशहरा के अगले दिन आती है। भीमसेन की कथा के कारण इसे भीमसेनी एकादशी या पांडव एकादशी भी कहते हैं।
निर्जला एकादशी का महत्व
पद्म पुराण में भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर महर्षि व्यास बताते हैं कि जब सूर्य वृष या मिथुन राशि में हो, तब ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी का एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक बिना जल के उपवास करने वाला वर्ष की सब शुक्ल और कृष्ण एकादशियों का फल पाता है। कुल्ले और आचमन के जल को छोड़कर इसमें जल भी नहीं लिया जाता।
कथा के अनुसार युधिष्ठिर, कुंती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव हर एकादशी का उपवास करते थे, पर भीमसेन के पेट में वृक नाम की अग्नि सदा जलती रहती थी और वे भूख नहीं सह पाते थे। उन्होंने व्यास जी से कोई एक ऐसा व्रत पूछा जिससे स्वर्ग मिल जाए। व्यास जी ने उन्हें यही निर्जल व्रत बताया, और तब से यह तिथि पांडव द्वादशी के नाम से प्रसिद्ध हुई।
निर्जला एकादशी कैसे मनाई जाती है
भक्तगण दातुन करके संकल्प लेते हैं कि भगवान केशव की प्रसन्नता के लिए वे निराहार रहेंगे और जल भी नहीं लेंगे। दिन भर भगवान विष्णु का पूजन, कथा श्रवण और रात में जागरण होता है।
ज्येष्ठ की गर्मी में आने के कारण इस दिन जल-दान का विशेष महत्व है। कथा में जल से भरे घड़े, छाता, जूते, अन्न, वस्त्र और शय्या का दान बताया गया है, और द्वादशी को ब्राह्मणों को शक्कर सहित जलकुंभ देकर पारण किया जाता है।
यह व्रत अत्यंत कठोर है, इसलिए बीमार, वृद्ध, गर्भवती स्त्रियां और छोटे बच्चे पूर्ण निर्जल व्रत के बजाय फल या जल लेकर हल्का व्रत रखते हैं।
निर्जला एकादशी पूजा विधि
दशमी को सात्विक भोजन करें। एकादशी को दातुन करके निर्जल व्रत का संकल्प लें और एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक कुल्ले और आचमन के अलावा जल न लें। भगवान विष्णु की पूजा कर कथा सुनें और रात में जागरण करें। द्वादशी को स्नान कर भगवान त्रिविक्रम की पूजा करें, ब्राह्मणों को शक्कर सहित जलकुंभ दान कर भोजन कराएं, फिर पारण-मुहूर्त में व्रत खोलें।
निर्जला एकादशी के बारे में
निर्जला एकादशी ज्येष्ठ मास की शुक्ल एकादशी को बिना अन्न और जल के रखा जाने वाला व्रत है, जिसे वर्ष की सब एकादशियों का फल देने वाला माना गया है। इस पृष्ठ पर इसकी तिथि, व्रत की विधि, दान और पद्म पुराण में दी गई भीमसेन व व्यास जी की कथा का सार है।
सामान्य प्रश्न
निर्जला एकादशी 2027 कब है?
निर्जला एकादशी 2027 में सोमवार, 14 जून को है, गंगा दशहरा के अगले दिन। पारण का समय नज़दीक आने पर यहां जोड़ा जाएगा।
निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी क्यों कहते हैं?
भीमसेन भूख न सह पाने के कारण हर एकादशी का उपवास नहीं कर पाते थे। व्यास जी ने उन्हें यह एक निर्जल व्रत बताया, जिससे सब एकादशियों का फल मिलता है। भीमसेन के इस व्रत के कारण इसे भीमसेनी, पांडव एकादशी या पांडव द्वादशी कहा जाता है।
निर्जला एकादशी पर क्या दान करें?
पद्म पुराण के अनुसार जलधेनु, या सोने और वस्त्र सहित जल से भरा घड़ा, और अन्न, वस्त्र, गाय, शय्या, कमंडलु, छाता और जूतों का दान करना चाहिए। द्वादशी को ब्राह्मणों को शक्कर सहित जलकुंभ देने का विशेष विधान है।