श्री प्रदोष व्रत कथा
प्रदोष व्रत हर माह की दोनों त्रयोदशी को किया जाता है, और जिस भी वार पड़े उसके नाम से जाना जाता है, रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र या शनि प्रदोष, तथा परंपरा में हर वार की अपनी अलग कथा है। इस पृष्ठ पर व्रत का सामान्य परिचय व पूजा-विधि दी गई है, और नीचे सातों वार की कथाओं के पृष्ठों के लिंक उपलब्ध हैं।

अध्याय १ · प्रदोष व्रत क्या है
हर चंद्र मास की दोनों त्रयोदशी, शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष, को प्रदोष व्रत किया जाता है। सांयकाल के बाद और रात्रि आने से पूर्व के जिस थोड़े समय को प्रदोष काल कहा जाता है, उसी समय भगवान शिव का पूजन करने की परंपरा है, इसीलिए इस व्रत का नाम प्रदोष व्रत पड़ा। मान्यता है कि इस समय भगवान शिव कैलाश पर्वत पर आनंद-तांडव करते हैं, और जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस समय उनका पूजन करता है, उसकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। त्रयोदशी जिस भी वार को पड़े, प्रदोष व्रत उसी वार के नाम से जाना जाता है, और परंपरा में हर वार की अपनी अलग कथा प्रचलित है, जिसका श्रवण उस दिन के व्रत को पूर्ण करने के लिए आवश्यक माना जाता है।
अध्याय २ · वार के अनुसार प्रदोष कथाएं
रविवार को पड़ने वाली त्रयोदशी रवि प्रदोष कहलाती है। इसकी कथा एक दीन ब्राह्मण के इकलौते पुत्र की है, जो चोरों से तो बच निकलता है, पर आगे राजा द्वारा भूलवश चोर समझकर बंदी बना लिया जाता है, और अंततः अपनी माता की प्रदोष-भक्ति से निर्दोष सिद्ध होकर मुक्त होता है।
रवि प्रदोष व्रत कथा पढ़ें →मंगलवार को पड़ने वाली त्रयोदशी भौम या मंगल प्रदोष कहलाती है। इसकी कथा में हनुमान जी साधु का वेश धरकर एक वृद्धा भक्तिन की श्रद्धा की एक कठिन परीक्षा लेते हैं, और अंत में अपने वास्तविक रूप में प्रकट होकर उसे आशीर्वाद देते हैं।
भौम प्रदोष व्रत कथा पढ़ें →बुधवार को पड़ने वाली त्रयोदशी बुध प्रदोष कहलाती है। इसकी कथा में बुधवार को हठपूर्वक अपनी पत्नी की विदाई कराने वाले एक व्यक्ति को मार्ग में अपने ही समान दिखने वाले एक और पुरुष का सामना करना पड़ता है, जो शिव-प्रार्थना से ही सुलझता है।
बुध प्रदोष व्रत कथा पढ़ें →गुरुवार को पड़ने वाली त्रयोदशी गुरु या बृहस्पति प्रदोष कहलाती है। इसकी कथा देवराज इंद्र और दैत्य वृत्रासुर के युद्ध की है, जिसमें इंद्र गुरु बृहस्पति की सलाह पर यही व्रत करके विजय प्राप्त करते हैं।
गुरु प्रदोष व्रत कथा पढ़ें →शुक्रवार को पड़ने वाली त्रयोदशी शुक्र प्रदोष कहलाती है। इसकी कथा में एक सेठ-पुत्र शुक्रास्त काल में हठपूर्वक अपनी पत्नी की विदाई करा लाता है, जिसके बाद एक के बाद एक विपत्तियां आती हैं, जब तक शुक्र-दोष का निवारण नहीं हो जाता।
शुक्र प्रदोष व्रत कथा पढ़ें →शनिवार को पड़ने वाली त्रयोदशी शनि प्रदोष कहलाती है, और इसकी कथा सबसे प्रचलित मानी जाती है, एक निर्धन ब्राह्मणी के दो पुत्रों की शिव-भक्ति से एक राज्यविहीन राजकुमार को पुनः अपना राज्य प्राप्त होता है।
शनि प्रदोष व्रत कथा पढ़ें →श्री प्रदोष व्रत कथा पाठ विधि
सांयकाल के बाद और रात्रि आने से पूर्व का समय प्रदोष कहलाता है, और व्रत करने वाले को उसी समय भगवान शंकर का पूजन करना चाहिए। त्रयोदशी के दिन दिनभर भोजन न करें, शाम को जब सूर्यास्त में तीन घड़ी शेष रह जाए तब स्नानादि से निवृत्त होकर श्वेत वस्त्र धारण करें, संध्या-वंदना के बाद शिवजी का पूजन प्रारंभ करें। उद्यापन में रंगीन वस्त्रों से मंडप बनाकर शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित करें, खीर से हवन करें, ॐ उमा सहित शिवाय नमः मंत्र से १०८ आहुति दें, और अंत में ब्राह्मण को दान देकर बंधु-बांधवों सहित भोजन करें।
श्री प्रदोष व्रत कथा के बारे में
यह पृष्ठ प्रदोष व्रत का परिचय-पृष्ठ है, जो त्रयोदशी तिथि, प्रदोष काल और शिव-पूजन की सामान्य विधि बताता है। प्रदोष व्रत का कोई एक निश्चित नाम या कथा नहीं है, यह हमेशा जिस वार को त्रयोदशी पड़े, उसी वार के नाम से जाना जाता है, और परंपरा में हर वार की अपनी अलग कथा प्रचलित है।
वार के अनुसार सातों प्रदोष कथाएं, रवि, सोम, मंगल (भौम), बुध, गुरु, शुक्र और शनि प्रदोष, नीचे 'प्रदोष व्रत, वार के अनुसार' सूची में दी गई हैं। हर कथा का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उसके अपने पृष्ठ पर उपलब्ध है।
इस पृष्ठ का उद्देश्य प्रदोष व्रत का सामान्य परिचय देना है, न कि किसी एक कथा को प्रस्तुत करना। चूंकि त्रयोदशी हर माह दो बार आती है और सातों वारों में से किसी भी वार को पड़ सकती है, परंपरा में हर वार की अपनी अलग-अलग प्रदोष कथा प्रचलित है, रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि प्रदोष, सातों की कथाएं भिन्न हैं, और हर एक की अपनी अलग-अलग स्रोत परंपरा है। हर कथा का विवरण और स्रोत उसके अपने पृष्ठ पर दिया गया है। सोम प्रदोष की कथा कुछ प्रकाशित स्रोतों में शनि प्रदोष की कथा से मिलती-जुलती (और कहीं-कहीं समान) पाई जाती है, इसलिए उसका अलग पृष्ठ यहां नहीं बनाया गया है, शनि प्रदोष का पृष्ठ ही देखें।
सामान्य प्रश्न
प्रदोष व्रत कब किया जाता है?
यह व्रत हर माह की दोनों त्रयोदशी तिथियों को, सांयकाल के बाद और रात्रि आने से पूर्व के प्रदोष काल में किया जाता है।
प्रदोष का अर्थ क्या है?
सांयकाल के बाद और रात्रि आने से पूर्व के समय को प्रदोष कहा जाता है, और इसी समय भगवान शंकर का पूजन किया जाता है।
क्या प्रदोष व्रत की सिर्फ एक ही कथा है?
नहीं, त्रयोदशी जिस भी वार को पड़े उसके अनुसार व्रत का नाम और कथा दोनों बदल जाते हैं, रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि प्रदोष, सभी की परंपरा में अपनी अलग कथाएं हैं। हर कथा नीचे दी गई सूची से उसके अपने पृष्ठ पर पढ़ी जा सकती है।
इनमें से सबसे प्रचलित कथा कौन-सी है?
शनि प्रदोष की कथा, एक निर्धन ब्राह्मणी के दो पुत्रों और एक राज्यविहीन राजकुमार की कथा, सबसे प्रचलित मानी जाती है, और यही अधिकतर लोग 'प्रदोष व्रत कथा' खोजने पर ढूंढ़ते हैं।
क्या प्रदोष व्रत का उद्यापन आवश्यक है?
जैसा पूजा-विधि में बताया गया है, मनोकामना पूर्ण होने पर विधिपूर्वक शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित कर हवन और ब्राह्मण-भोजन सहित इसका उद्यापन करना चाहिए।