श्री रवि प्रदोष व्रत कथा
रवि प्रदोष व्रत कथा उस त्रयोदशी की कथा है जो रविवार को पड़ती है, एक दीन ब्राह्मण के इकलौते पुत्र के चोरों से बचने, राजा द्वारा गलती से बंदी बनाए जाने, और शिव-भक्ति से निर्दोष सिद्ध होने की कथा, जिसका पूर्ण पाठ यहां उपलब्ध है।

अध्याय १ · बालक का चोरों से बचना और राजा द्वारा बंदी बनाया जाना
एक ग्राम में अत्यंत दीन ब्राह्मण निवास करता था, उसकी साध्वी स्त्री प्रदोष व्रत किया करती थी, उसे एक ही पुत्ररत्न था। एक समय की बात है, वह पुत्र गंगा स्नान करने के लिए गया। दुर्भाग्यवश मार्ग में चोरों ने उसे घेर लिया, और वे कहने लगे: 'हम तुम्हें मारेंगे नहीं, तुम अपने पिता के गुप्त धन के बारे में हमें बतला दो।' बालक दीनभाव से कहने लगा: 'बंधुओं, हम अत्यंत दुःखी और दीन हैं, हमारे पास धन कहाँ है?' तब चोरों ने कहा: 'तेरे इस पोटली में क्या बंधा है?' बालक ने निःसंकोच कहा: 'मेरी माँ ने मेरे लिए रोटियां दी हैं।' यह सुनकर चोरों ने अपने साथियों से कहा: 'साथियों, यह बहुत ही दीन-दुःखी मनुष्य है, अतः हम किसी और को लूटेंगे।' इतना कहकर चोरों ने उस बालक को जाने दिया।
बालक वहाँ से चलते हुए एक नगर में पहुंचा। नगर के पास एक बरगद का पेड़ था, वह बालक उसी बरगद वृक्ष की छाया में सो गया। उसी समय उस नगर के सिपाही चोरों को खोजते हुए उस बरगद के वृक्ष के पास पहुंचे, और बालक को चोर समझकर बंदी बना राजा के पास ले गए। राजा ने उसे कारावास में बंद करने का आदेश दिया।
अध्याय २ · प्रदोष व्रत से मुक्ति और राजा का अनुग्रह
ब्राह्मणी का लड़का जब घर नहीं लौटा, तब उसे अपने पुत्र की बड़ी चिंता हुई। अगले दिन प्रदोष व्रत था, ब्राह्मणी ने प्रदोष व्रत किया, और भगवान शंकर से मन-ही-मन अपने पुत्र की कुशलता की प्रार्थना करने लगी। भगवान शंकर ने उस ब्राह्मणी की प्रार्थना स्वीकार कर ली, उसी रात भगवान शंकर ने उस राजा को स्वप्न में आदेश दिया कि वह बालक चोर नहीं है, उसे प्रातःकाल छोड़ दें, अन्यथा तुम्हारा सारा राज्य-वैभव नष्ट हो जाएगा।
प्रातःकाल राजा ने शिवजी की आज्ञानुसार उस बालक को कारावास से मुक्त कर दिया। बालक ने अपनी सारी कहानी राजा को सुनाई, सारा वृत्तांत सुनकर राजा ने अपने सिपाहियों को उस बालक के घर भेजा, और उसके माता-पिता को राजदरबार में बुलाया। उसके माता-पिता बहुत ही भयभीत थे, राजा ने उन्हें भयभीत देखकर कहा: 'आप भयभीत न हों, आपका बालक निर्दोष है।' राजा ने ब्राह्मण को पांच गांव दान में दिए, जिससे वे सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सकें। इस तरह ब्राह्मण आनंद से रहने लगा, शिव जी की दया से उसकी दरिद्रता दूर हो गई। अतः जो भी मनुष्य रवि प्रदोष व्रत करता है, वह सुखपूर्वक और निरोगी होकर अपना पूर्ण जीवन व्यतीत करता है।
श्री रवि प्रदोष व्रत कथा पाठ विधि
जिस त्रयोदशी को रविवार पड़े, उस दिन सांयकाल प्रदोष काल में भगवान शिव का पूजन करें, व्रत रखें, और इस कथा का श्रवण अवश्य करें। रवि प्रदोष व्रत आरोग्य और सुखी जीवन के लिए विशेष रूप से किया जाता है।
श्री रवि प्रदोष व्रत कथा के बारे में
रवि प्रदोष व्रत कथा दो अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में एक दीन ब्राह्मण का इकलौता पुत्र चोरों से किसी तरह बच निकलता है, परंतु आगे एक नगर में सिपाहियों द्वारा गलती से चोर समझकर बंदी बना लिया जाता है। दूसरे अध्याय में उसकी माता प्रदोष व्रत करके भगवान शिव से प्रार्थना करती है, जिससे शिवजी स्वप्न में राजा को आदेश देते हैं कि बालक निर्दोष है, और राजा उसे मुक्त कर पुरस्कृत भी करता है।
यह कथा उस त्रयोदशी के लिए विशेष रूप से बताई जाती है जो रविवार को पड़े। इस पृष्ठ पर दोनों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
रवि प्रदोष व्रत कथा का कोई नामित रचयिता नहीं है। प्रदोष व्रत हर माह की दोनों त्रयोदशी को पड़ता है, और जिस वार को यह पड़े उसी के नाम से जाना जाता है, इसकी विस्तृत चर्चा 'प्रदोष व्रत' के मुख्य परिचय-पृष्ठ पर उपलब्ध है। यहां प्रस्तुत पाठ रविवार को पड़ने वाली त्रयोदशी, यानी रवि प्रदोष, से जुड़ी परंपरागत कथा का यथावत रूपांतरण है, जो एक हिंदी भक्ति-पोर्टल पर प्रकाशित पाठ पर आधारित है। इस कथा का भी कोई एकल, प्राचीन मूल पाठ नहीं है, अन्य स्रोतों में शब्दों का हेरफेर मिल सकता है।
सामान्य प्रश्न
रवि प्रदोष व्रत कब किया जाता है?
जब त्रयोदशी तिथि रविवार को पड़े, तब उस दिन के प्रदोष व्रत को रवि प्रदोष कहा जाता है।
क्या यह प्रदोष व्रत की मुख्य कथा से अलग है?
हां, प्रदोष व्रत सातों वारों पर पड़ सकता है और परंपरा में हर वार की अपनी अलग कथा है। यह पृष्ठ विशेष रूप से रवि प्रदोष की कथा देता है, मुख्य 'प्रदोष व्रत कथा' पृष्ठ पर शनि प्रदोष की कथा दी गई है।
रवि प्रदोष व्रत का क्या फल बताया गया है?
जैसा कथा में बताया गया है, इस व्रत को करने वाला मनुष्य सुखपूर्वक और निरोगी होकर अपना पूर्ण जीवन व्यतीत करता है।