मुख्यकथाश्री शनि प्रदोष व्रत कथा

श्री शनि प्रदोष व्रत कथा

शनि प्रदोष व्रत कथा उस त्रयोदशी की कथा है जो शनिवार को पड़ती है, एक निर्धन ब्राह्मणी और उसके दो पुत्रों की कथा, जिनकी शिव-भक्ति से एक राज्यविहीन राजकुमार को पुनः अपना राज्य प्राप्त होता है, जिसका पूर्ण पाठ यहां उपलब्ध है।

श्री शनि प्रदोष व्रत कथा
अध्याय/

अध्याय · ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत की विधि प्राप्ति

पूर्वकाल में एक पुत्रवती ब्राह्मणी थी, उसके दो पुत्र थे, वह ब्राह्मणी बहुत निर्धन थी। दैवयोग से उसे एक दिन महर्षि शाण्डिल्य के दर्शन हुए, महर्षि के मुख से प्रदोष व्रत की महिमा सुनकर उस ब्राह्मणी ने ऋषि से पूजन की विधि पूछी। उसकी श्रद्धा और आग्रह से ऋषि ने उस ब्राह्मणी को शिव-पूजन का विधान बतलाया, और उस ब्राह्मणी से कहा: 'तुम अपने दोनों पुत्रों से शिव की पूजा कराओ, इस व्रत के प्रभाव से तुम्हें एक वर्ष के पश्चात् पूर्ण सिद्धि प्राप्त होगी।'

उस ब्राह्मणी ने महर्षि शाण्डिल्य के वचन सुनकर उन बालकों सहित नतमस्तक होकर मुनि के चरणों में प्रणाम किया, और बोली: 'हे ब्राह्मण, आज मैं आपके दर्शन से धन्य हो गई हूं, मेरे ये दोनों कुमार आपके सेवक हैं, आप मेरा उद्धार कीजिए।' उस ब्राह्मणी को शरणागत जानकर मुनि ने मधुर वचनों द्वारा दोनों कुमारों को शिवजी की आराधना-विधि बतलाई। तदनंतर वे दोनों बालक और ब्राह्मणी मुनि को प्रणाम कर शिव-मंदिर में चले गए। उस दिन से वे दोनों बालक मुनि के कथनानुसार नियमपूर्वक प्रदोष काल में शिवजी की पूजा करने लगे।

अध्याय · नदी में स्वर्ण-कलश और राजकुमार का त्याग

पूजा करते हुए उन दोनों को चार महीने बीत गए। एक दिन राजकुमार की अनुपस्थिति में शुचिव्रत स्नान करने नदी किनारे चला गया, और वहां जल-क्रीड़ा करने लगा। संयोग से उसी समय उसे नदी की दरार में चमकता हुआ धन का बड़ा-सा कलश दिखाई पड़ा, उस धनपूरित कलश को देखकर शुचिव्रत बहुत प्रसन्न हुआ, उस कलश को वह सिर पर रखकर घर ले आया।

कलश भूमि पर रखकर वह अपनी माता से बोला: 'हे माता, शिवजी की महिमा तो देखो, भगवान ने इस घड़े के रूप में मुझे अपार संपत्ति दी है।' उसकी माता घड़े को देखकर आश्चर्य करने लगी, और राजकुमार को बुलाकर कहा: 'बेटे, मेरी बात सुनो, तुम दोनों इस धन को आधा-आधा बांट लो।' माता की बात सुनकर शुचिव्रत बहुत प्रसन्न हुआ, परंतु राजकुमार ने अपनी असहमति प्रकट करते हुए कहा: 'हे मां, यह धन तेरे पुत्र के पुण्य से प्राप्त हुआ है, मैं इसमें किसी प्रकार का हिस्सा लेना नहीं चाहता, क्योंकि अपने किए कर्म का फल मनुष्य स्वयं ही भोगता है।' इस प्रकार शिव-पूजन करते हुए एक ही घर में उन्हें एक वर्ष व्यतीत हो गया।

अध्याय · वन में गंधर्व-कन्या अंशुमती से भेंट

एक दिन राजकुमार ब्राह्मण के पुत्र के साथ वसंत ऋतु में वन-विहार करने के लिए गया, वे दोनों जब साथ-साथ वन से बहुत दूर निकल गए, तो उन्हें वहां सैकड़ों गंधर्व-कन्याएं खेलती हुई दिखाई पड़ीं। ब्राह्मण-कुमार उन गंधर्व-कन्याओं को क्रीड़ारत देखकर राजकुमार से बोला: 'यहां कन्याएं विहार कर रही हैं, इसलिए हम लोगों को अब और आगे नहीं जाना चाहिए, क्योंकि वे गंधर्व-कन्याएं शीघ्र ही मनुष्यों के मन को मोहित कर लेती हैं, इसलिए मैं तो इन कन्याओं से दूर ही रहूंगा।' परंतु राजकुमार उसकी बात अनसुनी कर कन्याओं के विहार-स्थल में निर्भीक भाव से अकेला ही चला गया। उन सभी गंधर्व-कन्याओं में प्रधान सुंदरी, उस समय आए हुए राजकुमार को देखकर मन में विचार करने लगी कि कामदेव के समान सुंदर रूप वाला यह राजकुमार कौन है। उस राजकुमार के साथ बातचीत करने के उद्देश्य से सुंदरी ने अपनी सखियों से कहा: 'सखियों, तुम लोग निकट के वन में जाकर अशोक, चंपक, मौलसिरी आदि के ताज़े फूल तोड़ लाओ, तब तक मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में यहीं रुकी रहूंगी।' उस गंधर्व-कुमारी की बात सुनते ही सब सखियां वहां से चली गईं।

सखियों के जाने के बाद वह गंधर्व-कन्या राजकुमार को स्थिर दृष्टि से देखने लगी, उन दोनों में परस्पर प्रेम का संचार होने लगा, गंधर्व-कन्या ने राजकुमार को बैठने के लिए आसन दिया। प्रेमालाप के कारण राजकुमार के सहवास के लिए वह सुंदरी व्याकुल हो उठी, और राजकुमार से प्रश्न करने लगी: 'हे कमल के समान नेत्रों वाले, आप किस देश के रहने वाले हैं, आपका यहां आना क्यों कर हुआ?' गंधर्व-कन्या की बात सुनकर राजकुमार ने जवाब दिया: 'मैं विदर्भराज का पुत्र हूं, मेरे माता-पिता स्वर्गवासी हो चुके हैं, शत्रुओं ने मुझसे मेरा राज्य हरण कर लिया है।' राजकुमार ने अपना परिचय देकर उस गंधर्व-कन्या से पूछा: 'आप कौन हैं, किसकी पुत्री हैं, और इस वन में किस उद्देश्य से आई हैं, आप मुझसे क्या चाहती हैं?' राजकुमार की बात सुनकर गंधर्व-कन्या ने कहा: 'मैं विद्रविक नामक गंधर्व की पुत्री अंशुमती हूं, आपको देखकर आपसे बातचीत करने के लिए ही यहां सखियों का साथ छोड़कर रह गई हूं, मैं गान-विद्या में बहुत निपुण हूं, मेरे गान पर सभी देवांगनाएं रीझ जाती हैं, मैं चाहती हूं कि आपका और मेरा प्रेम सदा बना रहे।' इतना कहकर उस गंधर्व-कन्या ने अपने गले का बहुमूल्य मुक्ताहार राजकुमार के गले में डाल दिया, वह हार उन दोनों के प्रेम का प्रतीक बन गया। इसके पश्चात् राजकुमार ने उस कन्या से कहा: 'हे सुंदरी, तुमने जो कुछ कहा, वह सब सत्य है, लेकिन आप राज्यविहीन राजकुमार के पास कैसे रह सकेंगी, आप अपने पिता की अनुमति के बिना मेरे साथ कैसे चल सकेंगी?' राजकुमार की बात पर कन्या मुस्कराकर कहने लगी: 'जो कुछ भी हो, मैं अपनी इच्छा से आपका वरण करूंगी, अब आप परसों प्रातःकाल यहां आइएगा, मेरी बात कभी झूठ नहीं हो सकती।' गंधर्व-कन्या ऐसा कहकर पुनः अपनी सखियों के पास चली गई। इधर वह राजकुमार भी शुचिव्रत के पास जा पहुंचा, और अपना सारा वृत्तांत कह सुनाया, इसके बाद वे दोनों घर लौट गए, घर पहुंचकर उन्होंने ब्राह्मणी को सब हाल कहा, जिसे सुनकर वह ब्राह्मणी भी हर्षित हुई।

अध्याय · गंधर्वराज का वरदान और राजकुमार का राज्याभिषेक

दो दिन बाद जब राजकुमार वन में पहुंचा, तो वहां गंधर्वराज विद्रविक अपनी पुत्री अंशुमती के साथ उपस्थित होकर प्रतीक्षा में बैठे मिले। गंधर्व ने उन दोनों कुमारों का अभिनंदन करके उन्हें सुंदर आसन पर बिठाया, और राजकुमार से कहा: 'मैं परसों कैलासपुरी गया था, वहां भगवान शंकर पार्वती जी सहित विराजमान थे, उन्होंने मुझे अपने पास बुलाकर कहा: पृथ्वी पर राज्यच्युत होकर धर्मगुप्त नामक राजकुमार घूम रहा है, शत्रुओं ने उसके वंश को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है, वह कुमार सदैव ही भक्तिपूर्वक मेरी सेवा किया करता है, इसलिए तुम उसकी सहायता करो, जिससे वह अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर सके, इसलिए मैं भगवान शंकर की आज्ञा से अपनी पुत्री अंशुमती आपको सौंपता हूं, मैं शत्रुओं के हाथ में गए हुए आपके राज्य को वापस दिला दूंगा, आप इस कन्या के साथ दस हज़ार वर्षों तक सुख भोगकर शिवलोक में आने पर भी मेरी पुत्री इसी शरीर में आपके साथ रहेगी।' इतना कहकर गंधर्वराज ने अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार के साथ कर दिया, दहेज में अनेक दास-दासियां तथा शत्रुओं पर विजय पाने के लिए गंधर्वों की चतुरंगिणी सेना भी दी।

राजकुमार ने गंधर्वों की सहायता से शत्रुओं को नष्ट किया, और वह अपने नगर में प्रविष्ट हुआ, मंत्रियों ने राजकुमार को सिंहासन पर बैठाकर राज्याभिषेक किया, अब वह राजकुमार राज-सुख भोगने लगा। जिस दरिद्र ब्राह्मणी ने उसका पालन-पोषण किया था, उसे ही राजमाता के पद पर आसीन किया गया, वह शुचिव्रत ही उसका छोटा भाई बना। इस प्रकार प्रदोष व्रत में शिव-पूजन के प्रभाव से वह राजकुमार दुर्लभ पद को प्राप्त हुआ। जो मनुष्य प्रदोष काल में अथवा नित्य ही इस कथा को श्रवण करता है, वह निश्चय ही सभी कष्टों से मुक्त हो जाता है, और अंत में वह परम पद का अधिकारी बनता है।

श्री शनि प्रदोष व्रत कथा पाठ विधि

सांयकाल के बाद और रात्रि आने से पूर्व का समय प्रदोष कहलाता है, और व्रत करने वाले को उसी समय भगवान शंकर का पूजन करना चाहिए। त्रयोदशी के दिन दिनभर भोजन न करें, शाम को जब सूर्यास्त में तीन घड़ी शेष रह जाए तब स्नानादि से निवृत्त होकर श्वेत वस्त्र धारण करें, संध्या-वंदना के बाद शिवजी का पूजन प्रारंभ करें। उद्यापन में रंगीन वस्त्रों से मंडप बनाकर शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित करें, खीर से हवन करें, ॐ उमा सहित शिवाय नमः मंत्र से १०८ आहुति दें, और अंत में ब्राह्मण को दान देकर बंधु-बांधवों सहित भोजन करें। शनि प्रदोष विशेष रूप से शनि की अशुभता दूर करने के लिए भी किया जाता है।

पाठ दिवस
त्रयोदशी, जब शनिवार को पड़े
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प्रदोष व्रत, सभी वार
परिचय
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श्री शनि प्रदोष व्रत कथा के बारे में

शनि प्रदोष व्रत कथा एक निर्धन ब्राह्मणी और उसके दो पुत्रों की कथा है, जो चार अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में महर्षि शांडिल्य ब्राह्मणी और उसके दोनों पुत्रों को प्रदोष व्रत की विधि बताते हैं। दूसरे अध्याय में उसका पुत्र शुचिव्रत नदी में धन से भरा कलश पाता है, और साथ रह रहा राजकुमार उसमें हिस्सा लेने से इनकार करता है। तीसरे अध्याय में राजकुमार वन में गंधर्व-कन्या अंशुमती से मिलता है और दोनों में प्रेम हो जाता है। चौथे अध्याय में गंधर्वराज भगवान शिव के आदेश पर राजकुमार को अपनी पुत्री और सेना सौंपते हैं, जिससे राजकुमार अपने शत्रुओं पर विजय पाकर पुनः अपना राज्य प्राप्त करता है।

यह कथा उस त्रयोदशी के लिए बताई जाती है जो शनिवार को पड़े, और साथ ही शनि की अशुभता दूर करने की कामना से भी जुड़ी है। इस पृष्ठ पर चारों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।

शनि प्रदोष व्रत कथा का कोई नामित रचयिता नहीं है। प्रदोष व्रत हर माह की दोनों त्रयोदशी को पड़ता है, और जिस वार को यह पड़े उसी के नाम से जाना जाता है, इसकी विस्तृत चर्चा 'प्रदोष व्रत' के मुख्य परिचय-पृष्ठ पर उपलब्ध है। यहां प्रस्तुत पाठ शनिवार को पड़ने वाली त्रयोदशी, यानी शनि प्रदोष, से जुड़ी सबसे प्रचलित परंपरागत कथा का यथावत रूपांतरण है, जो महर्षि शांडिल्य द्वारा एक निर्धन ब्राह्मणी को इसकी विधि बताए जाने के प्रसंग से आरंभ होती है, और एक प्रकाशित हिंदी व्रत-कथा संग्रह पुस्तिका में छपी इसी कथा पर आधारित है, जिसमें केवल स्पष्ट मुद्रण-त्रुटियां सुधारी गई हैं, कथा में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। चूंकि इस कथा का कोई एकल, प्राचीन मूल पाठ नहीं है, अन्य मुद्रित संस्करणों में पात्रों के नाम व शब्दों का हेरफेर मिल सकता है, कुछ स्रोतों में यही कथा सोम प्रदोष (सोमवार) से भी जोड़ी गई मिलती है।

रचनाकार
अज्ञात
लोक-प्रचलित व्रत कथा

सामान्य प्रश्न

शनि प्रदोष व्रत कब किया जाता है?

जब त्रयोदशी तिथि शनिवार को पड़े, तब उस दिन के प्रदोष व्रत को शनि प्रदोष कहा जाता है।

शनि प्रदोष व्रत कथा में राजकुमार को उसका राज्य कैसे वापस मिलता है?

जैसा कथा के चौथे अध्याय में बताया गया है, भगवान शिव के आदेश पर गंधर्वराज अपनी पुत्री अंशुमती और अपनी सेना राजकुमार को सौंपते हैं, जिनकी सहायता से वह अपने शत्रुओं को पराजित कर अपना राज्य पुनः प्राप्त करता है।

क्या प्रदोष व्रत का उद्यापन आवश्यक है?

जैसा पूजा-विधि में बताया गया है, मनोकामना पूर्ण होने पर विधिपूर्वक शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित कर हवन और ब्राह्मण-भोजन सहित इसका उद्यापन करना चाहिए।

क्या यह प्रदोष व्रत की एकमात्र कथा है?

नहीं, त्रयोदशी सातों वारों में से किसी पर भी पड़ सकती है, और परंपरा में हर वार की अपनी अलग कथा है। शनि प्रदोष की यह कथा उनमें सबसे प्रचलित है, अन्य वारों की कथाएं 'प्रदोष व्रत' के मुख्य पृष्ठ से देखी जा सकती हैं।

संबंधित खोज

पाठ विवरण

रचनाकारअज्ञात
संरचना४ अध्याय
पाठ समय६ मिनट