अध्याय १ · साधु वेश में हनुमान जी की श्रद्धा-परीक्षा
एक समय की बात है, एक नगर में एक वृद्धा रहती थी, उसका एक ही पुत्र था। वृद्धा की हनुमान जी पर गहरी आस्था थी, वह प्रत्येक मंगलवार को नियमपूर्वक व्रत रखकर हनुमान जी की आराधना करती थी। एक बार हनुमान जी ने अपनी उस भक्तिन की श्रद्धा का परीक्षण करने का विचार किया।
हनुमान जी साधु का वेश धारण कर वृद्धा के घर गए, और पुकारने लगे: 'है कोई हनुमान भक्त, जो हमारी इच्छा पूर्ण करे?' आवाज़ उस वृद्धा के कान में पड़ी, पुकार सुनकर वृद्धा जल्दी से बाहर आई, और साधु को प्रणाम कर बोली: 'आज्ञा महाराज।' हनुमान-वेशधारी साधु बोले: 'मैं भूखा हूं, भोजन करूंगा, तुम थोड़ी ज़मीन लीप दो।' वृद्धा दुविधा में पड़ गई, अंततः हाथ जोड़कर बोली: 'महाराज, लीपने और मिट्टी खोदने के अतिरिक्त आप कोई दूसरी आज्ञा दें, मैं अवश्य पूर्ण करूंगी।' साधु ने तीन बार प्रतिज्ञा कराने के पश्चात् कहा: 'तू अपने बेटे को बुला, मैं उसकी पीठ पर आग जलाकर भोजन बनाऊंगा।' यह सुनकर वृद्धा घबरा गई, परंतु वह प्रतिज्ञाबद्ध थी, उसने अपने पुत्र को बुलाकर साधु को सौंप दिया।
अध्याय २ · पुत्र का जीवित होना और हनुमान जी का वास्तविक रूप
वेशधारी साधु हनुमान जी ने वृद्धा के हाथों से ही उसके पुत्र को पेट के बल लिटवाया, और उसकी पीठ पर आग जलवाई। आग जलाकर दुःखी मन से वृद्धा अपने घर में चली गई। इधर भोजन बनाकर साधु ने वृद्धा को बुलाकर कहा: 'हमारा भोजन बन गया है, तुम अपने पुत्र को पुकारो, ताकि वह भी आकर भोग लगा ले।' इस पर वृद्धा बोली: 'उसका नाम लेकर मुझे और कष्ट न दें।' लेकिन जब साधु महाराज नहीं माने, तो वृद्धा ने अपने पुत्र को आवाज़ लगाई। वह अपनी मां के पास आ गया।
अपने पुत्र को जीवित देखकर वृद्धा को बहुत आश्चर्य हुआ, और वह साधु के चरणों में गिर पड़ी। तब हनुमान जी अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए, और वृद्धा को भक्ति का आशीर्वाद दिया। बजरंगबली की जय! हर हर महादेव!
श्री भौम प्रदोष व्रत कथा पाठ विधि
जिस त्रयोदशी को मंगलवार पड़े, उस दिन सांयकाल प्रदोष काल में भगवान शिव का पूजन करें और हनुमान जी की भी आराधना करें, व्रत रखें, और इस कथा का श्रवण अवश्य करें। भौम प्रदोष व्रत सर्व-सुख और राज-सम्मान की कामना से किया जाता है।
श्री भौम प्रदोष व्रत कथा के बारे में
भौम प्रदोष व्रत कथा दो अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में हनुमान जी साधु का वेश धरकर एक वृद्धा भक्तिन के घर आते हैं, और तीन बार प्रतिज्ञा कराकर उसके पुत्र को अग्नि पर लिटाने की कठिन आज्ञा देते हैं। दूसरे अध्याय में साधु के बुलाने पर वृद्धा जब अपने पुत्र को पुकारती है, तो वह जीवित प्रकट होता है, और हनुमान जी अपने वास्तविक रूप में आकर वृद्धा को आशीर्वाद देते हैं।
यह कथा उस त्रयोदशी के लिए विशेष रूप से बताई जाती है जो मंगलवार को पड़े। इस पृष्ठ पर दोनों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
भौम प्रदोष व्रत कथा का कोई नामित रचयिता नहीं है। प्रदोष व्रत हर माह की दोनों त्रयोदशी को पड़ता है, और जिस वार को यह पड़े उसी के नाम से जाना जाता है, इसकी विस्तृत चर्चा 'प्रदोष व्रत' के मुख्य परिचय-पृष्ठ पर उपलब्ध है। यहां प्रस्तुत पाठ मंगलवार को पड़ने वाली त्रयोदशी, यानी भौम या मंगल प्रदोष, से जुड़ी परंपरागत कथा का यथावत रूपांतरण है, जो एक हिंदी भक्ति-पोर्टल पर प्रकाशित पाठ पर आधारित है। इस कथा का भी कोई एकल, प्राचीन मूल पाठ नहीं है, अन्य स्रोतों में शब्दों का हेरफेर मिल सकता है।
सामान्य प्रश्न
भौम प्रदोष व्रत कब किया जाता है?
जब त्रयोदशी तिथि मंगलवार को पड़े, तब उस दिन के प्रदोष व्रत को भौम या मंगल प्रदोष कहा जाता है।
भौम प्रदोष व्रत कथा में हनुमान जी की भूमिका क्यों है?
मंगलवार परंपरागत रूप से हनुमान जी का दिन माना जाता है, इसलिए भौम प्रदोष की कथा में शिव-पूजन के साथ-साथ हनुमान जी की भक्ति-परीक्षा की कथा भी जुड़ी हुई है।
क्या यह प्रदोष व्रत की मुख्य कथा से अलग है?
हां, प्रदोष व्रत सातों वारों पर पड़ सकता है और परंपरा में हर वार की अपनी अलग कथा है। यह पृष्ठ विशेष रूप से भौम प्रदोष की कथा देता है, मुख्य 'प्रदोष व्रत कथा' पृष्ठ पर शनि प्रदोष की कथा दी गई है।
