श्री बुध प्रदोष व्रत कथा
बुध प्रदोष व्रत कथा उस त्रयोदशी की कथा है जो बुधवार को पड़ती है, एक नवविवाहित पति द्वारा बुधवार को अपनी पत्नी की विदाई कराने से आए संकट और भगवान शिव से प्रार्थना कर उसके निवारण की कथा, जिसका पूर्ण पाठ यहां उपलब्ध है।

अध्याय १ · बुधवार को विदाई और मार्ग में विचित्र संकट
बुध प्रदोष व्रत की कथा के अनुसार, एक पुरुष का नया-नया विवाह हुआ। विवाह के दो दिनों बाद उसकी पत्नी मायके चली गई। कुछ दिनों के बाद वह पुरुष पत्नी को लेने उसके यहां गया। बुधवार को जब वह पत्नी के साथ लौटने लगा, तो ससुराल पक्ष ने उसे रोकने का प्रयत्न किया कि विदाई के लिए बुधवार शुभ नहीं होता। लेकिन वह नहीं माना, और पत्नी के साथ बैलगाड़ी में चल पड़ा। विवश होकर सास-ससुर ने अपने जमाई और पुत्री को भारी मन से विदा किया।
नगर के बाहर पहुंचने पर पत्नी को प्यास लगी। पुरुष लोटा लेकर पानी की तलाश में चल पड़ा, पत्नी एक पेड़ के नीचे बैठ गई। थोड़ी देर बाद पुरुष पानी लेकर वापस लौटा, तब उसने देखा कि उसकी पत्नी किसी के साथ हंस-हंसकर बातें कर रही है, और उसके लोटे से पानी पी रही है। उसे क्रोध आ गया। वह निकट पहुंचा तो उसके आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा, क्योंकि उस आदमी की सूरत उसी की भांति थी। पत्नी भी सोच में पड़ गई। दोनों पुरुष झगड़ने लगे।
अध्याय २ · शिव-प्रार्थना से संकट का निवारण
धीरे-धीरे वहां काफ़ी भीड़ एकत्रित हो गई और सिपाही भी आ गए। हमशक्ल आदमियों को देखकर वे भी आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने स्त्री से पूछा: 'उसका पति कौन है?' वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई। तब वह पुरुष शंकर भगवान से प्रार्थना करने लगा: 'हे भगवान, हमारी रक्षा करें, मुझसे बड़ी भूल हुई कि मैंने सास-ससुर की बात नहीं मानी और बुधवार को पत्नी को विदा करा लिया, मैं भविष्य में ऐसा कदापि नहीं करूंगा।'
जैसे ही उसकी प्रार्थना पूरी हुई, दूसरा पुरुष अंतर्ध्यान हो गया। पति-पत्नी सकुशल अपने घर पहुंच गए। उस दिन के बाद से पति-पत्नी नियमपूर्वक बुध त्रयोदशी प्रदोष का व्रत रखने लगे। अतः बुध त्रयोदशी व्रत हर मनुष्य को करना चाहिए।
श्री बुध प्रदोष व्रत कथा पाठ विधि
जिस त्रयोदशी को बुधवार पड़े, उस दिन इस व्रत में हरी वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए, तथा धूप, बेलपत्र आदि से भगवान शिव की आराधना करनी चाहिए। बुध प्रदोष व्रत करने से सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं।
श्री बुध प्रदोष व्रत कथा के बारे में
बुध प्रदोष व्रत कथा दो अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में एक नवविवाहित पुरुष अपनी सास-ससुर की चेतावनी न मानकर बुधवार को पत्नी की विदाई कराता है, और मार्ग में एक विचित्र संकट में फंस जाता है, जहां उसे अपने ही समान दिखने वाला एक और पुरुष मिलता है। दूसरे अध्याय में भीड़ और सिपाहियों के बीच असमंजस की स्थिति में वह भगवान शिव से क्षमा-प्रार्थना करता है, जिससे वह दूसरा पुरुष अंतर्ध्यान हो जाता है, और पति-पत्नी सकुशल घर पहुंचते हैं।
यह कथा उस त्रयोदशी के लिए विशेष रूप से बताई जाती है जो बुधवार को पड़े। इस पृष्ठ पर दोनों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
बुध प्रदोष व्रत कथा का कोई नामित रचयिता नहीं है। प्रदोष व्रत हर माह की दोनों त्रयोदशी को पड़ता है, और जिस वार को यह पड़े उसी के नाम से जाना जाता है, इसकी विस्तृत चर्चा 'प्रदोष व्रत' के मुख्य परिचय-पृष्ठ पर उपलब्ध है। यहां प्रस्तुत पाठ बुधवार को पड़ने वाली त्रयोदशी, यानी बुध प्रदोष, से जुड़ी परंपरागत कथा का यथावत रूपांतरण है, जो एक हिंदी भक्ति-पोर्टल पर प्रकाशित पाठ पर आधारित है। बुधवार को अनुचित विदाई से आए संकट की यह मूल कथा-रूपरेखा कुछ अन्य बुधवार-संबंधी व्रत-कथाओं में भी मिलती है, जहां देवता के रूप में बुधदेव का उल्लेख होता है, इस पाठ में स्रोत के अनुसार भगवान शिव का ही उल्लेख रखा गया है। इस कथा का भी कोई एकल, प्राचीन मूल पाठ नहीं है, अन्य स्रोतों में शब्दों का हेरफेर मिल सकता है।
सामान्य प्रश्न
बुध प्रदोष व्रत कब किया जाता है?
जब त्रयोदशी तिथि बुधवार को पड़े, तब उस दिन के प्रदोष व्रत को बुध प्रदोष कहा जाता है।
बुध प्रदोष व्रत में किस रंग की वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए?
जैसा पूजा-विधि में बताया गया है, इस व्रत में हरी वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए।
क्या यह प्रदोष व्रत की मुख्य कथा से अलग है?
हां, प्रदोष व्रत सातों वारों पर पड़ सकता है और परंपरा में हर वार की अपनी अलग कथा है। यह पृष्ठ विशेष रूप से बुध प्रदोष की कथा देता है, मुख्य 'प्रदोष व्रत कथा' पृष्ठ पर शनि प्रदोष की कथा दी गई है।