श्री परिवर्तिनी (पद्मा) एकादशी व्रत कथा
परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी की कथा है, जिसे पद्म पुराण में पद्मा एकादशी कहा गया है। इसमें ब्रह्मा जी नारद जी को बताते हैं कि धर्मात्मा राजा मांधाता के राज्य में तीन वर्ष वर्षा न होने पर अंगिरा ऋषि ने उन्हें यह व्रत बताया, और प्रजा सहित व्रत करने पर खूब वर्षा हुई।

अध्याय १ · राजा मांधाता के राज्य में अकाल
युधिष्ठिर ने कहा: 'केशव, भाद्रपद के शुक्ल पक्ष में किस नाम की एकादशी होती है? उसके देवता कौन हैं और विधि क्या है, यह बताइए।' श्रीकृष्ण बोले: 'महीपाल, मैं तुम्हें वह आश्चर्यजनक कथा सुनाता हूं, जो ब्रह्मा जी ने महात्मा नारद को सुनाई थी।' नारद बोले: 'चतुर्मुख, आपको नमस्कार है, कृपा करके बताइए कि भाद्रपद के शुक्ल पक्ष में किस नाम की एकादशी होती है। विष्णु की आराधना के लिए मैं यह सुनना चाहता हूं।' ब्रह्मा बोले: 'मुनिश्रेष्ठ, तुम वैष्णव हो, तुमने अच्छा पूछा। संसार में हरि के दिन से बढ़कर पवित्र कुछ नहीं। भाद्रपद की शुक्ल एकादशी पद्मा नाम से प्रसिद्ध है। उस दिन भगवान हृषीकेश की पूजा होती है और यह उत्तम व्रत करना चाहिए। मैं तुम्हें एक शुभ पौराणिक कथा सुनाता हूं, जिसके सुनने मात्र से बड़ा पाप नष्ट हो जाता है।'
'सूर्यवंश में जन्मे मांधाता नाम के राजर्षि थे, जो चक्रवर्ती, सत्य-प्रतिज्ञ और प्रतापी थे। वे प्रजा का अपने पुत्रों की तरह धर्म से पालन करते थे। उनके राज्य में न अकाल था, न मानसिक कष्ट, न रोग। उनकी प्रजा निर्भय और धन-धान्य से समृद्ध थी, और राजा के खज़ाने में न्याय से कमाया धन ही था। सब वर्ण और आश्रम अपने-अपने धर्म में लगे थे, और उनके राज्य की भूमि कामधेनु के समान थी। इस तरह राज्य करते उनके बहुत वर्ष बीत गए। फिर एक बार किसी कर्म का फल आने पर उनके राज्य में तीन वर्ष तक बादल नहीं बरसे। इससे उनकी प्रजा टूट गई और भूख से पीड़ित हो गई। दैव से पीड़ित उस देश में स्वाहा, स्वधा, वषट्कार और वेदों का पाठ बंद हो गया। तब प्रजा राजा के पास आकर बोली।'
प्रजा बोली: 'नृपशार्दूल, आपको प्रजा की बात सुननी चाहिए। पुराणों में मनीषियों ने जल को नारा कहा है। वही भगवान का अयन, यानी निवास है, इसलिए वे नारायण कहलाते हैं। सर्वव्यापी भगवान विष्णु ही मेघ के रूप में स्थित हैं। वही वर्षा करते हैं, वर्षा से अन्न होता है और अन्न से प्रजा। नृपश्रेष्ठ, उसके अभाव में प्रजा नष्ट हो रही है। नृपश्रेष्ठ, ऐसा कीजिए जिससे हमारा योगक्षेम चले।' राजा बोले: 'आपने सच कहा है, कुछ भी झूठ नहीं कहा। अन्न को ब्रह्म कहा गया है, अन्न में ही सब कुछ टिका है। अन्न से प्राणी उत्पन्न होते हैं और अन्न से ही जगत चलता है। लोक में और पुराणों में विस्तार से यह सुना जाता है कि राजाओं के अपराध से प्रजा को पीड़ा होती है। पर बुद्धि से विचार करने पर भी मुझे अपना किया कोई अपराध नहीं दिखता। फिर भी प्रजा के हित की इच्छा से मैं पूरा प्रयत्न करूंगा।' ऐसा निश्चय करके राजा थोड़े-से साथियों के साथ चल पड़े।
अध्याय २ · अंगिरा ऋषि का उपदेश
'विधाता को प्रणाम करके वे घने वन में गए और तपस्वियों से बसे श्रेष्ठ मुनियों के आश्रमों में घूमते रहे। फिर राजा ने ब्रह्मा के पुत्र अंगिरा ऋषि को देखा, जो अपने तेज से दिशाओं को प्रकाशित कर रहे थे, मानो दूसरे ब्रह्मा हों। उन्हें देखकर संयमी राजा प्रसन्न होकर अपने वाहन से उतरे और हाथ जोड़कर उनके चरणों में प्रणाम किया। मुनि ने स्वस्तिवाचन करके राजा का अभिनंदन किया और उनके राज्य के सातों अंगों का कुशल पूछा। राजा ने अपना कुशल बताकर मुनि का कुशल पूछा। मुनि ने उन्हें आसन और अर्घ्य दिया, और पास बैठे राजा से आने का कारण पूछा। राजा बोले: भगवन, मैं धर्म की विधि से पृथ्वी का पालन कर रहा था, फिर भी अनावृष्टि हो गई और मैं इसका कारण नहीं जानता। यह संशय मिटाने के लिए मैं आपके पास आया हूं। योगक्षेम का उपाय करके प्रजा को सुख दीजिए।'
'ऋषि बोले: राजन, यह सत्ययुग है, जो युगों में उत्तम माना गया है। इसमें लोग ब्रह्म में लगे रहते हैं और धर्म अपने चारों चरणों पर खड़ा रहता है। इस युग में ब्राह्मण ही तप करते हैं, दूसरे लोग नहीं। राजेंद्र, तुम्हारे राज्य में यह एक शूद्र तप कर रहा है, इसी कारण बादल नहीं बरसते। उसके वध का यत्न करो, जिससे यह दोष शांत हो। राजा बोले: मैं तप करते हुए इस निरपराध को नहीं मारूंगा। उपद्रव का नाश करने वाला कोई धर्म का उपाय बताइए।'
अध्याय ३ · पद्मा एकादशी व्रत और वर्षा
'ऋषि बोले: यदि ऐसा है, तो नृपते, एकादशी का व्रत करो। भाद्रपद के शुक्ल पक्ष में पद्मा नाम से प्रसिद्ध एकादशी है। उसके व्रत के प्रभाव से निश्चय ही अच्छी वर्षा होगी। यह सब सिद्धियां देने वाली और सब उपद्रवों का नाश करने वाली है। नृप, प्रजा और परिजनों सहित इसका व्रत करो। ऋषि की यह बात सुनकर राजा अपने घर लौट आए, और भाद्रपद के शुक्ल पक्ष में चारों वर्णों की सारी प्रजा के साथ पद्मा का व्रत किया। राजन, ऐसा व्रत करने पर बादल बरसने लगे, धरती जल से भर गई और फसलों से लहलहा उठी। ऋषिश्रेष्ठ के प्रभाव से लोगों को सुख मिला। इसलिए यह उत्तम व्रत करना चाहिए।'
'इस दिन दही-भात सहित, वस्त्र में लिपटा जल से भरा घड़ा, छाता और जूते ब्राह्मण को दान करे, और यह मंत्र कहे: बुधश्रवण नाम वाले गोविंद, आपको बार-बार नमस्कार है। पापों के समूह का नाश करके सब सुख दीजिए। आप भोग और मोक्ष देने वाले और लोगों को सुख देने वाले हैं। राजन, इसे पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है।'
श्री परिवर्तिनी (पद्मा) एकादशी व्रत कथा पाठ विधि
भाद्रपद शुक्ल एकादशी को प्रातः स्नान कर उपवास का संकल्प लें और भगवान हृषीकेश (विष्णु) की पूजा करें। कथा में राजा मांधाता ने सारी प्रजा के साथ यह व्रत किया था। इसी दिन ब्राह्मण को वस्त्र में लिपटा जल से भरा घड़ा, दही-भात, छाता और जूते दान करें, 'नमो नमस्ते गोविंद' मंत्र कहें, और अगले दिन द्वादशी को पारण-मुहूर्त में व्रत खोलें।
श्री परिवर्तिनी (पद्मा) एकादशी व्रत कथा के बारे में
परिवर्तिनी (पद्मा) एकादशी व्रत कथा तीन अध्यायों में है। पहले अध्याय में धर्मात्मा राजा मांधाता के राज्य में तीन वर्ष वर्षा नहीं होती, और भूखी प्रजा राजा से उपाय मांगती है। दूसरे में वन में अंगिरा ऋषि अनावृष्टि का कारण बताते हैं, और राजा एक निरपराध तपस्वी को मारने से इनकार करके धर्म का उपाय पूछते हैं। तीसरे में ऋषि पद्मा एकादशी का व्रत बताते हैं, प्रजा सहित व्रत करने पर वर्षा होती है, और फिर दान का मंत्र है।
यह व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को रखा जाता है, जिसे परिवर्तिनी, पार्श्व, पद्मा, जलझूलनी या वामन एकादशी भी कहते हैं। परंपरा में माना जाता है कि इस दिन शयन में भगवान विष्णु करवट बदलते हैं। पद्म पुराण के इस अध्याय में यह प्रसंग नहीं है; इसमें इस एकादशी को पद्मा नाम दिया गया है।
परिवर्तिनी (पद्मा) एकादशी व्रत कथा का कोई नामित रचयिता नहीं है। यह पद्म पुराण के उत्तर खंड का सत्तावनवां अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को वह कथा सुनाते हैं जो ब्रह्मा जी ने नारद जी को बताई थी। यहां दिया गया पाठ उस अध्याय के 41 संस्कृत श्लोकों का श्लोक-क्रम से किया गया हिंदी अनुवाद है।
परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा के लाभ
कथा के अनुसार पद्मा एकादशी सब सिद्धियां देती है और सब उपद्रवों का नाश करती है; इसी व्रत से राजा मांधाता के राज्य में तीन वर्ष का अकाल समाप्त हुआ और खूब वर्षा हुई; और इसे पढ़ने-सुनने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है।
सामान्य प्रश्न
परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा में कितने अध्याय हैं?
इसमें तीन अध्याय हैं, जो पद्म पुराण के उत्तर खंड के सत्तावनवें अध्याय के 41 श्लोकों पर आधारित हैं।
परिवर्तिनी और पद्मा एकादशी में क्या अंतर है?
कोई अंतर नहीं है। भाद्रपद शुक्ल एकादशी को पद्म पुराण में पद्मा कहा गया है, और परंपरा में इसे परिवर्तिनी, पार्श्व, जलझूलनी या वामन एकादशी भी कहते हैं।
कथा में राजा मांधाता ने ऋषि का बताया वध क्यों नहीं किया?
अंगिरा ऋषि ने अकाल का कारण एक शूद्र का तप बताकर उसके वध का यत्न करने को कहा, पर राजा ने कहा कि वे तप करते हुए किसी निरपराध को नहीं मारेंगे, और इसके बदले धर्म का कोई उपाय पूछा। तब ऋषि ने उन्हें पद्मा एकादशी का व्रत बताया, और व्रत से ही वर्षा हुई।
पद्मा एकादशी पर क्या दान करें?
कथा के अनुसार ब्राह्मण को वस्त्र में लिपटा जल से भरा घड़ा, दही-भात, छाता और जूते दान करने चाहिए, और 'नमो नमस्ते गोविंद' मंत्र से पापों के नाश और सुख की प्रार्थना करनी चाहिए।