श्री पापांकुशा एकादशी व्रत कथा
पापांकुशा एकादशी व्रत कथा आश्विन शुक्ल पक्ष की पापांकुशा एकादशी का माहात्म्य है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को बताते हैं कि इस दिन पद्मनाभ रूप में उनकी पूजा और उपवास से पाप नष्ट होते हैं और मनुष्य यम-यातना से बच जाता है।

अध्याय १ · पद्मनाभ पूजन और व्रत की महिमा
युधिष्ठिर ने कहा: 'मधुसूदन, कृपा करके मुझे बताइए कि आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में कौन-सी एकादशी होती है।' श्रीकृष्ण बोले: 'राजेंद्र, सुनो, मैं तुम्हें इसका पापनाशक माहात्म्य बताता हूं। आश्विन के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी होती है, वह पापांकुशा नाम से प्रसिद्ध है और सब पापों को हरने वाली श्रेष्ठ तिथि है। उस दिन मनुष्य को पद्मनाभ नाम से मेरी पूजा करनी चाहिए।'
यह व्रत सब मनचाहे फल देने वाला और मनुष्यों को स्वर्ग व मोक्ष देने वाला है। इंद्रियों को वश में रखने वाला मुनि बहुत समय तक कठोर तप करके जो फल पाता है, वह इस दिन गरुड़ध्वज भगवान को प्रणाम करने से मिल जाता है। मोह में पड़कर बहुत पाप करने वाला मनुष्य भी सब पापों को हरने वाले हरि को प्रणाम करके नरक में नहीं जाता। पृथ्वी पर जितने तीर्थ और पवित्र देवालय हैं, उन सबका फल विष्णु के नाम-कीर्तन से मिल जाता है। जो शार्ङ्ग धनुष धारण करने वाले भगवान जनार्दन की शरण में जाते हैं, उन्हें यमलोक की यातना कभी नहीं होती। प्रसंगवश भी एक एकादशी का उपवास कर लेने वाला मनुष्य भयंकर पाप करके भी यम की यातना नहीं भोगता।
जो वैष्णव होकर भगवान शिव की निंदा करता है, वह वैष्णव लोक नहीं पाता और निश्चय ही नरक में जाता है। और जो शैव या पाशुपत होकर भगवान विष्णु की निंदा करता है, वह चौदह इंद्रों के काल तक घोर रौरव नरक में पकाया जाता है। पद्मनाभ का यह पापनाशक व्रत जितना पवित्र है, तीनों लोकों में उतना पवित्र कुछ भी नहीं। राजन, जब तक मनुष्य पद्मनाभ के इस शुभ दिन का उपवास नहीं करता, तभी तक पाप इस शरीर में टिके रहते हैं।
हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ भी एकादशी के उपवास के सोलहवें भाग के बराबर नहीं हैं। संसार में एकादशी के समान कोई व्रत नहीं है; जिन्होंने किसी बहाने से भी इसे कर लिया, वे यमराज के पास नहीं जाते। यह एकादशी स्वर्ग और मोक्ष देने वाली, शरीर को निरोग रखने वाली, पत्नी, पुत्र, धन और मित्र देने वाली है। राजन, गंगा, गया, काशी, पुष्कर और कुरुक्षेत्र भी हरि के इस दिन जितने पुण्यदायी नहीं हैं। भूपाल, हरि के दिन उपवास करके रात में जागरण करने से अनायास ही विष्णु का पद प्राप्त हो जाता है।
अध्याय २ · पीढ़ियों का उद्धार, दान और पुण्य का फल
राजेंद्र, इस व्रत को करने वाला मनुष्य माता के पक्ष की दस, पिता के पक्ष की दस और पत्नी के पक्ष की दस पीढ़ियों का उद्धार कर देता है। वे सब चतुर्भुज, दिव्य रूप वाले, गरुड़ की ध्वजा से युक्त, माला पहने और पीले वस्त्र धारण किए हरि के धाम को जाते हैं। नृपश्रेष्ठ, बचपन, जवानी या बुढ़ापे में, किसी भी आयु में एकादशी का उपवास करने वाला निश्चय ही दुर्गति को नहीं पाता। आश्विन के शुक्ल पक्ष में पापांकुशा का उपवास करके मनुष्य सब पापों से मुक्त होकर हरि के लोक को जाता है।
जो इस दिन सोना, तिल, भूमि, गौ, अन्न, जल, जूते, छाता और वस्त्र आदि का दान करता है, वह यमराज को नहीं देखता। जिसके दिन पुण्य के बिना आते और चले जाते हैं, वह लोहार की धौंकनी की तरह सांस लेते हुए भी जीवित नहीं है। नृपश्रेष्ठ, निर्धन मनुष्य को भी यथाशक्ति स्नान, दान आदि कर्म करते हुए अपने हर दिन को सफल बनाना चाहिए।
होम, स्नान, जप, ध्यान और यज्ञ जैसे पुण्य कर्म करने वाले यम की उस घोर यातना को कभी नहीं देखते। संसार में जो मनुष्य दीर्घायु, धनवान, कुलीन और निरोग दिखाई देते हैं, वे ऐसे ही पुण्य करने वाले होते हैं। अधिक कहने से क्या लाभ: अधर्म से मनुष्य दुर्गति में जाते हैं और धर्म से स्वर्ग पर चढ़ते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। निष्पाप राजन, तुमने जो पूछा था, वह पापांकुशा का माहात्म्य मैंने तुम्हें बता दिया। अब और क्या सुनना चाहते हो?
श्री पापांकुशा एकादशी व्रत कथा पाठ विधि
पापांकुशा एकादशी को प्रातः स्नान कर उपवास का संकल्प लें और भगवान विष्णु की पद्मनाभ रूप में पूजा करें, उनके नाम का कीर्तन करें। रात में जागरण करें, यथाशक्ति सोना, तिल, अन्न, जल, जूते, छाता या वस्त्र का दान करें, और अगले दिन द्वादशी को पारण-मुहूर्त में व्रत खोलें।
श्री पापांकुशा एकादशी व्रत कथा के बारे में
पापांकुशा एकादशी व्रत कथा दो अध्यायों में है। पहले अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि इस दिन पद्मनाभ रूप में उनकी पूजा, प्रणाम और नाम-कीर्तन से तपस्या और सब तीर्थों का फल मिलता है, और यह व्रत अश्वमेध व राजसूय यज्ञों से भी बढ़कर है। दूसरे अध्याय में मातृ, पितृ और पत्नी पक्ष की दस-दस पीढ़ियों के उद्धार, इस दिन के दान और पुण्य कर्मों के फल का वर्णन है।
'पापांकुशा' का अर्थ है पापों पर अंकुश। यह व्रत आश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी को, दशहरे के दो दिन बाद रखा जाता है।
पापांकुशा एकादशी व्रत कथा का कोई नामित रचयिता नहीं है। यह पद्म पुराण के उत्तर खंड का उनसठवां अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को इस व्रत का माहात्म्य बताते हैं। इसमें किसी पात्र की कहानी नहीं है, पूरा अध्याय व्रत की महिमा का वर्णन है। यहां दिया गया पाठ उसके 28 संस्कृत श्लोकों का श्लोक-क्रम से किया गया हिंदी अनुवाद है।
पापांकुशा एकादशी व्रत कथा के लाभ
कथा में स्वयं कहा गया है कि यह एकादशी स्वर्ग और मोक्ष देने वाली, शरीर को निरोग रखने वाली तथा पत्नी, पुत्र, धन और मित्र देने वाली है, और इसका व्रत करने वाला तीन पक्षों की दस-दस पीढ़ियों का उद्धार कर हरि के धाम को जाता है।
सामान्य प्रश्न
पापांकुशा एकादशी व्रत कथा में कौन-सी कहानी है?
पद्म पुराण के इस अध्याय में किसी पात्र की कहानी नहीं है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण स्वयं युधिष्ठिर को व्रत का माहात्म्य बताते हैं। विंध्य पर्वत के एक बहेलिये और महर्षि अंगिरा की जो कथा कई जगह सुनाई जाती है, वह इस पुराण-प्रसंग में नहीं आती।
पापांकुशा एकादशी पर किस रूप में भगवान की पूजा होती है?
कथा के आरंभ में ही श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस दिन पद्मनाभ नाम से उनकी पूजा करनी चाहिए, अर्थात वे विष्णु जिनकी नाभि से कमल निकला है।
पापांकुशा एकादशी पर क्या दान करें?
कथा के अनुसार इस दिन सोना, तिल, भूमि, गौ, अन्न, जल, जूते, छाता और वस्त्र का दान करने वाला यमराज को नहीं देखता। निर्धन व्यक्ति भी यथाशक्ति स्नान और दान करे।
पापांकुशा एकादशी व्रत कथा में कितने अध्याय हैं?
इसमें दो अध्याय हैं, जो पद्म पुराण के उत्तर खंड के उनसठवें अध्याय के 28 श्लोकों पर आधारित हैं।