यह एकादशी दशहरा (विजयादशमी) के दो दिन पश्चात व शरद पूर्णिमा से कुछ दिन पूर्व आती है। सटीक तिथि हेतु नज़दीकी पंचांग देखें।
पापांकुशा एकादशी का महत्व
कथा के अनुसार, विंध्याचल पर्वत के निकट क्रूर नामक एक शिकारी रहता था, जो जीवनभर निर्दोष पशु-पक्षियों की हत्या करता रहा तथा कभी कोई पुण्य-कर्म नहीं किया। एक बार वन में भ्रमण करते हुए उसकी भेंट महर्षि अंगिरा से हुई।
अपने पापपूर्ण जीवन से भयभीत क्रूर ने महर्षि अंगिरा से मुक्ति का उपाय पूछा, तो उन्होंने उसे आश्विन शुक्ल एकादशी अर्थात पापांकुशा एकादशी का व्रत विधिपूर्वक रखने की सलाह दी, तथा बताया कि यह व्रत पापों को वैसे ही वश में कर लेता है जैसे अंकुश मदमस्त हाथी को वश में करता है।
शिकारी क्रूर ने श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन किया, जिसके पुण्य-प्रभाव से उसके जीवनभर के समस्त पाप नष्ट हो गए, तथा अंत में उसे भगवान विष्णु के धाम की प्राप्ति हुई। इसी कारण पापांकुशा एकादशी को समस्त पापों के नाश हेतु अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है।
पापांकुशा एकादशी कैसे मनाई जाती है
भक्तगण इस दिन प्रातःकाल स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं, तथा दिनभर फलाहार व्रत रखते हैं। भगवान पद्मनाभ अर्थात भगवान विष्णु का पूजन कर पापांकुशा एकादशी की कथा का श्रवण किया जाता है।
रात्रि में जागरण कर भजन-कीर्तन किया जाता है, तथा अगले दिन द्वादशी को शास्त्रोक्त पारण-मुहूर्त में दान-पुण्य कर व्रत का पारण किया जाता है।
यह व्रत विशेष रूप से उन भक्तों द्वारा रखा जाता है जो अपने जीवन के संचित पापों से मुक्ति चाहते हैं, तथा शिकारी क्रूर की कथा इस बात का प्रतीक मानी जाती है कि श्रद्धापूर्वक किया गया एक भी व्रत जीवनभर के पापों को नष्ट कर सकता है।
पापांकुशा एकादशी पूजा विधि
प्रातःकाल स्नान कर व्रत का संकल्प लें तथा फलाहार व्रत रखें। भगवान पद्मनाभ का पूजन कर पापांकुशा एकादशी की कथा सुनें। अगले दिन द्वादशी को शास्त्रोक्त पारण-मुहूर्त में दान देकर व्रत का पारण करें।
पापांकुशा एकादशी के बारे में
पापांकुशा एकादशी आश्विन मास की शुक्ल एकादशी को समस्त पापों के नाश की कामना से रखा जाने वाला व्रत है। इस पृष्ठ पर इस व्रत का महत्व, शिकारी क्रूर की कथा, तथा व्रत-विधि की जानकारी दी गई है।
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सामान्य प्रश्न
पापांकुशा एकादशी कब मनाई जाती है?
यह व्रत प्रत्येक वर्ष आश्विन मास की शुक्ल एकादशी तिथि को, दशहरा के दो दिन पश्चात मनाया जाता है।
पापांकुशा एकादशी का नाम कैसे पड़ा?
'पाप' अर्थात पाप तथा 'अंकुशा' अर्थात हाथी को वश में करने वाला अंकुश, इस व्रत को पापों रूपी मदमस्त हाथी को वश में करने वाला माना जाता है, इसीलिए इसका नाम पापांकुशा एकादशी पड़ा।
शिकारी क्रूर की कथा क्या है?
जीवनभर पशु-पक्षियों की हत्या करने वाले शिकारी क्रूर ने महर्षि अंगिरा के परामर्श पर पापांकुशा एकादशी का व्रत रखा, जिसके पुण्य से उसके समस्त पाप नष्ट होकर उसे विष्णु धाम की प्राप्ति हुई।
भगवान पद्मनाभ कौन हैं?
भगवान पद्मनाभ भगवान विष्णु का ही एक स्वरूप हैं, जिनकी नाभि से कमल प्रकट हुआ था तथा उसी कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई थी, पापांकुशा एकादशी विशेष रूप से इसी स्वरूप को समर्पित है।
