2026 में एकादशी तिथि 21 अक्टूबर दोपहर 2:11 से 22 अक्टूबर दोपहर 2:47 तक है। सूर्योदय के समय एकादशी 22 को है, इसलिए व्रत गुरुवार, 22 अक्टूबर को है। पारण शुक्रवार, 23 अक्टूबर को प्रातः 6:27 से 8:42 के बीच करें; द्वादशी दोपहर 2:35 पर समाप्त होती है (नई दिल्ली)।
पापांकुशा एकादशी का महत्व
पापांकुशा का अर्थ है पापों पर अंकुश। अंकुश वह नुकीला कांटा है जिससे महावत मदमस्त हाथी को वश में करता है, और मान्यता है कि यह व्रत मन और कर्म के पापों को उसी तरह वश में करता है। इस एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा पद्मनाभ रूप में होती है: वे विष्णु जो शेषनाग पर योगनिद्रा में हैं और जिनकी नाभि से निकले कमल पर ब्रह्मा जी विराजते हैं।
पद्म पुराण में भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि इस दिन मनोरथ पूरे करने के लिए उनके पद्मनाभ रूप की पूजा करनी चाहिए। जितेंद्रिय मुनि लंबी कठोर तपस्या से जो फल पाते हैं, वह इस दिन गरुड़ध्वज भगवान को प्रणाम करने भर से मिल जाता है, और पृथ्वी के सब तीर्थों व देवालयों के सेवन का फल भगवान के नाम-कीर्तन से मिल जाता है।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस एकादशी का व्रत करने वाला मातृ पक्ष, पितृ पक्ष और पत्नी के पक्ष की दस-दस पीढ़ियों का उद्धार कर देता है। जो इस दिन सोना, तिल, भूमि, गौ, अन्न, जल, जूते, छाते और वस्त्र का दान करता है, वह यमराज को नहीं देखता, और निर्धन व्यक्ति को भी यथाशक्ति स्नान-दान करके दिन को सफल बनाना चाहिए।
इसी प्रसंग में पुराण यह भी कहता है कि जो विष्णुभक्त होकर भगवान शिव की निंदा करता है, या शैव होकर भगवान विष्णु की, वह नरक में गिरता है। कई जगह विंध्य पर्वत के एक बहेलिये की कथा भी सुनाई जाती है, जिसने महर्षि अंगिरा के कहने पर यह व्रत रखा था; पद्म पुराण के इस प्रसंग में वह कथा नहीं आती, यहां व्रत का माहात्म्य स्वयं श्रीकृष्ण बताते हैं।
पापांकुशा एकादशी कैसे मनाई जाती है
व्रत की तैयारी दशमी की संध्या से होती है: उस दिन सूर्यास्त से पहले सात्विक भोजन लिया जाता है, और एकादशी पर अन्न, विशेषकर चावल, नहीं खाया जाता। तुलसी दल एक दिन पहले ही तोड़कर रख लिए जाते हैं, क्योंकि एकादशी पर तुलसी तोड़ना वर्जित माना जाता है।
भक्तगण इस दिन प्रातःकाल स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं, तथा अपनी सामर्थ्य अनुसार निर्जला, केवल जल या फलाहार व्रत रखते हैं। भगवान पद्मनाभ अर्थात भगवान विष्णु का पीले पुष्प, तुलसी दल और दीप से पूजन कर पापांकुशा एकादशी का माहात्म्य सुना जाता है, और विष्णु सहस्रनाम या 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप होता है।
रात्रि में जागरण कर भजन-कीर्तन किया जाता है, तथा अगले दिन द्वादशी को दान-पुण्य कर व्रत का पारण किया जाता है। पारण द्वादशी के पहले चौथाई भाग, हरिवासर, में नहीं किया जाता, मध्याह्न में भी इससे बचने की सलाह है, और द्वादशी समाप्त होने से पहले पारण अवश्य कर लेना चाहिए, इसलिए प्रातःकाल का समय सबसे उत्तम है।
यह व्रत विशेष रूप से उन भक्तों द्वारा रखा जाता है जो अपने जीवन के संचित पापों से मुक्ति चाहते हैं। पद्म पुराण के अनुसार इस दिन उपवास और रात्रि जागरण से अनायास ही विष्णुधाम की प्राप्ति होती है, और व्रती दिव्य चतुर्भुज रूप में, पीतांबर धारण कर, भगवान के धाम को जाता है।
पापांकुशा एकादशी पूजा विधि
दशमी की संध्या सात्विक भोजन लें और तुलसी दल तोड़कर रख लें। एकादशी को प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें, भगवान पद्मनाभ का पीले पुष्प, तुलसी और दीप से पूजन करें, कथा सुनें और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। अगले दिन द्वादशी में, प्रातःकाल के पारण मुहूर्त में, भगवान को तुलसी सहित भोग लगाकर और दान देकर व्रत का पारण करें।
पापांकुशा एकादशी के बारे में
पापांकुशा एकादशी आश्विन मास की शुक्ल एकादशी को समस्त पापों के नाश की कामना से रखा जाने वाला व्रत है। इस पृष्ठ पर पद्म पुराण के अनुसार इस व्रत का माहात्म्य, इस दिन के दान, तथा व्रत-विधि की जानकारी दी गई है।
सामान्य प्रश्न
पापांकुशा एकादशी 2026 कब है?
पापांकुशा एकादशी 2026 गुरुवार, 22 अक्टूबर को है। पारण शुक्रवार, 23 अक्टूबर को प्रातः 6:27 से 8:42 के बीच है (नई दिल्ली)।
एकादशी तिथि 21 को लग रही है, तो व्रत 22 को क्यों?
एकादशी का व्रत उस दिन रखा जाता है जिस दिन सूर्योदय के समय एकादशी तिथि हो। 21 अक्टूबर के सूर्योदय पर दशमी है और 22 अक्टूबर के सूर्योदय पर एकादशी, इसलिए व्रत 22 को है।
पापांकुशा एकादशी कब मनाई जाती है?
यह व्रत प्रत्येक वर्ष आश्विन मास की शुक्ल एकादशी तिथि को, दशहरा के दो दिन पश्चात मनाया जाता है।
पापांकुशा एकादशी का नाम कैसे पड़ा?
'पाप' अर्थात पाप तथा 'अंकुशा' अर्थात हाथी को वश में करने वाला अंकुश, इस व्रत को पापों रूपी मदमस्त हाथी को वश में करने वाला माना जाता है, इसीलिए इसका नाम पापांकुशा एकादशी पड़ा।
पापांकुशा एकादशी पर क्या दान करें?
पद्म पुराण में इस दिन सोना, तिल, भूमि, गौ, अन्न, जल, जूते, छाते और वस्त्र के दान का उल्लेख है, और कहा गया है कि ऐसा दान करने वाला यमराज को नहीं देखता। जो अधिक न दे सके, वह यथाशक्ति स्नान और दान करे।
भगवान पद्मनाभ कौन हैं?
भगवान पद्मनाभ भगवान विष्णु का ही एक स्वरूप हैं, जिनकी नाभि से कमल प्रकट हुआ था तथा उसी कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई थी, पापांकुशा एकादशी विशेष रूप से इसी स्वरूप को समर्पित है।
