मुख्यत्योहारशनि जयंती
न्याय के देवता का जन्मोत्सव · ज्येष्ठ अमावस्या

शनि जयंती

शनि जयंती भगवान शनिदेव के जन्मोत्सव का पर्व है, जो उत्तर भारतीय पंचांग परंपरा में ज्येष्ठ मास की अमावस्या को मनाया जाता है।

शनि जयंती
अगली तिथि
४ जून २०२७

शनि जयंती उसी तिथि को पड़ती है जिस दिन उत्तर भारत में वट सावित्री व्रत भी किया जाता है, क्योंकि दोनों ही ज्येष्ठ अमावस्या से जुड़े हैं। सटीक तिथि हेतु नज़दीकी पंचांग देखें।

शनि जयंती का महत्व

कथा के अनुसार, भगवान सूर्य की पत्नी संज्ञा उनके तीव्र तेज को सहन न कर सकीं, इसलिए उन्होंने अपनी छाया 'छाया' को सूर्यदेव की सेवा में नियुक्त कर स्वयं तपस्या हेतु चली गईं। छाया के गर्भ से जन्मे पुत्र शनि का वर्ण गर्भावस्था के दौरान माता की कठोर तपस्या व सूर्य के तेज को निरंतर सहने के कारण श्याम हो गया।

शनि चालीसा
चालीसा · शनि जयंती पूजन में पाठ

पुत्र के श्याम वर्ण को देखकर भगवान सूर्य को छाया की निष्ठा पर संदेह हुआ, और उन्होंने क्रोधित दृष्टि से शिशु शनि की ओर देखा। मान्यता है कि पिता की इसी तिरस्कारपूर्ण दृष्टि के प्रभाव से शनिदेव की अपनी दृष्टि भी अत्यंत प्रभावशाली व न्यायपूर्ण दंड देने वाली बन गई। शनिदेव को दंडाधिकारी नहीं, अपितु न्याय के देवता के रूप में पूजा जाता है, जो प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार ही फल प्रदान करते हैं।

एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, लंकापति रावण ने शनिदेव को बंदी बना रखा था, जिन्हें भगवान हनुमान ने लंका विजय के दौरान मुक्त कराया। कृतज्ञ होकर शनिदेव ने हनुमान जी को वचन दिया कि जो भी उनका सच्चा भक्त होगा, उस पर वे कभी अशुभ प्रभाव नहीं डालेंगे। यही कारण है कि शनि की साढ़ेसाती व ढैया से बचाव हेतु हनुमान जी की उपासना को विशेष रूप से प्रभावी माना जाता है।

शनि जयंती कैसे मनाई जाती है

भक्त इस दिन शनि मंदिर, विशेषकर महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर मंदिर जाकर शनिदेव की प्रतिमा अथवा शिला पर सरसों के तेल का अभिषेक करते हैं। काले तिल, काला वस्त्र व लोहे की वस्तुओं का भी अर्पण किया जाता है।

शनि चालीसा व शनि स्तोत्र का पाठ किया जाता है, तथा निर्धनों को काली उड़द, तेल, वस्त्र व जूते-चप्पल का दान करना विशेष पुण्यदायी माना जाता है। कौवों को भोजन कराने की भी परंपरा है।

शनि देव आरती
आरती · शनि जयंती पूजन में गाई जाने वाली आरती

शनि के अशुभ प्रभाव से बचाव हेतु अनेक भक्त इस दिन हनुमान चालीसा का पाठ भी करते हैं, यह मानते हुए कि हनुमान जी की कृपा से शनि दोष शांत होता है।

शनि जयंती पूजा विधि

प्रातःकाल स्नान कर काले अथवा गहरे नीले वस्त्र धारण करें। शनि मंदिर जाकर अथवा घर पर ही शनिदेव की प्रतिमा पर सरसों के तेल का अभिषेक करें। शनि चालीसा व हनुमान चालीसा का पाठ करें, तथा काले तिल, वस्त्र व लोहे की वस्तुओं का दान करें।

शनि जन्म कथा पढ़ें
कथा पढ़ें →

शनि जयंती के बारे में

शनि जयंती भगवान शनिदेव के जन्मोत्सव का पर्व है, जो ज्येष्ठ मास की अमावस्या को मनाया जाता है। इस पृष्ठ पर शनिदेव के जन्म की कथा, उनके न्यायाधीश स्वरूप, तथा हनुमान जी से उनके संबंध की जानकारी दी गई है।

इसी तिथि को उत्तर भारत में मनाए जाने वाले वट सावित्री व्रत की जानकारी हेतु उसका अलग पृष्ठ भी देखें। इस पृष्ठ की जानकारी बड़े अक्षरों व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।

सामान्य प्रश्न

शनि जयंती कब मनाई जाती है?

शनि जयंती उत्तर भारतीय पंचांग परंपरा में प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को मनाई जाती है, जो सामान्यतः मई-जून में आती है।

शनिदेव का वर्ण श्याम क्यों माना जाता है?

मान्यता है कि माता छाया की गर्भावस्था के दौरान की गई कठोर तपस्या व सूर्य के तेज को निरंतर सहने के कारण शनिदेव का वर्ण श्याम हो गया।

हनुमान जी की पूजा शनि दोष में सहायक क्यों मानी जाती है?

मान्यता है कि भगवान हनुमान ने रावण की कैद से शनिदेव को मुक्त कराया था, जिसके प्रत्युत्तर में शनिदेव ने हनुमान जी के सच्चे भक्तों को कभी हानि न पहुंचाने का वचन दिया था।

शनि जयंती को क्या दान करना चाहिए?

काले तिल, काला उड़द, सरसों का तेल, काले वस्त्र, लोहे की वस्तुएं व जूते-चप्पल का दान इस दिन विशेष पुण्यदायी माना जाता है।

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मुख्य जानकारी

देवताभगवान शनिदेव
तिथिज्येष्ठ अमावस्या
विशेष अनुष्ठानसरसों तेल अभिषेक, काली वस्तुओं का दान
साथ मेंवट सावित्री व्रत (उत्तर भारत)
व्रत प्रकारफलाहार व्रत, श्रद्धानुसार