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सुहाग व्रत · ज्येष्ठ कृष्णपक्ष अमावस्या

वट सावित्री व्रत

वट सावित्री व्रत सुहागिन स्त्रियों द्वारा अपने पति की दीर्घायु के लिए रखा जाने वाला व्रत है, जो ज्येष्ठ मास की कृष्णपक्ष अमावस्या को वट वृक्ष की पूजा के साथ किया जाता है।

वट सावित्री व्रत
अगली तिथि
४ जून २०२७

यह व्रत उत्तर भारत की पूर्णिमांत पंचांग परंपरा में ज्येष्ठ अमावस्या को किया जाता है, और इसी दिन शनि जयंती भी मनाई जाती है। महाराष्ट्र, गुजरात व दक्षिण भारत की अमांत पंचांग परंपरा में यही व्रत 'वट पूर्णिमा व्रत' नाम से लगभग 15 दिन बाद, ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनाया जाता है।

वट सावित्री व्रत का महत्व

वट सावित्री व्रत महाभारत के वनपर्व की पतिव्रता-माहात्म्य कथा पर आधारित है, जिसमें सावित्री अपने पतिव्रत धर्म के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त करती है। इसी घटना के स्मरण में सुहागिन स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि तथा अखंड सौभाग्य के लिए यह व्रत रखती हैं।

इस व्रत में वट अर्थात बरगद के वृक्ष की पूजा की जाती है, क्योंकि कथा के अनुसार सावित्री ने इसी वृक्ष के नीचे यमराज से अपने पति के प्राण वापस प्राप्त किए थे। वट वृक्ष को दीर्घायु और अटूट जीवन-शक्ति का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इसकी पूजा दीर्घायु की कामना के साथ जुड़ी है। सावित्री की पूरी कथा इसी साइट के कथा पृष्ठ पर पढ़ी जा सकती है।

वट सावित्री व्रत कथा
कथा · सावित्री और सत्यवान की पूरी कथा

वट सावित्री व्रत कैसे मनाई जाती है

व्रत के दिन सुहागिन स्त्रियां प्रातः स्नान कर वट वृक्ष के नीचे ब्रह्मा, सावित्री तथा सत्यवान की प्रतिमाएं स्थापित करती हैं। वृक्ष को जल, फूल, कच्चा सूत, भीगा चना और गुड़ अर्पित कर पूजा की जाती है, तथा तने के चारों ओर कच्चा धागा लपेटकर परिक्रमा की जाती है।

पूजा के बाद वट-सावित्री की कथा सुनी जाती है, और सास को भेंट देकर आशीर्वाद लिया जाता है। इस दिन को उत्तर भारत में शनि जयंती के साथ भी मनाया जाता है, जबकि महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत में यही व्रत ज्येष्ठ पूर्णिमा को 'वट पूर्णिमा व्रत' के रूप में किया जाता है।

वट सावित्री व्रत पूजा विधि

वट सावित्री व्रत के दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। वट वृक्ष के नीचे ब्रह्मा व सावित्री की एवं सत्यवान व सावित्री की प्रतिमाएं स्थापित करें। जल, फूल, कच्चा सूत, भीगा चना, गुड़ व धूप-दीप से वृक्ष की पूजा कर तीन बार परिक्रमा करें, फिर वट-सावित्री की कथा सुनें।

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वट सावित्री व्रत के बारे में

वट सावित्री व्रत सुहागिन स्त्रियों द्वारा रखा जाने वाला व्रत है, जो ज्येष्ठ मास की कृष्णपक्ष अमावस्या को मनाया जाता है। इस पृष्ठ पर इस व्रत का महत्व, सावित्री-सत्यवान की कथा की पृष्ठभूमि, वट वृक्ष की पूजा का कारण, उत्तर व दक्षिण भारत की भिन्न परंपराएं, तथा घर पर पूजा-विधि की जानकारी दी गई है।

इस पृष्ठ पर दी गई जानकारी बड़े अक्षरों व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है, तथा सावित्री-सत्यवान की पूर्ण कथा इसी साइट के कथा पृष्ठ पर पढ़ी जा सकती है।

सामान्य प्रश्न

वट सावित्री व्रत कब किया जाता है?

यह व्रत मुख्यतः उत्तर भारत में ज्येष्ठ मास की कृष्णपक्ष अमावस्या को किया जाता है, जबकि कुछ क्षेत्रों में यही व्रत ज्येष्ठ शुक्लपक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है।

वट सावित्री व्रत में वट वृक्ष की पूजा क्यों की जाती है?

कथा के अनुसार सावित्री ने इसी वट वृक्ष के नीचे यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे, इसी कारण इस दिन वट वृक्ष को दीर्घायु और अखंड सौभाग्य का प्रतीक मानकर पूजा जाता है।

वट सावित्री और वट पूर्णिमा व्रत में क्या अंतर है?

दोनों एक ही व्रत के दो नाम व दो अलग तिथियां हैं। उत्तर भारत की पूर्णिमांत परंपरा में इसे ज्येष्ठ अमावस्या को वट सावित्री व्रत कहा जाता है, जबकि महाराष्ट्र, गुजरात व दक्षिण भारत की अमांत परंपरा में यही व्रत लगभग 15 दिन बाद, ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट पूर्णिमा व्रत के नाम से किया जाता है।

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मुख्य जानकारी

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