मुख्यकथाश्री वट सावित्री व्रत कथा

श्री वट सावित्री व्रत कथा

वट सावित्री व्रत कथा सुहागिन स्त्रियों द्वारा वट वृक्ष की पूजा के साथ सुनी जाने वाली सावित्री और सत्यवान की कथा है, जिसका पूर्ण पाठ यहां उपलब्ध है।

अध्याय/

अध्याय · सावित्री का जन्म और सत्यवान का वरण

एक समय मद्र देश में अश्वपति नामक परम ज्ञानी राजा राज करता था। उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए अपनी पत्नी के साथ सावित्री देवी का विधिपूर्वक व्रत तथा पूजन किया और पुत्री होने का वर प्राप्त किया। इस पूजा के फल से उनके यहां सर्वगुण संपन्न सावित्री का जन्म हुआ। सावित्री जब विवाह योग्य हुई तो राजा ने उसे स्वयं अपना वर चुनने को कहा और अपने सेवकों के साथ वर का चुनाव करने के लिए भेज दिया। एक दिन महर्षि नारद जी राजा अश्वपति के यहां आए हुए थे, तभी सावित्री अपने वर का चयन करके लौटी। उसने आदरपूर्वक नारद जी को प्रणाम किया। नारद जी के पूछने पर सावित्री ने कहा - 'राजा द्युमत्सेन, जिनका राज्य हर लिया गया है, जो अंधे होकर अपनी पत्नी के साथ वनों में भटक रहे हैं, उन्हीं के इकलौते आज्ञाकारी पुत्र सत्यवान को मैंने अपने पतिरूप में वरण किया है।'

तब नारद जी ने सत्यवान तथा सावित्री के ग्रहों की गणना करके उनके भूत, वर्तमान तथा भविष्य को देखकर राजा से कहा - 'राजन्! तुम्हारी कन्या ने निःसंदेह बहुत योग्य वर का चुनाव किया है। सत्यवान गुणी तथा धर्मात्मा है। वह सावित्री के लिए सब प्रकार से योग्य है, परंतु एक भारी दोष है। वह अल्पायु है, और जब सावित्री बारह वर्ष की हो जाएगी, तब उसकी मृत्यु हो जाएगी।' नारद जी की ऐसी भविष्यवाणी सुनकर राजा ने अपनी पुत्री को कोई अन्य वर खोजने के लिए कहा। इस पर सावित्री ने कहा - 'पिताजी! आर्य कन्याएं जीवन में एक ही बार अपने पति का चयन करती हैं। मैंने भी सत्यवान को मन से अपना पति स्वीकार कर लिया है, अब चाहे वह अल्पायु हो या दीर्घायु, मैं किसी अन्य को अपने हृदय में स्थान नहीं दे सकती। पिताजी, आर्य कन्याएं अपना पति एक ही बार चुनती हैं। राजा एक बार ही आज्ञा देते हैं, पंडित एक बार प्रतिज्ञा करते हैं, तथा कन्यादान भी एक बार ही किया जाता है। अब चाहे जो हो, सत्यवान ही मेरा पति होगा।' सावित्री के ऐसे दृढ़ वचन सुनकर राजा अश्वपति ने उसका विवाह सत्यवान से कर दिया। सावित्री ने नारद जी से अपने पति की मृत्यु का समय ज्ञात कर लिया था। सावित्री अपने पति और सास-ससुर की सेवा करती हुई वन में रहने लगी।

अध्याय · वन में जीवन और सत्यवान की मृत्यु

समय बीतता गया और सावित्री बारह वर्ष की हो गई। नारद जी के वचन उसे दिन-प्रतिदिन परेशान करते रहे। आखिर जब नारद जी के कथनानुसार उसके पति की मृत्यु के तीन दिन शेष रह गए, तभी से वह उपवास करने लगी। नारद जी द्वारा कथित निश्चित तिथि पर उसने पितरों का पूजन किया। प्रतिदिन की भांति उस दिन भी सत्यवान लकड़ियां काटने के लिए चला तो सास-ससुर से आज्ञा लेकर वह भी उसके साथ वन में चल दी।

वन में सत्यवान ने सावित्री को मीठे-मीठे फल लाकर दिए और स्वयं एक वृक्ष पर लकड़ियां काटने के लिए चढ़ गया। वृक्ष पर चढ़ते ही सत्यवान के सिर में असहनीय पीड़ा होने लगी। वह वृक्ष से नीचे उतर आया। सावित्री ने उसे पास के बड़ के वृक्ष के नीचे लिटाकर सिर अपनी गोद में रख लिया। सावित्री का हृदय कांप रहा था। तभी उसने दक्षिण दिशा से यमराज को आते देखा। यमराज और उसके दूत धर्मराज सत्यवान के जीव को लेकर चल दिए, तो सावित्री भी उनके पीछे चल पड़ी। पीछा करती सावित्री को यमराज ने समझाकर वापस लौट जाने को कहा। किंतु सावित्री ने कहा - 'हे यमराज! पत्नी के पत्नीत्व की सार्थकता इसी में है कि वह पति की छाया के समान अनुसरण करे। पति के पीछे जाना ही स्त्री धर्म है। पतिव्रत के प्रभाव से और आपकी कृपा से कोई मेरी गति नहीं रोक सकता, यह मेरी मर्यादा है। इसके विरुद्ध कुछ भी बोलना आपके लिए शोभनीय नहीं है।'

अध्याय · यमराज से संवाद और वरदान

सावित्री के धर्मयुक्त वचनों से प्रसन्न होकर यमराज ने उससे उसके पति के प्राणों के अतिरिक्त कोई भी वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने यमराज से अपने सास-ससुर की आंखों की खोई हुई ज्योति तथा दीर्घायु मांग ली। यमराज 'तथास्तु' कहकर आगे बढ़ गए। फिर भी सावित्री ने यमराज का पीछा नहीं छोड़ा। यमराज ने उसे फिर वापस जाने के लिए कहा। इस पर सावित्री ने कहा - 'हे धर्मराज! मुझे अपने पति के पीछे चलने में कोई परेशानी नहीं है। पति के बिना नारी जीवन की कोई सार्थकता नहीं है। हम पति-पत्नी भिन्न-भिन्न मार्ग कैसे जा सकते हैं। पति का अनुगमन मेरा कर्तव्य है।' यमराज ने सावित्री के पतिव्रत धर्म की निष्ठा देखकर पुनः वर मांगने के लिए कहा। सावित्री ने अपने सास-ससुर के खोए हुए राज्य की प्राप्ति तथा सौ भाइयों की बहन होने का वर मांगा। यमराज पुनः 'तथास्तु' कहकर आगे बढ़ गए। परंतु सावित्री अब भी यमराज का पीछा किए जा रही थी। यमराज ने फिर से उसे वापस लौट जाने को कहा, किंतु सावित्री अपने प्रण पर अडिग रही।

तब यमराज ने कहा - 'हे देवी! यदि तुम्हारे मन में अब भी कोई कामना है तो कहो। जो मांगोगी वही मिलेगा।' इस पर सावित्री ने कहा - 'यदि आप सच में मुझ पर प्रसन्न हैं और सच्चे हृदय से वरदान देना चाहते हैं तो मुझे सौ पुत्रों की मां बनने का वरदान दें।' यमराज 'तथास्तु' कहकर आगे बढ़ गए। यमराज ने पीछे मुड़कर देखा और सावित्री से कहा - 'अब आगे मत बढ़ो। तुम्हें मुंहमांगा वर दे चुका हूं, फिर भी मेरा पीछा क्यों कर रही हो?' सावित्री बोली - 'धर्मराज! आपने मुझे सौ पुत्रों की मां होने का वरदान तो दे दिया, पर क्या मैं पति के बिना संतान को जन्म दे सकती हूं? मुझे मेरा पति वापस मिलना ही चाहिए, तभी मैं आपका वरदान पूरा कर सकूंगी।' सावित्री की धर्मनिष्ठा, पतिभक्ति और युक्तिपूर्ण वचनों को सुनकर यमराज ने सत्यवान के जीव को मुक्त कर दिया। सावित्री को वर देकर यमराज अंतर्ध्यान हो गए।

अध्याय · सत्यवान का पुनर्जीवन और घर वापसी

सावित्री उसी वट वृक्ष के नीचे पहुंची जहां सत्यवान का शरीर पड़ा था। सावित्री ने प्रणाम करके जैसे ही वट वृक्ष की परिक्रमा पूर्ण की, वैसे ही सत्यवान का मृत शरीर जीवित हो उठा। दोनों हर्षातुर होकर घर की ओर चल पड़े। प्रसन्नचित्त सावित्री अपने पति सहित सास-ससुर के पास गई। उनकी नेत्र-ज्योति वापस लौट आई थी। उनके मंत्री उन्हें खोज चुके थे। द्युमत्सेन ने पुनः अपना राज-सिंहासन संभाल लिया था।

उधर महाराज अश्वपति सौ पुत्रों के पिता हुए और सावित्री सौ भाइयों की बहन बनी। यमराज के वरदान से सावित्री सौ पुत्रों की मां बनी। इस प्रकार सावित्री ने अपने पतिव्रत का पालन करते हुए अपने पति के कुल एवं पितृकुल, दोनों का कल्याण कर दिया। सत्यवान और सावित्री चिरकाल तक राज सुख भोगते रहे, और चारों दिशाओं में सावित्री के पतिव्रत धर्म के पालन की कीर्ति गूंज उठी।

श्री वट सावित्री व्रत कथा पाठ विधि

वट सावित्री व्रत उत्तर भारत में ज्येष्ठ मास की कृष्णपक्ष अमावस्या को किया जाता है (कुछ क्षेत्रों में ज्येष्ठ शुक्लपक्ष की पूर्णिमा को)। इस दिन सुहागिन स्त्रियां सुबह स्नान कर वट (बरगद) वृक्ष के नीचे ब्रह्मा, सावित्री, सत्यवान की मूर्तियां स्थापित करती हैं, वृक्ष को जल, फूल, कच्चा सूत, भीगा चना, गुड़ आदि से पूजती हैं, तने के चारों ओर कच्चा धागा लपेटकर परिक्रमा करती हैं, फिर वट-सावित्री की कथा सुनती हैं। पूजा के बाद सास को भेंट देकर आशीर्वाद लिया जाता है और ब्राह्मणों को दान दिया जाता है।

पाठ दिवस
ज्येष्ठ कृष्णपक्ष अमावस्या
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शिव चालीसा
स्तोत्र · ८ मिनट
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श्री वट सावित्री व्रत कथा के बारे में

वट सावित्री व्रत कथा सावित्री और सत्यवान की कथा है, जो चार अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में राजा अश्वपति की तपस्या से सावित्री का जन्म होता है, वह सत्यवान को अपना पति चुनती है, और नारद जी की भविष्यवाणी के बावजूद उससे विवाह करती है। दूसरे अध्याय में वन में सत्यवान की असामयिक मृत्यु होती है और यमराज उसके प्राण लेने आते हैं। तीसरे अध्याय में सावित्री अपने पतिव्रत धर्म के बल पर यमराज से एक के बाद एक वरदान प्राप्त करती है, अंततः सत्यवान के प्राण वापस पा लेती है। चौथे अध्याय में सत्यवान पुनर्जीवित होकर घर लौटता है, और दोनों परिवारों का कल्याण होता है।

यह व्रत विशेष रूप से सुहागिन स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य के लिए वट वृक्ष की पूजा के साथ करती हैं। इस पृष्ठ पर चारों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।

वट सावित्री व्रत कथा का कोई नामित रचयिता नहीं है। यह मूलतः महाभारत के वनपर्व की पतिव्रता-माहात्म्य कथा है और सावित्री व्रत के साथ मौखिक व मुद्रित रूप में प्रचलित है। यहां प्रस्तुत पाठ एक प्रकाशित हिंदी व्रत-कथा संग्रह पुस्तिका में छपी वट सावित्री व्रत कथा का यथावत रूपांतरण है, जिसमें केवल स्पष्ट मुद्रण-त्रुटियां सुधारी गई हैं, कथा में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। इस स्रोत में सत्यवान की मृत्यु सावित्री के बारह वर्ष की होने पर बताई गई है; कुछ अन्य प्रचलित संस्करणों में यह विवाह के एक वर्ष बाद बताई जाती है। चूंकि इस कथा का कोई एकल, प्राचीन मुद्रित मूल पाठ नहीं है, अन्य संस्करणों में यह विवरण तथा शब्दों का हेरफेर मिल सकता है। यह व्रत अधिकांशतः उत्तर भारत में ज्येष्ठ अमावस्या को किया जाता है, जबकि कुछ क्षेत्रों में यही व्रत ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनाया जाता है।

रचनाकार
अज्ञात
लोक-प्रचलित व्रत कथा

सामान्य प्रश्न

वट सावित्री व्रत कथा में कुल कितने अध्याय हैं?

इसमें कुल चार अध्याय हैं, जो एक साथ पूर्ण पाठ के रूप में पढ़े या सुने जाते हैं।

वट सावित्री व्रत कब किया जाता है?

यह व्रत मुख्यतः उत्तर भारत में ज्येष्ठ मास की कृष्णपक्ष अमावस्या को किया जाता है, जबकि कुछ क्षेत्रों में यही व्रत ज्येष्ठ शुक्लपक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है।

वट सावित्री व्रत में वट वृक्ष की पूजा क्यों की जाती है?

कथा के अनुसार सावित्री ने इसी वट वृक्ष के नीचे यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे, इसी कारण इस दिन वट वृक्ष को दीर्घायु और अखंड सौभाग्य का प्रतीक मानकर पूजा जाता है।

सावित्री ने यमराज से कौन-कौन से वरदान मांगे?

जैसा कथा के तीसरे अध्याय में बताया गया है, सावित्री ने क्रमशः अपने सास-ससुर की खोई हुई आंखें व दीर्घायु, उनका खोया हुआ राज्य, सौ भाइयों की बहन होने का वर, तथा सौ पुत्रों की मां बनने का वर मांगा, और अंत में अपने पति सत्यवान के प्राण वापस पाए।

वट सावित्री व्रत कथा किस ग्रंथ से ली गई है?

यह कथा मूलतः महाभारत के वनपर्व के अंतर्गत आने वाली पतिव्रता-माहात्म्य कथा है, जो सावित्री की पतिभक्ति की महिमा बताती है।

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