वट पूर्णिमा व्रत
वट पूर्णिमा व्रत सुहागिन स्त्रियों द्वारा अपने पति की दीर्घायु हेतु रखा जाने वाला व्रत है, जो ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को वट वृक्ष की पूजा के साथ मनाया जाता है, तथा यह वट सावित्री व्रत का ही अमांत पंचांग परंपरा वाला रूप है।

यह व्रत महाराष्ट्र, गुजरात व दक्षिण भारत की अमांत पंचांग परंपरा में मनाया जाता है, तथा उत्तर भारत की पूर्णिमांत परंपरा में यही व्रत लगभग 15 दिन पूर्व, ज्येष्ठ अमावस्या को 'वट सावित्री व्रत' के नाम से मनाया जाता है। सटीक तिथि हेतु नज़दीकी पंचांग देखें।
वट पूर्णिमा व्रत का महत्व
वट पूर्णिमा व्रत वट सावित्री व्रत के समान ही महाभारत के वनपर्व की सावित्री-सत्यवान कथा पर आधारित है, जिसमें सावित्री अपने पतिव्रत धर्म के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त करती है। सावित्री की पूरी कथा इसी साइट के कथा पृष्ठ पर पढ़ी जा सकती है।
अंतर केवल पंचांग गणना का है, उत्तर भारत की पूर्णिमांत परंपरा में इसे ज्येष्ठ अमावस्या को 'वट सावित्री व्रत' कहा जाता है, जबकि महाराष्ट्र, गुजरात व दक्षिण भारत की अमांत परंपरा में यही व्रत लगभग 15 दिन पश्चात, ज्येष्ठ पूर्णिमा को 'वट पूर्णिमा व्रत' के नाम से मनाया जाता है। व्रत का उद्देश्य व कथा दोनों में समान है।
महाराष्ट्र में इस व्रत का विशेष सामाजिक पक्ष भी है, सुहागिन स्त्रियां आपस में 'वाण' नामक भेंट-टोकरियों का आदान-प्रदान करती हैं, जिसमें फल, मिठाई व श्रृंगार सामग्री रखी जाती है, जो सौभाग्य व मैत्री के आदान-प्रदान का प्रतीक मानी जाती है।
वट पूर्णिमा व्रत कैसे मनाई जाती है
व्रत के दिन सुहागिन स्त्रियां प्रातः स्नान कर सोलह श्रृंगार करती हैं, तथा वट वृक्ष के नीचे ब्रह्मा, सावित्री तथा सत्यवान की प्रतिमाएं स्थापित कर पूजा करती हैं। वृक्ष के तने के चारों ओर कच्चा सूत लपेटते हुए 108 बार परिक्रमा करने की परंपरा है, जिसे विशेष पुण्यदायी माना जाता है।
पूजा के पश्चात वट-सावित्री की कथा सुनी जाती है, तथा महाराष्ट्र में विशेष रूप से सुहागिन स्त्रियां एक-दूसरे को 'वाण' की टोकरियां भेंट करती हैं। कुछ घरों में वट वृक्ष की एक छोटी शाखा घर लाकर भी उसकी पूजा की जाती है, जहां वास्तविक वृक्ष तक पहुंचना संभव नहीं होता।
पूजा के बाद सास व घर की बड़ी स्त्रियों को भेंट देकर आशीर्वाद लिया जाता है, तथा दिनभर व्रत रखकर संध्या समय पूजा-अर्चना के पश्चात व्रत का पारण किया जाता है।
वट पूर्णिमा व्रत पूजा विधि
प्रातः स्नान कर सोलह श्रृंगार करें। वट वृक्ष के नीचे ब्रह्मा-सावित्री व सत्यवान-सावित्री की प्रतिमाएं स्थापित कर पूजा करें। कच्चा सूत लपेटते हुए वृक्ष की 108 बार परिक्रमा करें, वट-सावित्री की कथा सुनें, तथा संध्या समय व्रत का पारण करें।
वट पूर्णिमा व्रत के बारे में
वट पूर्णिमा व्रत सुहागिन स्त्रियों द्वारा रखा जाने वाला व्रत है, जो ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है, तथा वट सावित्री व्रत का ही अमांत पंचांग परंपरा वाला रूप है। इस पृष्ठ पर इस व्रत का महत्व, वाण की परंपरा, तथा घर पर पूजा-विधि की जानकारी दी गई है।
इस पृष्ठ पर दी गई जानकारी बड़े अक्षरों व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है, तथा सावित्री-सत्यवान की पूर्ण कथा इसी साइट के कथा पृष्ठ पर पढ़ी जा सकती है।
सामान्य प्रश्न
वट पूर्णिमा व्रत कब किया जाता है?
यह व्रत महाराष्ट्र, गुजरात व दक्षिण भारत की अमांत पंचांग परंपरा में ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को किया जाता है।
वट पूर्णिमा व वट सावित्री व्रत में क्या अंतर है?
दोनों एक ही व्रत के दो नाम व दो अलग तिथियां हैं। उत्तर भारत की पूर्णिमांत परंपरा में इसे ज्येष्ठ अमावस्या को वट सावित्री व्रत कहा जाता है, जबकि महाराष्ट्र, गुजरात व दक्षिण भारत की अमांत परंपरा में यही व्रत लगभग 15 दिन पश्चात, ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट पूर्णिमा व्रत के नाम से किया जाता है।
वाण क्या है?
वाण महाराष्ट्र में सुहागिन स्त्रियों के बीच प्रचलित एक भेंट-टोकरी परंपरा है, जिसमें फल, मिठाई व श्रृंगार सामग्री रखकर एक-दूसरे को भेंट की जाती है, जो सौभाग्य व मैत्री के आदान-प्रदान का प्रतीक मानी जाती है।
वट वृक्ष की परिक्रमा 108 बार क्यों की जाती है?
108 की संख्या को हिंदू परंपरा में एक पूर्ण व पवित्र अंक माना जाता है, तथा वट वृक्ष की 108 परिक्रमा को पति की दीर्घायु हेतु की गई पूर्ण व सम्पूर्ण प्रार्थना का प्रतीक माना जाता है।