17 अक्टूबर 2026 का पर्व

नवरात्रि का सातवां दिन: मां कालरात्रि की पूजा, भोग, मंत्र और आज का सप्तशती पाठ

आस्था संग्रह संपादकीय टीम

मां कालरात्रि

नवरात्रि का सातवां दिन, शनिवार, 17 अक्टूबर 2026, मां कालरात्रि को समर्पित है। आज उन्हें गुड़ का भोग लगता है, और सात दिनों के क्रम से सप्तशती पढ़ने वालों के लिए आज अध्याय 12 (देवी-चरित्रों के पाठ का माहात्म्य), अध्याय 13 (सुरथ और वैश्य को देवी का वरदान) का पाठ है।

आज का पंचांग

तिथि
शुक्ल सप्तमी, 18 अक्टूबर प्रातः 8:27 तक
सूर्योदय / सूर्यास्त
प्रातः 6:23 / शाम 5:49
अभिजित मुहूर्त
दोपहर 11:43 से 12:29
राहुकाल
प्रातः 9:14 से 10:40

पूजा सूर्योदय के बाद प्रातःकाल में करना सबसे अच्छा माना जाता है। राहुकाल (प्रातः 9:14 से 10:40) में कोई नया शुभ कार्य आरंभ न करने की परंपरा है, जबकि अभिजित मुहूर्त दिन का सबसे शुभ समय माना जाता है।

मां कालरात्रि कौन हैं

कालरात्रि नवदुर्गा का सबसे उग्र रूप हैं: श्याम वर्ण, बिखरे केश और तीन नेत्र। रूप भयंकर होने पर भी वे सदा शुभ फल देती हैं, इसलिए शुभंकरी कहलाती हैं। मान्यता है कि उनकी पूजा से हर प्रकार का भय, बाधा और अंधकार दूर होता है। इस वर्ष सप्तमी तिथि 18 अक्टूबर की सुबह तक रहती है, और अष्टमी-नवमी 19 अक्टूबर को एक साथ हैं।

उनके नाम में 'काल' का अर्थ समय भी है और मृत्यु भी: वे वह शक्ति हैं जिसके आगे काल भी ठहर जाता है। मान्यता है कि शुम्भ-निशुम्भ के संहार के लिए देवी ने अपनी स्वर्णिम त्वचा उतार दी, तब यह रूप प्रकट हुआ। उग्र रूप के बावजूद उनका एक हाथ सदा अभय और दूसरा वरद मुद्रा में रहता है, जो भक्त को निर्भय रहने का आश्वासन है। अनेक घरों और शक्तिपीठों में सप्तमी की रात विशेष पूजा और जागरण होता है। उनसे जुड़ा ग्रह शनि माना जाता है।

वाहन
गर्दभ (गधा)
स्वरूप
चार भुजाएं, दाहिने हाथ अभय व वरद मुद्रा में, बाएं हाथों में तलवार और लोहे का कांटा
भोग
गुड़
प्रिय पुष्प
रात की रानी
ग्रह (मान्यता)
शनि

आज की पूजा कैसे करें

प्रातः स्नान कर कलश और अखंड ज्योति की पूजा करें, फिर नीचे दी गई प्रार्थना से मां कालरात्रि का ध्यान करें। उन्हें रात की रानी और गुड़ का भोग अर्पित करें, मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें, स्तुति पढ़ें और संध्या को आरती करें। व्रत रखने वाले दिन में फलाहार लेते हैं।

मंत्र

ॐ देवी कालरात्र्यै नमः॥

प्रार्थना (ध्यान)

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्त शरीरिणी॥वामपादोल्लसल्लोह लताकण्टकभूषणा।वर्धन मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

स्तुति

या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

आज का दुर्गा सप्तशती पाठ

जो भक्त सप्तशती का पाठ सात दिनों के क्रम से कर रहे हैं, उनके लिए आज अध्याय 12 (देवी-चरित्रों के पाठ का माहात्म्य), अध्याय 13 (सुरथ और वैश्य को देवी का वरदान) का पाठ है। कवच, अर्गला और कीलक के बाद ये अध्याय पढ़ें।

बारहवें अध्याय में देवी स्वयं बताती हैं कि जो इन चरित्रों का पाठ या श्रवण करता है, विशेषकर अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी को, उसके संकट दूर होते हैं, और शरद ऋतु की वार्षिक महापूजा में इस माहात्म्य को सुनने का विशेष फल है। तेरहवें अध्याय में कथा वहीं लौटती है जहां से शुरू हुई थी: राजा सुरथ और वैश्य समाधि नदी तट पर मिट्टी की प्रतिमा बनाकर तीन वर्ष देवी की आराधना करते हैं। प्रसन्न देवी सुरथ को राज्य लौटाने और अगले जन्म में सावर्णि मनु होने का वर देती हैं, और वैश्य को मोक्ष देने वाला ज्ञान।

आगे क्या

रविवार, 18 अक्टूबर को सप्तमी तिथि सुबह 8:27 तक है, फिर अष्टमी लगती है। इस वर्ष दुर्गा अष्टमी और महा नवमी दोनों सोमवार, 19 अक्टूबर को हैं, उसी दिन संधि पूजा और कन्या पूजन भी है, और दशहरा 20 अक्टूबर को।

तिथियां और समय द्रिक पंचांग व हमारे पंचांग से जांचे गए, नई दिल्ली के अनुसार।