
नवरात्रि का पहला दिन, रविवार, 11 अक्टूबर 2026, मां शैलपुत्री को समर्पित है। आज उन्हें शुद्ध गाय का घी का भोग लगता है, और सात दिनों के क्रम से सप्तशती पढ़ने वालों के लिए आज अध्याय 1 (मधु-कैटभ वध) का पाठ है।
आज का पंचांग
- तिथि
- शुक्ल प्रतिपदा, रात 9:31 तक
- सूर्योदय / सूर्यास्त
- प्रातः 6:19 / शाम 5:56
- अभिजित मुहूर्त
- दोपहर 11:44 से 12:31
- राहुकाल
- शाम 4:28 से 5:56
पूजा सूर्योदय के बाद प्रातःकाल में करना सबसे अच्छा माना जाता है। राहुकाल (शाम 4:28 से 5:56) में कोई नया शुभ कार्य आरंभ न करने की परंपरा है, जबकि अभिजित मुहूर्त दिन का सबसे शुभ समय माना जाता है।
मां शैलपुत्री कौन हैं
शैलपुत्री का अर्थ है पर्वत की पुत्री। पूर्व जन्म में देवी सती थीं, जिन्होंने पिता दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान सहन न कर देह त्याग दी। अगले जन्म में उन्होंने पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लिया और फिर से शिव को पति रूप में पाया। वृषभ पर सवार होने से वे वृषारूढ़ा भी कहलाती हैं, और हेमवती व पार्वती भी उन्हीं के नाम हैं।
नवरात्रि की साधना शैलपुत्री से आरंभ होती है, क्योंकि पर्वत स्थिरता का प्रतीक है: जैसे पर्वत अडिग रहता है, वैसे ही साधक नौ दिनों के संकल्प में अडिग रहे। इसी दिन घर में कलश स्थापित होता है और अखंड ज्योति जलाई जाती है, जो नवरात्रि भर जलती रहती है। मान्यता है कि उनकी उपासना से स्वास्थ्य, स्थिरता और दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है, और चंद्र ग्रह से जुड़े कष्टों में शांति मिलती है।
- वाहन
- वृषभ (बैल), इसी से 'वृषारूढ़ा' भी कहलाती हैं
- स्वरूप
- दो भुजाएं, दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल
- भोग
- शुद्ध गाय का घी
- प्रिय पुष्प
- चमेली
- ग्रह (मान्यता)
- चंद्र
आज की पूजा कैसे करें
आज घटस्थापना का दिन है। प्रातः 6:19 से 10:12 के मुहूर्त में, या अभिजित मुहूर्त 11:44 से 12:31 में, जौ बोए मिट्टी के पात्र पर कलश स्थापित करें और अखंड ज्योति जलाएं। इसके बाद ही आज की देवी पूजा आरंभ होती है।
प्रातः स्नान कर कलश और अखंड ज्योति की पूजा करें, फिर नीचे दी गई प्रार्थना से मां शैलपुत्री का ध्यान करें। उन्हें चमेली और शुद्ध गाय का घी का भोग अर्पित करें, मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें, स्तुति पढ़ें और संध्या को आरती करें। व्रत रखने वाले दिन में फलाहार लेते हैं।
ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
आज का दुर्गा सप्तशती पाठ
जो भक्त सप्तशती का पाठ सात दिनों के क्रम से कर रहे हैं, उनके लिए आज अध्याय 1 (मधु-कैटभ वध) का पाठ है। कवच, अर्गला और कीलक के बाद ये अध्याय पढ़ें।
पहले अध्याय से सप्तशती की कथा आरंभ होती है। दो दुखी व्यक्ति, एक राज्य खो चुका राजा और घर से निकाला गया एक व्यापारी, ऋषि मेधा से पूछते हैं कि मन उन्हीं लोगों में क्यों अटका रहता है जिन्होंने उन्हें छोड़ दिया। उत्तर में ऋषि महामाया की शक्ति समझाते हैं और मधु-कैटभ की कथा सुनाते हैं: ब्रह्मा जी की स्तुति पर देवी भगवान विष्णु की योगनिद्रा हटाती हैं, और विष्णु दोनों असुरों का वध करते हैं। यह अध्याय प्रथम चरित्र है, जिसकी अधिष्ठात्री महाकाली हैं।
कल का दिन
कल, सोमवार, 12 अक्टूबर 2026, नवरात्रि का दूसरा दिन है और मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होगी, जिन्हें चीनी अथवा मिश्री का भोग लगता है। सात दिनों के क्रम में कल अध्याय 2, अध्याय 3 का पाठ है।
तिथियां और समय द्रिक पंचांग व हमारे पंचांग से जांचे गए, नई दिल्ली के अनुसार।
