
नवरात्रि का तीसरा दिन, मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026, मां चंद्रघंटा को समर्पित है। आज उन्हें दूध व दूध से बने व्यंजन का भोग लगता है, और सात दिनों के क्रम से सप्तशती पढ़ने वालों के लिए आज अध्याय 4 (इन्द्रादि देवताओं द्वारा देवी की स्तुति) का पाठ है।
आज का पंचांग
- तिथि
- शुक्ल तृतीया, रात 11:28 तक
- सूर्योदय / सूर्यास्त
- प्रातः 6:20 / शाम 5:53
- अभिजित मुहूर्त
- दोपहर 11:44 से 12:30
- राहुकाल
- दोपहर 3:00 से 4:27
पूजा सूर्योदय के बाद प्रातःकाल में करना सबसे अच्छा माना जाता है। राहुकाल (दोपहर 3:00 से 4:27) में कोई नया शुभ कार्य आरंभ न करने की परंपरा है, जबकि अभिजित मुहूर्त दिन का सबसे शुभ समय माना जाता है।
मां चंद्रघंटा कौन हैं
मां चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी से उनका नाम पड़ा। वे शांत भी हैं और युद्ध के लिए तैयार भी: मान्यता है कि उनके घंटे की ध्वनि से असुर भयभीत होकर भाग जाते हैं। उनकी पूजा भय से मुक्ति और साहस के लिए की जाती है।
चंद्रघंटा पार्वती का विवाहित रूप मानी जाती हैं: शिव से विवाह के बाद देवी ने मस्तक पर अर्धचंद्र धारण किया। उनका रूप दिखाता है कि शांति और शक्ति साथ रह सकती हैं, एक ओर सौम्य मुख, दूसरी ओर दस हाथों में अस्त्र। इसीलिए आज की पूजा में घंटी बजाने का विशेष महत्व है, और मान्यता है कि उनकी उपासना से मन का भय और घबराहट शांत होती है। उनसे जुड़ा ग्रह शुक्र माना जाता है, और उन्हें चंद्रखंडा नाम से भी पूजा जाता है।
- वाहन
- बाघिन
- स्वरूप
- दस भुजाएं, जिनमें त्रिशूल, गदा, तलवार, कमण्डलु, कमल, धनुष-बाण व जपमाला
- भोग
- दूध व दूध से बने व्यंजन
- प्रिय पुष्प
- चमेली
- ग्रह (मान्यता)
- शुक्र
आज की पूजा कैसे करें
प्रातः स्नान कर कलश और अखंड ज्योति की पूजा करें, फिर नीचे दी गई प्रार्थना से मां चंद्रघंटा का ध्यान करें। उन्हें चमेली और दूध व दूध से बने व्यंजन का भोग अर्पित करें, मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें, स्तुति पढ़ें और संध्या को आरती करें। व्रत रखने वाले दिन में फलाहार लेते हैं।
ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥
पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।प्रसादं तनुते मह्यम् चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
आज का दुर्गा सप्तशती पाठ
जो भक्त सप्तशती का पाठ सात दिनों के क्रम से कर रहे हैं, उनके लिए आज अध्याय 4 (इन्द्रादि देवताओं द्वारा देवी की स्तुति) का पाठ है। कवच, अर्गला और कीलक के बाद ये अध्याय पढ़ें।
चौथा अध्याय महिषासुर वध के बाद की स्तुति है। प्रसन्न इन्द्र और सब देवता देवी की लंबी स्तुति करते हैं, जिसे शक्रादि स्तुति कहते हैं, क्योंकि शक्र इन्द्र का ही नाम है। प्रसन्न होकर देवी वर मांगने को कहती हैं, और देवता मांगते हैं कि जब भी संकट आए, स्मरण करने पर देवी प्रकट होकर रक्षा करें, और जो इस स्तुति से उनकी उपासना करे, उसे सुख-समृद्धि मिले। देवी 'तथास्तु' कहकर अंतर्धान हो जाती हैं, और इसी अध्याय के साथ मध्यम चरित्र पूरा होता है।
कल का दिन
कल, बुधवार, 14 अक्टूबर 2026, नवरात्रि का चौथा दिन है और मां कूष्माण्डा की पूजा होगी, जिन्हें मालपुआ का भोग लगता है। सात दिनों के क्रम में कल अध्याय 5, अध्याय 6, अध्याय 7, अध्याय 8 का पाठ है।
तिथियां और समय द्रिक पंचांग व हमारे पंचांग से जांचे गए, नई दिल्ली के अनुसार।



