मधु-कैटभ वध
राज्य खो चुके राजा सुरथ और परिवार से निकाले गए वैश्य समाधि, मेधा ऋषि के आश्रम में मिलते हैं। दोनों पूछते हैं कि जिन्होंने उन्हें छोड़ दिया, उनसे मोह क्यों नहीं छूटता। ऋषि बताते हैं कि यह महामाया का प्रभाव है, और उनके पहले प्रकट होने की कथा सुनाते हैं: भगवान विष्णु की योगनिद्रा में मधु और कैटभ ब्रह्मा जी पर टूट पड़ते हैं, ब्रह्मा जी देवी की स्तुति करते हैं और जागकर विष्णु उन दोनों का वध करते हैं।

विनियोग
ॐ प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, महाकाली देवता, गायत्री छन्दः, नन्दा शक्तिः, रक्तदन्तिका बीजम्, अग्निस्तत्त्वम्, ऋग्वेदः स्वरूपम्, श्रीमहाकालीप्रीत्यर्थे प्रथमचरित्रजपे विनियोगः।
प्रथम चरित्र के ऋषि ब्रह्मा हैं, देवता महाकाली, छन्द गायत्री, शक्ति नन्दा, बीज रक्तदन्तिका, तत्त्व अग्नि और स्वरूप ऋग्वेद है। श्री महाकाली की प्रसन्नता के लिये प्रथम चरित्र का जप किया जाता है।
ध्यान
ॐ खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरःशङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्।नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकांयामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम्
जो अपने हाथों में खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डी, (कटा हुआ) सिर और शंख धारण करती हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो सब अंगों में आभूषणों से सजी हैं, जिनकी कान्ति नीलमणि जैसी है और जिनके दस मुख और दस पैर हैं, उन महाकाली का मैं ध्यान करता हूँ। भगवान विष्णु के सो जाने पर मधु और कैटभ का नाश कराने के लिये कमल से जन्मे ब्रह्मा जी ने इन्हीं की स्तुति की थी।
ॐ नमश्चण्डिकायै
मूल पाठ
ॐ ऐं मार्कण्डेय उवाच(मार्कण्डेय जी बोले)॥ १ ॥
सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः।निशामय तदुत्पत्तिं विस्तराद् गदतो मम॥ २ ॥
सूर्य के पुत्र सावर्णि, जो आठवें मनु कहलाते हैं, उनके जन्म की कथा मैं विस्तार से कहता हूँ, सुनो।
महामायानुभावेन यथा मन्वन्तराधिपः।स बभूव महाभागः सावर्णिस्तनयो रवेः॥ ३ ॥
महामाया के प्रभाव से सूर्य के पुत्र महाभाग सावर्णि जिस प्रकार मन्वन्तर के स्वामी बने, (वह सुनो)।
स्वारोचिषेऽन्तरे पूर्वं चैत्रवंशसमुद्भवः।सुरथो नाम राजाभूत्समस्ते क्षितिमण्डले॥ ४ ॥
पहले स्वारोचिष मन्वन्तर में चैत्र वंश में जन्मे सुरथ नाम के राजा थे, जिनका राज्य सारी पृथ्वी पर था।
तस्य पालयतः सम्यक् प्रजाः पुत्रानिवौरसान्।बभूवुः शत्रवो भूपाः कोलाविध्वंसिनस्तदा॥ ५ ॥
वे प्रजा का अपने सगे पुत्रों की तरह भली-भाँति पालन करते थे। उस समय कोलाविध्वंसी राजा उनके शत्रु बन गए।
तस्य तैरभवद् युद्धमतिप्रबलदण्डिनः।न्यूनैरपि स तैर्युद्धे कोलाविध्वंसिभिर्जितः॥ ६ ॥
अत्यन्त शक्तिशाली सेना वाले राजा सुरथ का उनसे युद्ध हुआ। कोलाविध्वंसी संख्या में कम थे, फिर भी उन्होंने युद्ध में सुरथ को हरा दिया।
ततः स्वपुरमायातो निजदेशाधिपोऽभवत्।आक्रान्तः स महाभागस्तैस्तदा प्रबलारिभिः॥ ७ ॥
तब वे अपनी राजधानी लौट आए और केवल अपने देश के राजा रह गए। वहाँ भी उन प्रबल शत्रुओं ने उन पर आक्रमण किया।
अमात्यैर्बलिभिर्दुष्टैर्दुर्बलस्य दुरात्मभिः।कोशो बलं चापहृतं तत्रापि स्वपुरे ततः॥ ८ ॥
राजा अब कमज़ोर हो गए थे, इसलिये उनकी अपनी राजधानी में भी उनके बलवान, दुष्ट और दुरात्मा मन्त्रियों ने उनका खजाना और सेना छीन ली।
ततो मृगयाव्याजेन हृतस्वाम्यः स भूपतिः।एकाकी हयमारुह्य जगाम गहनं वनम्॥ ९ ॥
इस प्रकार अपना अधिकार खो चुके राजा शिकार के बहाने घोड़े पर सवार होकर अकेले ही घने वन में चले गए।
स तत्राश्रममद्राक्षीद् द्विजवर्यस्य मेधसः।प्रशान्तश्वापदाकीर्णं मुनिशिष्योपशोभितम्॥ १० ॥
वहाँ उन्होंने श्रेष्ठ ब्राह्मण मेधा मुनि का आश्रम देखा, जहाँ हिंसक पशु भी शान्त होकर रहते थे और जो मुनि के शिष्यों से सुशोभित था।
तस्थौ कंचित्स कालं च मुनिना तेन सत्कृतः।इतश्चेतश्च विचरंस्तस्मिन्मुनिवराश्रमे॥ ११ ॥
मुनि ने उनका सत्कार किया, और वे उस श्रेष्ठ आश्रम में इधर-उधर घूमते हुए कुछ समय वहाँ रहे।
सोऽचिन्तयत्तदा तत्र ममत्वाकृष्टचेतनः।मत्पूर्वैः पालितं पूर्वं मया हीनं पुरं हि तत्॥ १२ ॥
वहाँ ममता से खिंचे मन वाले राजा सोचने लगे: मेरे पूर्वजों ने जिस नगर का पालन किया था, वह आज मुझसे छिन गया है।
मद्भृत्यैस्तैरसद्वृत्तैर्धर्मतः पाल्यते न वा।न जाने स प्रधानो मे शूरहस्ती सदामदः॥ १३ ॥
मेरे वे दुराचारी सेवक उसका धर्म से पालन करते हैं या नहीं? पता नहीं, मेरा वह प्रधान हाथी, जो शूरवीर था और सदा मद में रहता था,
मम वैरिवशं यातः कान् भोगानुपलप्स्यते।ये ममानुगता नित्यं प्रसादधनभोजनैः॥ १४ ॥
शत्रुओं के वश में जाकर अब कैसे सुख पाता होगा। जो लोग मेरी कृपा, धन और भोजन पाकर सदा मेरे पीछे चलते थे,
अनुवृत्तिं ध्रुवं तेऽद्य कुर्वन्त्यन्यमहीभृताम्।असम्यग्व्ययशीलैस्तैः कुर्वद्भिः सततं व्ययम्॥ १५ ॥
वे आज निश्चय ही दूसरे राजाओं की सेवा करते होंगे। अनुचित खर्च करने वाले वे लोग लगातार व्यय करते रहेंगे, तो
संचितः सोऽतिदुःखेन क्षयं कोशो गमिष्यति।एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः॥ १६ ॥
बड़े कष्ट से जोड़ा हुआ मेरा खजाना खाली हो जाएगा। राजा निरन्तर ये और ऐसी ही दूसरी बातें सोचते रहे।
तत्र विप्राश्रमाभ्याशे वैश्यमेकं ददर्श सः।स पृष्टस्तेन कस्त्वं भो हेतुश्चागमनेऽत्र कः॥ १७ ॥
वहाँ ब्राह्मण के आश्रम के पास उन्होंने एक वैश्य को देखा। राजा ने उससे पूछा: भाई, तुम कौन हो? यहाँ आने का कारण क्या है?
सशोक इव कस्मात्त्वं दुर्मना इव लक्ष्यसे।इत्याकर्ण्य वचस्तस्य भूपतेः प्रणयोदितम्॥ १८ ॥
तुम शोक में डूबे और उदास से क्यों दिखाई देते हो? राजा के प्रेम से कहे ये वचन सुनकर,
प्रत्युवाच स तं वैश्यः प्रश्रयावनतो नृपम्॥ १९ ॥
वैश्य ने विनम्रता से झुककर राजा को उत्तर दिया।
वैश्य उवाच(वैश्य बोला)॥ २० ॥
समाधिर्नाम वैश्योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले॥ २१ ॥
मैं समाधि नाम का वैश्य हूँ और धनी परिवार में जन्मा हूँ।
पुत्रदारैर्निरस्तश्च धनलोभादसाधुभिः।विहीनश्च धनैर्दारैः पुत्रैरादाय मे धनम्॥ २२ ॥
धन के लोभी मेरे दुष्ट पुत्रों और पत्नी ने मुझे घर से निकाल दिया है। उन्होंने मेरा धन ले लिया और मुझे धन, पत्नी और पुत्रों से वंचित कर दिया।
वनमभ्यागतो दुःखी निरस्तश्चाप्तबन्धुभिः।सोऽहं न वेद्मि पुत्राणां कुशलाकुशलात्मिकाम्॥ २३ ॥
जिन बन्धुओं पर भरोसा था, उन्होंने भी मुझे त्याग दिया, इसलिये दुःखी होकर मैं वन में आया हूँ। यहाँ रहकर मुझे नहीं पता कि मेरे पुत्र,
प्रवृत्तिं स्वजनानां च दाराणां चात्र संस्थितः।किं नु तेषां गृहे क्षेममक्षेमं किं नु साम्प्रतम्॥ २४ ॥
स्वजन और पत्नी किस हाल में हैं, उनका भला हो रहा है या बुरा। इस समय उनके घर में कुशल है या कुछ अनिष्ट हुआ है?
कथं ते किं नु सद्वृत्ता दुर्वृत्ताः किं नु मे सुताः॥ २५ ॥
वे कैसे हैं? मेरे पुत्र सदाचारी हैं या दुराचारी?
राजोवाच(राजा बोले)॥ २६ ॥
यैर्निरस्तो भवाँल्लुब्धैः पुत्रदारादिभिर्धनैः॥ २७ ॥
जिन लोभी पत्नी, पुत्र आदि ने धन के लिये तुम्हें निकाल दिया,
तेषु किं भवतः स्नेहमनुबध्नाति मानसम्॥ २८ ॥
उनके प्रति तुम्हारा मन स्नेह से क्यों बँधा है?
वैश्य उवाच(वैश्य बोला)॥ २९ ॥
एवमेतद्यथा प्राह भवानस्मद्गतं वचः॥ ३० ॥
आप मेरे बारे में जो कह रहे हैं, वह बिल्कुल ठीक है।
किं करोमि न बध्नाति मम निष्ठुरतां मनः।यैः संत्यज्य पितृस्नेहं धनलुब्धैर्निराकृतः॥ ३१ ॥
पर क्या करूँ, मेरा मन कठोर नहीं होता। धन के लोभ में जिन्होंने पिता का स्नेह छोड़कर मुझे निकाल दिया,
पतिस्वजनहार्दं च हार्दि तेष्वेव मे मनः।किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते॥ ३२ ॥
जिन्होंने पति और स्वजनों के प्रति प्रेम भी त्याग दिया, उन्हीं में मेरा मन प्रेम से लगा है। हे महामते, जानते हुए भी मैं नहीं समझ पाता कि यह क्या है
यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बन्धुषु।तेषां कृते मे निःश्वासो दौर्मनस्यं च जायते॥ ३३ ॥
कि गुणहीन बन्धुओं के प्रति भी मेरा चित्त प्रेम में झुका रहता है। उनके लिये मेरे मन से आह निकलती है और उदासी छा जाती है।
करोमि किं यन्न मनस्तेष्वप्रीतिषु निष्ठुरम्॥ ३४ ॥
जिनका मुझसे प्रेम नहीं, उनके प्रति भी मेरा मन कठोर नहीं होता, तो मैं क्या करूँ?
मार्कण्डेय उवाच(मार्कण्डेय जी बोले)॥ ३५ ॥
ततस्तौ सहितौ विप्र तं मुनिं समुपस्थितौ॥ ३६ ॥
हे ब्राह्मण! तब वे दोनों एक साथ उन मुनि के पास गए।
समाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः।कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथार्हं तेन संविदम्॥ ३७ ॥
समाधि नाम का वह वैश्य और वह श्रेष्ठ राजा, दोनों ने मुनि को यथोचित रीति से प्रणाम किया, और
उपविष्टौ कथाः काश्चिच्चक्रतुर्वैश्यपार्थिवौ॥ ३८ ॥
बैठकर वैश्य और राजा ने उनसे कुछ बातें कीं।
राजोवाच(राजा बोले)॥ ३९ ॥
भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छाम्येकं वदस्व तत्॥ ४० ॥
भगवन्! मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, कृपया बताइये।
दुःखाय यन्मे मनसः स्वचित्तायत्ततां विना।ममत्वं गतराज्यस्य राज्याङ्गेष्वखिलेष्वपि॥ ४१ ॥
मेरा मन मेरे वश में नहीं है, यही मेरे दुःख का कारण है। राज्य छिन जाने पर भी राज्य की हर चीज़ में मेरी ममता बनी हुई है।
जानतोऽपि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम।अयं च निकृतः पुत्रैर्दारैर्भृत्यैस्तथोज्झितः॥ ४२ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ, मैं जानता हूँ, फिर भी अज्ञानी की तरह मुझे यह क्या हो रहा है? और यह वैश्य भी पुत्रों से अपमानित हुआ है, पत्नी और सेवकों ने इसे छोड़ दिया है,
स्वजनेन च संत्यक्तस्तेषु हार्दी तथाप्यति।एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यन्तदुःखितौ॥ ४३ ॥
स्वजनों ने इसे त्याग दिया है, फिर भी यह उनसे बहुत प्रेम करता है। इस तरह यह और मैं, दोनों ही अत्यन्त दुःखी हैं।
दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्टमानसौ।तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि॥ ४४ ॥
जिस विषय में दोष देख चुके हैं, उसी की ममता से हमारा मन खिंचा जा रहा है। हे महाभाग, हम दोनों जानकार हैं, फिर भी यह मोह क्यों है?
ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढता॥ ४५ ॥
विवेक न रहने से अंधे हुए मुझमें और इसमें यह मूढ़ता क्यों है?
ऋषिरुवाच(मेधा ऋषि बोले)॥ ४६ ॥
ज्ञानमस्ति समस्तस्य जन्तोर्विषयगोचरे॥ ४७ ॥
विषयों का ज्ञान तो हर प्राणी को होता है।
विषयश्च महाभाग याति चैवं पृथक् पृथक्।दिवान्धाः प्राणिनः केचिद्रात्रावन्धास्तथापरे॥ ४८ ॥
और हे महाभाग, विषय अलग-अलग प्राणियों तक अलग-अलग ढंग से पहुँचते हैं। कुछ प्राणी दिन में नहीं देख पाते और कुछ रात में।
केचिद्दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्यदृष्टयः।ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किं तु ते न हि केवलम्॥ ४९ ॥
कुछ प्राणी दिन और रात दोनों में बराबर देखते हैं। यह सच है कि मनुष्य ज्ञानी होते हैं, पर केवल वही ज्ञानी नहीं हैं,
यतो हि ज्ञानिनः सर्वे पशुपक्षिमृगादयः।ज्ञानं च तन्मनुष्याणां यत्तेषां मृगपक्षिणाम्॥ ५० ॥
क्योंकि पशु, पक्षी, मृग आदि सब प्राणी भी ज्ञान रखते हैं। जैसा ज्ञान मनुष्यों में है, वैसा ही इन मृगों और पक्षियों में भी है,
मनुष्याणां च यत्तेषां तुल्यमन्यत्तथोभयोः।ज्ञानेऽपि सति पश्यैतान् पतङ्गाञ्छावचञ्चुषु॥ ५१ ॥
और जैसा इनमें है, वैसा ही मनुष्यों में है; बाकी बातें भी दोनों में एक-सी हैं। ज्ञान होते हुए भी इन पक्षियों को देखो,
कणमोक्षादृतान्मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा।मानुषा मनुजव्याघ्र साभिलाषाः सुतान् प्रति॥ ५२ ॥
जो स्वयं भूख से पीड़ित होकर भी मोह के कारण अपने बच्चों की चोंच में दाना डालते हैं। हे नरश्रेष्ठ, मनुष्य भी संतान की कामना करते हैं,
लोभात्प्रत्युपकाराय नन्वेतान् किं न पश्यसि।तथापि ममतावर्त्ते मोहगर्ते निपातिताः॥ ५३ ॥
इस लोभ से कि वे बदले में उनका उपकार करेंगे; क्या तुम यह नहीं देखते? फिर भी लोग ममता के भँवर वाले मोह के गड्ढे में गिराए जाते हैं,
महामायाप्रभावेण संसारस्थितिकारिणा।तन्नात्र विस्मयः कार्यो योगनिद्रा जगत्पतेः॥ ५४ ॥
उन महामाया के प्रभाव से, जो संसार को बनाए रखती हैं। इसलिये इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। जगत के स्वामी भगवान विष्णु की जो योगनिद्रा है,
महामाया हरेश्चैषा तया सम्मोह्यते जगत्।ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा॥ ५५ ॥
वही हरि की महामाया है; उन्हीं से यह जगत मोहित होता है। वे भगवती देवी ज्ञानियों के चित्त को भी
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम्॥ ५६ ॥
बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं। वही इस सारे चर-अचर जगत की रचना करती हैं।
सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये।सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी॥ ५७ ॥
प्रसन्न होने पर वही मनुष्यों को मुक्ति का वर देती हैं। वही परम विद्या हैं, मुक्ति का कारण हैं और सनातन हैं,
संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी॥ ५८ ॥
और संसार के बन्धन का कारण भी वही हैं। वे सब ईश्वरों की भी ईश्वरी हैं।
राजोवाच(राजा बोले)॥ ५९ ॥
भगवन् का हि सा देवी महामायेति यां भवान्॥ ६० ॥
भगवन्! आप जिन्हें महामाया कहते हैं, वे देवी कौन हैं?
ब्रवीति कथमुत्पन्ना सा कर्मास्याश्च किं द्विज।यत्प्रभावा च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा॥ ६१ ॥
हे ब्राह्मण, वे कैसे प्रकट हुईं और उनके कर्म क्या हैं? उन देवी का प्रभाव क्या है, स्वरूप क्या है और उनका उद्भव कहाँ से हुआ,
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदां वर॥ ६२ ॥
हे ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ, यह सब मैं आपसे सुनना चाहता हूँ।
ऋषिरुवाच(मेधा ऋषि बोले)॥ ६३ ॥
नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततम्॥ ६४ ॥
वे देवी तो नित्य हैं, सारा जगत उन्हीं का रूप है और उन्हीं से यह सब व्याप्त है।
तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम।देवानां कार्यसिद्ध्यर्थमाविर्भवति सा यदा॥ ६५ ॥
फिर भी उनका प्रकट होना अनेक प्रकार से होता है, वह मुझसे सुनो। देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये जब वे प्रकट होती हैं,
उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते।योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते॥ ६६ ॥
तब नित्य होते हुए भी लोक में उन्हें 'उत्पन्न हुई' कहा जाता है। कल्प के अन्त में जब सारा जगत एक ही महासागर में डूबा था,
आस्तीर्य शेषमभजत्कल्पान्ते भगवान् प्रभुः।तदा द्वावसुरौ घोरौ विख्यातौ मधुकैटभौ॥ ६७ ॥
तब भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या बिछाकर योगनिद्रा में सो गए। उस समय मधु और कैटभ नाम के दो प्रसिद्ध और भयंकर असुर,
विष्णुकर्णमलोद्भूतौ हन्तुं ब्रह्माणमुद्यतौ।स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः॥ ६८ ॥
जो विष्णु के कानों के मैल से उत्पन्न हुए थे, ब्रह्मा जी को मारने को उद्यत हुए। विष्णु के नाभि-कमल में बैठे प्रजापति ब्रह्मा जी ने
दृष्ट्वा तावसुरौ चोग्रौ प्रसुप्तं च जनार्दनम्।तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयस्थितः॥ ६९ ॥
उन दोनों भयंकर असुरों को और सोए हुए जनार्दन को देखकर, एकाग्र मन से योगनिद्रा की स्तुति की,
विबोधनार्थाय हरेर्हरिनेत्रकृतालयाम्।विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम्॥ ७० ॥
भगवान हरि को जगाने के लिये। वे योगनिद्रा हरि के नेत्रों में निवास करती हैं, विश्व की ईश्वरी हैं, जगत को धारण करती हैं और उसका पालन व संहार करती हैं।
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः॥ ७१ ॥
तेजस्वी प्रभु ब्रह्मा जी विष्णु की उस अतुलनीय निद्रा-रूपिणी भगवती की स्तुति करने लगे।
ब्रह्मोवाच(ब्रह्मा जी बोले)॥ ७२ ॥
त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारःस्वरात्मिका॥ ७३ ॥
तुम्हीं स्वाहा हो, तुम्हीं स्वधा हो, तुम्हीं वषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारा ही रूप हैं।
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता।अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः॥ ७४ ॥
तुम्हीं जीवन देने वाली सुधा हो। नित्य अक्षर ॐ में तीन मात्राओं (अ, उ, म) के रूप में तुम्हीं हो, और उनके परे वह नित्य अर्धमात्रा भी तुम्हीं हो, जिसका अलग से उच्चारण नहीं हो सकता।
त्वमेव संध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा।त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत्॥ ७५ ॥
तुम्हीं संध्या, सावित्री और परम जननी हो। तुम्हीं इस विश्व को धारण करती हो और तुमसे ही यह जगत रचा जाता है।
त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा।विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने॥ ७६ ॥
हे देवि, तुमसे ही इसका पालन होता है और अन्त में तुम ही सदा इसे अपने में समेट लेती हो। रचना के समय तुम सृष्टि-रूप हो, पालन के समय स्थिति-रूप,
तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये।महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः॥ ७७ ॥
और हे जगन्मयी, इस जगत के अन्त में संहार-रूप हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा और महास्मृति हो,
महामोहा च भवती महादेवी महासुरी।प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी॥ ७८ ॥
महामोह-रूपा, महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं सबकी प्रकृति हो और सत्त्व, रज, तम तीनों गुणों को प्रकट करती हो।
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा।त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा॥ ७९ ॥
भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री हो, ईश्वरी हो, ह्री (संकोच) हो और बोध-रूपा बुद्धि हो।
लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च।खङ्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा॥ ८० ॥
लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड्ग, शूल, गदा और चक्र धारण करने वाली भयंकर देवी हो,
शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा।सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी॥ ८१ ॥
शंख, धनुष, बाण, भुशुण्डी और परिघ भी तुम्हारे आयुध हैं। तुम सौम्य हो, सौम्य से भी अधिक सौम्य हो, और सारी सुन्दर वस्तुओं से बढ़कर सुन्दर हो।
परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी।यच्च किंचित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके॥ ८२ ॥
ऊँचे और नीचे, सबसे परे परमेश्वरी तुम्हीं हो। हे सर्वात्मिके, जहाँ कहीं जो कुछ भी सत् या असत् वस्तु है,
तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा।यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत्॥ ८३ ॥
उस सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो; तब तुम्हारी स्तुति कैसे की जाए? जो भगवान जगत की रचना, पालन और संहार करते हैं, उन्हें भी जब तुमने
सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः।विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च॥ ८४ ॥
निद्रा के वश में कर दिया है, तो यहाँ तुम्हारी स्तुति करने में कौन समर्थ है? मुझे, भगवान शंकर को और विष्णु को भी
कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत्।सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता॥ ८५ ॥
तुम्हीं ने शरीर धारण कराया है, तो तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें हो सकती है? हे देवि, अपने उदार प्रभावों से इस प्रकार स्तुति की गई तुम
मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ।प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु॥ ८६ ॥
इन दोनों दुर्जय असुरों मधु और कैटभ को मोह में डाल दो, और जगत के स्वामी भगवान अच्युत को शीघ्र जगा दो।
बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ॥ ८७ ॥
और इन दोनों महान असुरों को मारने के लिये उन्हें सचेत कर दो।
ऋषिरुवाच(मेधा ऋषि बोले)॥ ८८ ॥
एवं स्तुता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा॥ ८९ ॥
ब्रह्मा जी के इस प्रकार स्तुति करने पर वे तामसी देवी (योगनिद्रा),
विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ।नेत्रास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः॥ ९० ॥
भगवान विष्णु को जगाने और मधु-कैटभ का नाश कराने के लिये, उनके नेत्रों, मुख, नासिका, भुजाओं, हृदय और वक्षःस्थल से
निर्गम्य दर्शने तस्थौ ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः।उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तया मुक्तो जनार्दनः॥ ९१ ॥
निकलकर अव्यक्त से जन्मे ब्रह्मा जी के सामने आ खड़ी हुईं। योगनिद्रा से मुक्त होते ही जगत के स्वामी भगवान जनार्दन उठ खड़े हुए।
एकार्णवेऽहिशयनात्ततः स ददृशे च तौ।मधुकैटभौ दुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमौ॥ ९२ ॥
तब एकार्णव में शेषनाग की शय्या से उठकर उन्होंने उन दोनों को देखा: दुरात्मा मधु और कैटभ, जो अत्यन्त बलवान और पराक्रमी थे,
क्रोधरक्तेक्षणावत्तुं ब्रह्माणं जनितोद्यमौ।समुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान् हरिः॥ ९३ ॥
और क्रोध से लाल आँखें किये ब्रह्मा जी को खा जाने को उद्यत थे। तब भगवान हरि ने उठकर उन दोनों से युद्ध किया।
पञ्चवर्षसहस्राणि बाहुप्रहरणो विभुः।तावप्यतिबलोन्मत्तौ महामायाविमोहितौ॥ ९४ ॥
सर्वव्यापी भगवान ने पाँच हज़ार वर्षों तक केवल भुजाओं से उनसे युद्ध किया। अपने अत्यधिक बल के घमण्ड में चूर और महामाया से मोहित वे दोनों,
उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो व्रियतामिति केशवम्॥ ९५ ॥
भगवान केशव से बोले: 'हम तुमसे प्रसन्न हैं, हमसे कोई वर माँग लो।'
श्रीभगवानुवाच(भगवान विष्णु बोले)॥ ९६ ॥
भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वध्यावुभावपि॥ ९७ ॥
यदि तुम दोनों मुझसे प्रसन्न हो, तो अब तुम दोनों मेरे हाथों मारे जाओ।
किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतं मम॥ ९८ ॥
किसी दूसरे वर से क्या लेना? मेरा माँगा हुआ वर तो बस इतना ही है।
ऋषिरुवाच(मेधा ऋषि बोले)॥ ९९ ॥
वञ्चिताभ्यामिति तदा सर्वमापोमयं जगत्॥ १०० ॥
इस प्रकार ठगे जाने पर उन दोनों असुरों ने देखा कि सारा जगत जल ही जल है,
विलोक्य ताभ्यां गदितो भगवान् कमलेक्षणः।आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता॥ १०१ ॥
तब उन्होंने कमलनयन भगवान से कहा: 'जहाँ पृथ्वी जल में डूबी न हो, वहीं हमें मारो।'
ऋषिरुवाच(मेधा ऋषि बोले)॥ १०२ ॥
तथेत्युक्त्वा भगवता शङ्खचक्रगदाभृता।कृत्वा चक्रेण वै च्छिन्ने जघने शिरसी तयोः॥ १०३ ॥
'तथास्तु' कहकर शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान ने उन दोनों के सिर अपनी जाँघ पर रखकर चक्र से काट डाले।
एवमेषा समुत्पन्ना ब्रह्मणा संस्तुता स्वयम्।प्रभावमस्या देव्यास्तु भूयः शृणु वदामि ते॥ ऐं ॐ॥ १०४ ॥
इस प्रकार ब्रह्मा जी की स्तुति करने पर ये देवी स्वयं प्रकट हुईं। अब इन देवी का प्रभाव फिर से सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ।
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्येमधुकैटभवधो नाम प्रथमोऽध्यायः॥ १॥उवाच १४, अर्धश्लोकाः २४, श्लोकाः ६६,एवमादितः॥ १०४॥