अहोई अष्टमी 2026: 1 नवम्बर को तारे शाम 6:00 बजे, पूजा मुहूर्त 5:36 से 6:54

अहोई अष्टमी का व्रत रविवार, 1 नवम्बर 2026 को है। पूजा का मुहूर्त शाम 5:36 से 6:54 तक है, और तारे शाम लगभग 6:00 बजे दिखने लगेंगे (नई दिल्ली)।
- व्रत
- रविवार, 1 नवम्बर 2026
- पूजा मुहूर्त
- शाम 5:36 से 6:54 तक
- तारे देखने का समय
- शाम 6:00 के आसपास
- चंद्रोदय
- रात 11:40
- अष्टमी तिथि
- 1 नवम्बर दोपहर 2:51 से 2 नवम्बर दोपहर 1:10 तक
व्रत 1 नवम्बर को ही क्यों
इस बार 1 नवम्बर की सुबह सप्तमी तिथि है और अष्टमी दोपहर 2:51 से शुरू होती है। अहोई माता की पूजा संध्या के समय होती है, इसलिए वही दिन लिया जाता है जिस दिन शाम को अष्टमी हो। 2 नवम्बर को अष्टमी दोपहर 1:10 पर ही समाप्त हो जाएगी और शाम को नवमी रहेगी, इसलिए व्रत 1 नवम्बर को ही रखा जाएगा। यह करवा चौथ के तीन दिन बाद और दिवाली से सात दिन पहले पड़ रहा है।
तारे या चांद: व्रत कब खोलें
अधिकतर परिवारों में अहोई अष्टमी का व्रत तारों को जल का अर्घ्य देकर खोला जाता है। इस बार यह परंपरा और भी सुविधाजनक है, क्योंकि चांद रात 11:40 पर देर से निकलेगा, जबकि तारे सूर्यास्त (5:36) के कुछ देर बाद, लगभग 6:00 बजे से दिखने लगेंगे। जिन परिवारों में चांद को अर्घ्य देने की परंपरा है, उन्हें इस बार रात 11:40 तक प्रतीक्षा करनी होगी।
अर्घ्य करवे या लोटे से दिया जाता है, जिसमें जल के साथ थोड़ा दूध और चावल डालते हैं। अनेक घरों में यह वही करवा होता है जो करवा चौथ पर इस्तेमाल हुआ था, और इसका जल दिवाली के दिन घर में छिड़का जाता है।
अहोई माता का चित्र और स्याहू माला
पूजा के लिए दीवार पर गेरू से अहोई माता का चित्र बनाया जाता है, जिसमें आठ कोने होते हैं, क्योंकि यह अष्टमी का व्रत है। साथ में स्याहू, यानी साही, और उसके बच्चों का चित्र भी बनाते हैं। आजकल बाज़ार में छपा हुआ कैलेंडर भी मिलता है, जिसे पूजा के स्थान पर लगाया जा सकता है।
पूजा में चांदी के छोटे मनकों वाली स्याहू माला भी पहनी जाती है। परंपरा है कि हर संतान के लिए एक मनका जोड़ा जाता है, और यह माला दिवाली तक पहनी जाती है। पूजा के बाद अहोई माता की कथा सुनी जाती है, जिसमें एक माता से अनजाने में स्याहू के बच्चे की मृत्यु हो जाती है और फिर क्षमा-याचना व व्रत से उसकी संतान की रक्षा होती है।
इसी रात राधा कुंड स्नान
अहोई अष्टमी की रात मथुरा के पास गोवर्धन में राधा कुंड में स्नान की परंपरा है। मान्यता है कि जो दंपती संतान की कामना से इस रात कुंड में स्नान करते हैं, उनकी मनोकामना राधा रानी की कृपा से पूरी होती है। इसलिए इस रात वहां बहुत भीड़ होती है; जाना हो तो पहले से योजना बनाएं।
आगे पढ़ें
आपके सवाल
क्या बेटियों के लिए भी यह व्रत रखा जाता है?
हां। परंपरा में यह व्रत पुत्रों के लिए माना जाता था, पर अब अधिकतर माताएं इसे अपनी सभी संतानों, बेटे और बेटी दोनों, की दीर्घायु और कुशलता के लिए रखती हैं।
क्या अहोई अष्टमी का व्रत निर्जला होता है?
अधिकतर परिवारों में यह करवा चौथ की तरह निर्जला रखा जाता है, सुबह से तारे दिखने तक। गर्भावस्था, बीमारी या दवाई लेने की स्थिति में जल या फलाहार के साथ व्रत रखा जा सकता है; अपने स्वास्थ्य को पहले रखें।
बादल हों और तारे न दिखें तो?
पंचांग के अनुसार शाम 6:00 के बाद, जब तारे निकल चुके हों, आकाश की ओर अर्घ्य देकर व्रत खोला जा सकता है। कई घरों में इस स्थिति में घर की बड़ी स्त्रियों की सलाह से व्रत खोला जाता है।
पहली बार व्रत रख रही हैं, तो क्या ध्यान रखें?
कई परिवारों में पहले अहोई व्रत पर सास को बायना, यानी मिठाई, मेवे और वस्त्र की थाली, दी जाती है और उनका आशीर्वाद लिया जाता है। स्याहू माला भी अक्सर पहली बार इसी दिन बनवाई जाती है।
तिथियां और समय द्रिक पंचांग व हमारे पंचांग से जांचे गए, नई दिल्ली के अनुसार।



