अध्याय १ · व्रत-विधान एवं पूजन
यह व्रत कार्तिक मास की कृष्ण-पक्ष अष्टमी के दिन किया जाता है। यह व्रत आरोग्यता-प्राप्ति एवं दीर्घजीवी संतान होने के निमित्त किया जाता है।
इस व्रत को दिनभर निराहार रहकर स्त्रियों द्वारा किया जाता है। रात्रि में चंद्रोदय होने के बाद दीवार पर बनी अहोई माता के चित्र के सामने एक लोटे में जल भरकर रख दें। चांदी की स्याहू की मूर्ति और दो गुड़िया रखकर उसे मौली में गूंथ लें। तत्पश्चात रोली, अक्षत से उनकी पूजा करें। पूजा करने के बाद दूध-भात, हलवा आदि का उन्हें नैवेद्य अर्पित करें।
तदन्त पहले से रखे जलपूर्ण पात्र से चंद्रमा को अर्घ्यदान करें। इसके अनन्तर हाथ में गेहूं के सात दाने रखकर अहोई माता की कथा सुनें। कथा श्रवण करने के बाद मौली में पिरोयी गयी अहोई माता को गले में पहन लें। अर्पित किये गये नैवेद्य को ब्राह्मण को दान कर दें। यदि ब्राह्मण न हो तो अपनी सास को ही दे दें। इसके अनन्तर स्वयं भोजन करें।
प्रत्येक संतानोत्पत्ति के पश्चात एक-एक अहोई माता की मूर्ति बनवाकर पूर्व के गूंथे हुए मौली में बढ़ाती जाएं। प्रत्येक पुत्र के विवाहोपरांत भी इसी प्रकार की क्रिया दुहराएं। जब भी गले से अहोई उतारने की आवश्यकता पड़े तो किसी शुभ दिन में उतारकर उन्हें गुड़ आदि का नैवेद्य देकर जल का आचमन कराकर रख दें। ऐसा करने से संतान में वृद्धि होती है। अहोई अष्टमी पूजन के बाद ब्राह्मण को कूष्मांड दान करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।
अध्याय २ · सेठ-सेठानी की कथा
किसी नगर में साहूकार रहता था। उसके सात पुत्र थे। एक दिन साहूकार की पत्नी खदान में से खोदकर मिट्टी लाने के लिए गयी। ज्यों ही उसने मिट्टी खोदने के लिए कुदाल चलाई, त्यों ही उसमें रह रहे स्याहू के बच्चे प्रहार से आहत होकर मृत हो गए। जब साहूकार की पत्नी ने स्याहू को रक्तरंजित देखा तो उसे बच्चों के मर जाने का अत्यधिक दुःख हुआ। परन्तु जो कुछ होना था वो हो चुका था। यह भूल उससे अनजाने में हो गयी थी। अतः दुःखी मन से वह घर लौट आई। पश्चात्ताप के कारण वह मिट्टी भी नहीं लाई।
इसके बाद स्याहू जब घर में आई तो उसने अपने बच्चों को मृतावस्था में पाया। वह दुःख से कातर होकर अत्यन्त विलाप करने लगी। उसने ईश्वर से प्रार्थना की कि, जिसने मेरे बच्चों को मारा है उसे भी वैसा ही शोक-दुःख भुगतना पड़े। इधर स्याहू के शाप से एक वर्ष के अन्दर ही सेठानी के सातों पुत्र काल-कवलित हो गए। इस प्रकार की दुःखद घटना देखकर सेठ-सेठानी अत्यन्त शोकाकुल हो उठे।
उस दंपति ने किसी तीर्थ स्थान पर जाकर अपने प्राणों का विसर्जन कर देने का मन में संकल्प कर लिया। मन में ऐसा निश्चय कर सेठ-सेठानी घर से पैदल ही तीर्थ की ओर चल पड़े। जब तक उनका शरीर पूर्ण रूप से अशक्त नहीं हो गया, तब तक वे बराबर आगे बढ़ते रहे। जब वे चलने में बिल्कुल असमर्थ हो गये, तो रास्ते में ही मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। उन दोनों की इस दयनीय दशा को देखकर करुणानिधि भगवान् उन पर दयार्द्र हो गये और आकाशवाणी की, 'हे सेठ! तेरी सेठानी ने मिट्टी खोदते समय अनजाने में ही स्याहू के बच्चों को मार डाला था। इसलिए तुझे भी अपने बच्चों का कष्ट सहना पड़ा।
भगवान ने आज्ञा दी, अब तुम दोनों अपने घर जाकर गाय की सेवा करो और अहोई अष्टमी आने पर विधि-विधान पूर्वक प्रेम से अहोई माता की पूजा करो। सभी जीवों पर दया भाव रखो, किसी को अहित न करो। यदि तुम मेरे कहने के अनुसार आचरण करोगे, तो तुम्हें संतान सुख प्राप्त हो जायेगा। इस आकाशवाणी को सुनकर सेठ-सेठानी को कुछ धैर्य हुआ और वे दोनों भगवती का स्मरण करते हुए अपने घर को प्रस्थान किये।
घर पहुंचकर उन दोनों ने आकाशवाणी के अनुसार कार्य करना प्रारम्भ कर दिया। इसके साथ ईर्ष्या-द्वेष की भावना से रहित होकर सभी प्राणियों पर करुणा का भाव रखना प्रारम्भ कर दिया। भगवत्-कृपा से सेठ-सेठानी पुनः पुत्रवान् होकर सभी सुखों का भोग करने लगे और अन्तकाल में स्वर्गगामी हुए।
अध्याय ३ · साहूकार की बहू की कथा
एक साहूकार के सात बेटे, सात बहुएं एवं एक कन्या थी। उसकी बहुएं कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई माता के पूजन के लिए जंगल में अपनी ननद के साथ मिट्टी लेने के लिए गयीं। मिट्टी निकालने के स्थान पर ही एक स्याहू की मांद थी। मिट्टी खोदते समय ननद के हाथ से स्याहू का बच्चा चोट खाकर मर गया। स्याहू की माता बोली, 'अब मैं तेरी कोख बांधूंगी', अर्थात अब तुझे मैं संतान-विहीन कर दूंगी। उसकी बात सुनकर ननद ने अपनी सभी भाभियों से अपने बदले में कोख बंधवा लेने के लिए आग्रह किया, परन्तु उसकी सभी भाभियों ने उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। परन्तु उसकी छोटी भाभी ने कुछ सोच-समझकर अपनी कोख बंधवाने की स्वीकृति ननद को दे दी।
तदन्तर उस भाभी को, जो भी संतान होती, वे सात दिन के बाद ही मर जातीं। एक दिन पंडित को बुलाकर इस बात का पता लगाया गया। पंडित ने कहा: तुम काली गाय की पूजा किया करो, काली गाय रिश्ते में स्याहू की बहन लगती है। वह यदि तेरी कोख छोड़ दे तो बच्चे जीवित रह सकते हैं। पंडित की बात सुनकर छोटी बहू ने दूसरे दिन से ही काली गाय की सेवा करना प्रारम्भ कर दिया। वह प्रतिदिन सुबह-सवेरे उठकर गाय का गोबर आदि साफ कर देती।
गाय ने अपने मन में सोचा कि, यह कार्य कौन कर रहा है, इसका पता लगाऊंगी। दूसरे दिन गाय माता तड़के उठकर क्या देखती है कि उस स्थान पर साहूकार की एक बहू झाड़ू-बुहारी करके सफाई कर रही है। गौ माता ने उस बहू से पूछा कि तू किस लिए मेरी इतनी सेवा कर रही है, और वह उससे क्या चाहती है? जो कुछ तेरी इच्छा हो वह मुझसे मांग ले। साहूकार की बहू ने कहा: स्याहू माता ने मेरी कोख बांध दी है जिससे मेरे बच्चे नहीं बचते हैं। यदि आप मेरी कोख खुलवा दें तो मैं आपका बहुत उपकार मानूंगी। गौ माता ने उसकी बात मान ली और उसे साथ लेकर सात समुद्र पार स्याहू माता के पास ले चली। रास्ते में कड़ी धूप से व्याकुल होकर दोनों एक पेड़ की छाया में बैठ गयीं।
जिस पेड़ के नीचे वह दोनों बैठी थीं, उस पेड़ पर गरुड़ पक्षी का एक बच्चा रहता था। थोड़ी देर में ही एक सांप आकर उस बच्चे को मारने लगा। इस दृश्य को देखकर साहूकार की बहू ने उस सांप को मारकर एक डाल के नीचे छिपा दिया और उस गरुड़ के बच्चे को मरने से बचा लिया। इसके पश्चात् उस पक्षी की मां ने वहां रक्त पड़ा देखकर साहूकार की बहू को चोंच से मारने लगी। तब साहूकार की बहू ने कहा: मैंने तेरे बच्चे को नहीं मारा है। तेरे बच्चे को डसने के लिए एक सांप आया था, मैंने उसे मारकर तेरे बच्चे की रक्षा की है। मरा हुआ सांप डाल के नीचे दबा हुआ है। बहू की बातों से वह प्रसन्न हो गयी और बोली: तू जो कुछ चाहती है मुझसे मांग ले। बहू ने उससे कहा: सात समुद्र पार स्याहू माता रहती है, तू मुझे उस पार पहुंचा दे। तब उस गरुड़ पंखिनी ने उन दोनों को अपनी पीठ पर बिठाकर समुद्र के उस पार स्याहू माता के पास पहुंचा दिया।
स्याहू माता उन्हें देखकर बोली: आ बहिन, बहुत दिनों बाद आयी है। वह पुनः बोली, मेरे सिर में जूं पड़ गयी है, तू उसे निकाल दे। उस काली गाय के कहने पर साहूकार की बहू ने सलाई से स्याहू माता की सारी जूंओं को निकाल दिया। इस पर स्याहू माता अत्यन्त खुश हो गयीं। स्याहू माता ने उस साहूकार की बहू से कहा: तेरे सात बेटे और सात बहुएं हों। सुनकर साहूकार की बहू ने कहा: मुझे तो एक भी बेटा नहीं है, सात कहां से होंगे। स्याहू माता ने पूछा: इसका कारण क्या है? उसने कहा यदि आप वचन दें तो इसका कारण बता सकती हूं। स्याहू माता ने उसे वचन दे दिया। वचनबद्ध करा लेने के बाद साहूकार की बहू ने कहा: मेरी कोख तुम्हारे पास बंद पड़ी है, उसे खोल दें।
स्याहू माता ने कहा: मैं तेरी बातों में आकर धोखा खा गयी। अब मुझे तेरी कोख खोलनी पड़ेगी। इतना कहने के साथ ही स्याहू माता ने कहा: अब तू घर जा, तेरे सात बेटे और सात बहुएं होंगी। घर जाने पर तू अहोई माता का उद्यापन करना, सात-सात अहोई बनाकर सात कड़ाही देना। उसने घर लौटकर देखा तो उसके सात बेटे और सात बहुएं बैठी हुई मिलीं। वह खुशी के मारे भाव-विभोर हो गयी। उसने सात अहोई बनाकर सात कड़ाही देकर उद्यापन किया। इसके बाद ही दीपावली आया।
उसकी जेठानियां परस्पर कहने लगीं, सब लोग पूजा का कार्य शीघ्र पूरा कर लो, कहीं ऐसा न हो कि छोटी बहू अपने बच्चों का स्मरण कर रोना-धोना न शुरू कर दे, नहीं तो रंग में भंग हो जायेगा। जानकारी करने के लिए उन्होंने अपने बच्चों को छोटी बहू के घर भेजा, क्योंकि छोटी बहू रुदन नहीं कर रही थी। बच्चों ने घर जाकर बताया कि वह वहां आटा गूंथ रही है और उद्यापन का कार्यक्रम चल रहा है। इतना सुनते ही सभी जेठानियां आकर उससे पूछने लगीं कि, तूने अपनी कोख कैसे खुलवायी। उसने कहा: स्याहू माता ने कृपा कर उसकी कोख खोल दी। सब लोग अहोई माता की जय-जयकार करने लगे। जिस तरह अहोई माता ने उस साहूकार की बहू की कोख को खोल दिया, उसी प्रकार इस व्रत को करने वाली सभी नारियों की अभिलाषा पूर्ण करें।
अहोई अष्टमी व्रत कथा पाठ विधि
दिनभर निराहार व्रत रखकर संध्या समय दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाएं, चांदी की स्याहू व दो गुड़ियों की मूर्ति मौली में गूंथकर पूजा करें। चंद्रोदय पर हाथ में गेहूं के सात दाने रखकर कथा सुनें, चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें, तथा अहोई माता की मौली गले में धारण करें। पूर्ण विधि इस पृष्ठ के पहले अध्याय में विस्तार से दी गई है।
अहोई अष्टमी व्रत कथा के बारे में
अहोई अष्टमी व्रत कथा माताओं द्वारा अपनी संतान के कल्याण हेतु रखे जाने वाले इस व्रत की दो कथाओं का संग्रह है। पहले अध्याय में व्रत की विधि व पूजन दिया गया है, दूसरे अध्याय में उस सेठ-सेठानी की कथा है जिनके पुत्र स्याहू के शाप से काल-कवलित हो गए थे, तथा तीसरे अध्याय में उस साहूकार की बहू की कथा है जो अपनी बंधी हुई कोख खुलवाने सात समुद्र पार स्याहू माता के पास पहुंची थी।
यह व्रत मुख्यतः उत्तर भारत में माताओं द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु व कल्याण की कामना से किया जाता है। इस पृष्ठ पर तीनों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
अहोई अष्टमी व्रत कथा का कोई एक नामित रचयिता नहीं है। भारत में इस व्रत की एक और कथा भी प्रचलित है, जो वृंदावन के राधाकुंड से जुड़ी हुई है, जो इस पृष्ठ पर सम्मिलित नहीं है। यहां प्रस्तुत दोनों कथाएं, सेठ-सेठानी की कथा तथा साहूकार की बहू की कथा, एक ही प्रकाशित हिंदी व्रत-कथा संग्रह पुस्तिका में एक साथ छपी हैं, जिनका यथावत रूपांतरण यहां दिया गया है, जिसमें केवल स्पष्ट मुद्रण-त्रुटियां सुधारी गई हैं, कथाओं में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। अन्य मुद्रित संस्करणों में शब्दों का हेरफेर मिल सकता है।
सामान्य प्रश्न
अहोई अष्टमी व्रत कथा में कुल कितने अध्याय हैं?
इसमें कुल तीन अध्याय हैं, व्रत-विधान एवं पूजन, सेठ-सेठानी की कथा, तथा साहूकार की बहू की कथा, जो सब एक साथ पूर्ण पाठ के रूप में पढ़े या सुने जाते हैं।
अहोई अष्टमी कब मनाई जाती है?
यह व्रत प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को मनाया जाता है, जो करवा चौथ के चार दिन पश्चात आती है।
क्या अहोई अष्टमी की केवल एक ही कथा प्रचलित है?
नहीं, इस पृष्ठ पर दी गई दो कथाओं के अतिरिक्त, वृंदावन के राधाकुंड से जुड़ी एक और कथा भी भारत में प्रचलित है, जो इस पृष्ठ पर सम्मिलित नहीं है।
कूष्मांड दान का क्या महत्व है?
व्रत-विधान के अनुसार, अहोई अष्टमी पूजन के पश्चात ब्राह्मण को कूष्मांड (सफेद कद्दू) दान करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है, ऐसा इस कथा में बताया गया है।
