यह व्रत करवा चौथ के तीन-चार दिन पश्चात तथा दिवाली से लगभग एक सप्ताह पूर्व आता है। 2026 में व्रत रविवार, 1 नवम्बर को है: पूजा का मुहूर्त संध्या 5:36 से 6:54 तक, तारे लगभग 6:00 बजे और चंद्रोदय रात 11:40 पर (नई दिल्ली)।
अहोई अष्टमी का महत्व
कथा के अनुसार, एक साहूकार की पत्नी मिट्टी लाने खदान में गई। मिट्टी खोदते समय अनजाने में उसकी कुदाल से वहां रह रहे स्याहू (साही) के बच्चे मर गए। दुखी स्याहू के शाप से एक वर्ष के भीतर साहूकार के सातों पुत्रों की मृत्यु हो गई, और शोक में डूबे सेठ-सेठानी तीर्थ पर जाकर प्राण त्यागने निकल पड़े।
रास्ते में थककर गिर पड़े दंपति को आकाशवाणी ने बताया कि यह स्याहू के बच्चों की मृत्यु का फल है, और उन्हें घर लौटकर गाय की सेवा करने, सब जीवों पर दया रखने और अहोई अष्टमी पर विधि से अहोई माता की पूजा करने को कहा। ऐसा करने पर उन्हें फिर से संतान का सुख मिला, और तभी से माताएं संतान की रक्षा व दीर्घायु के लिए यह व्रत रखती हैं।
माता अहोई को देवी पार्वती का ही एक स्वरूप माना जाता है, जो विशेष रूप से संतान के कल्याण, दीर्घायु व सुरक्षा की देवी के रूप में पूजी जाती हैं। यह व्रत करवा चौथ के तीन-चार दिन पश्चात तथा दिवाली से लगभग एक सप्ताह पूर्व आता है, तथा उत्तर भारत में विशेष रूप से प्रचलित है।
अहोई अष्टमी कैसे मनाई जाती है
माताएं प्रातःकाल स्नान कर निर्जला व्रत आरंभ करती हैं। दीवार पर गेरू व पीली मिट्टी से माता अहोई तथा स्याहू व उसके बच्चों का चित्र बनाया जाता है, अथवा छपा हुआ चित्र प्रयोग किया जाता है।
संध्या समय पूजा कर अहोई माता की कथा सुनी जाती है, तथा चांदी की मनकों वाली 'अहोई' नामक माला धारण की जाती है। तारों के दिखाई देने पर उन्हें जल का अर्घ्य देकर ही व्रत का पारण किया जाता है।
कुछ स्थानों पर माताएं तारों के बजाय चंद्रमा को देखकर भी व्रत का पारण करती हैं, यह इस पर निर्भर करता है कि उस दिन चंद्रोदय कब होता है। पूजा के पश्चात परिवार सहित भोजन ग्रहण किया जाता है।
ब्रज में इसी रात मथुरा के पास राधाकुंड में स्नान की परंपरा है। मान्यता है कि अहोई अष्टमी की मध्यरात्रि को राधाकुंड में स्नान करने वाले निःसंतान दंपति को संतान का आशीर्वाद मिलता है, इसलिए इस रात वहां हज़ारों श्रद्धालु पहुंचते हैं।
अहोई अष्टमी पूजा विधि
प्रातःकाल स्नान कर निर्जला व्रत आरंभ करें। दीवार पर माता अहोई व स्याहू के बच्चों का चित्र बनाएं अथवा छपा हुआ चित्र लगाएं। संध्या समय पूजा कर अहोई माता की कथा सुनें, तथा तारे अथवा चंद्रमा दिखाई देने पर जल का अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें।
अहोई अष्टमी के बारे में
अहोई अष्टमी कार्तिक मास की कृष्ण अष्टमी को माताओं द्वारा अपनी संतान के कल्याण हेतु रखा जाने वाला व्रत है। इस पृष्ठ पर इस व्रत का महत्व, माता अहोई व स्याहू की कथा, तथा तारों को अर्घ्य देने की परंपरा की जानकारी दी गई है।
सामान्य प्रश्न
अहोई अष्टमी कब मनाई जाती है?
अहोई अष्टमी प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास की कृष्ण अष्टमी तिथि को, करवा चौथ के तीन-चार दिन पश्चात मनाई जाती है।
2026 में अहोई अष्टमी पर तारे कितने बजे दिखेंगे?
2026 में अहोई अष्टमी रविवार, 1 नवम्बर को है। तारे संध्या लगभग 6:00 बजे दिखने लगेंगे, और पूजा का मुहूर्त 5:36 से 6:54 तक है। जो माताएं चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं, उनके लिए चंद्रोदय रात 11:40 पर है (नई दिल्ली)। अष्टमी तिथि 1 नवम्बर दोपहर 2:51 से 2 नवम्बर दोपहर 1:10 तक है।
अहोई अष्टमी व्रत का पारण कब किया जाता है?
यह व्रत संध्या समय तारों के दिखाई देने पर उन्हें जल का अर्घ्य देकर पारण किया जाता है, कुछ स्थानों पर चंद्रोदय पर भी पारण किया जाता है।
माता अहोई कौन हैं?
माता अहोई देवी पार्वती का ही एक स्वरूप मानी जाती हैं, जिन्हें संतान के कल्याण, दीर्घायु व सुरक्षा की देवी के रूप में पूजा जाता है।
अहोई माला क्या है?
अहोई माला (स्याहू माला) मौली में पिरोई चांदी की स्याहू और मनकों की माला है, जिसे माताएं पूजा के बाद धारण करती हैं। परंपरा है कि हर संतान के जन्म पर, और पुत्र के विवाह पर भी, इसमें एक नया मनका या अहोई जोड़ा जाता है।
