वैकुंठ चतुर्दशी व्रत कथा
वैकुंठ चतुर्दशी कार्तिक मास की शुक्ल चतुर्दशी को मनाई जाती है, जिस दिन भगवान विष्णु व भगवान शिव के मिलन की कथा सुनी-सुनाई जाती है, तथा इस व्रत को करने से वैकुंठ धाम की प्राप्ति का वरदान माना जाता है। पूर्ण पाठ यहां उपलब्ध है।

अध्याय १ · नारद जी का प्रश्न एवं वैकुंठ के द्वार खुलने का वचन
एक बार देवर्षि नारद पृथ्वी लोक का भ्रमण कर वैकुंठ धाम पहुंचे। भगवान विष्णु ने उन्हें बड़े आदर से आसन दिया और प्रसन्नतापूर्वक उनके आगमन का प्रयोजन पूछा। नारद जी बोले: हे प्रभु, आपका एक नाम कृपानिधान है, किंतु मुक्ति तो अब तक केवल आपके विशिष्ट भक्तों को ही मिलती दिखाई देती है, सामान्य स्त्री-पुरुष इससे प्रायः वंचित रह जाते हैं। कृपा कर कोई ऐसा सुगम उपाय बताइए, जिससे साधारण भक्त भी सहज ही आपकी शरण पा सकें।
भगवान विष्णु ने मुस्कराकर कहा: हे नारद, कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को जो भी स्त्री-पुरुष व्रत रखकर श्रद्धा-भक्ति से मेरा पूजन करेंगे, उनके लिए वैकुंठ के द्वार स्वयं खुल जाएंगे। यह कहकर उन्होंने अपने द्वारपाल जय व विजय को बुलाया और आदेश दिया कि इस चतुर्दशी को वैकुंठ का द्वार खुला रखा जाए, जिससे जो भी भक्त उस दिन थोड़ा भी नाम-स्मरण या पूजन कर ले, वह सीधे वैकुंठ धाम को प्राप्त हो सके। इसी वचन के कारण कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी 'वैकुंठ चतुर्दशी' के नाम से जानी जाने लगी।
अध्याय २ · काशी में भगवान विष्णु का शिव-पूजन एवं सुदर्शन चक्र की प्राप्ति
एक अन्य कथा के अनुसार भगवान विष्णु स्वयं देवाधिदेव महादेव का पूजन करने काशी पधारे। मणिकर्णिका घाट पर स्नान कर उन्होंने एक सहस्र स्वर्ण-कमलों से भगवान विश्वनाथ की आराधना का संकल्प लिया। किंतु उनकी भक्ति परखने हेतु शिवजी ने संकल्प के समय ही चुपके से एक कमल कम कर दिया। पूजन करते-करते जब विष्णु जी को एक पुष्प की कमी का आभास हुआ, तो उन्हें स्मरण हुआ कि उन्हें स्वयं 'कमलनयन' व 'पुंडरीकाक्ष' कहा जाता है, अर्थात उनके नेत्र भी कमल के समान हैं। बिना क्षण भर विलंब किए उन्होंने अपना एक नेत्र निकालकर शिवलिंग पर अर्पित करने का उपक्रम किया।
पुत्र-समान भक्त की इस असीम निष्ठा को देख भगवान शिव तुरंत प्रकट हो गए और उनका हाथ थाम लिया। उन्होंने कहा: हे विष्णु, तुम्हारे समान भक्त इस संसार में दूसरा कोई नहीं। आज की यह कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी अब से 'वैकुंठ चतुर्दशी' के नाम से पूजी जाएगी, और जो भी इस दिन व्रतपूर्वक सबसे पहले तुम्हारा पूजन करेगा, उसे वैकुंठ लोक की प्राप्ति निश्चित होगी। यही वह अवसर भी था जब भगवान शिव ने करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु को प्रदान किया। इसी कारण इस पर्व को हरि-हर मिलन का पर्व भी कहा जाता है, तथा शिव व विष्णु दोनों ने वचन दिया कि इस दिन स्वर्ग के द्वार खुले रहेंगे, और मृत्युलोक में रहने वाला जो भी व्यक्ति यह व्रत करेगा, उसका स्थान वैकुंठ धाम में सुनिश्चित होगा।
अध्याय ३ · धनेश्वर ब्राह्मण की मुक्ति
वैकुंठ चतुर्दशी की महिमा दर्शाने वाली एक तीसरी कथा भी प्रचलित है। धनेश्वर नामक एक ब्राह्मण था, जो जीवनभर अनेक पाप करता रहा। एक दिन, संयोगवश वैकुंठ चतुर्दशी के ही दिन, वह गोदावरी नदी में स्नान करने गया। उस दिन अनेक श्रद्धालु भक्तगण पूजा-अर्चना कर गोदावरी के घाट पर स्नान हेतु एकत्रित थे, और धनेश्वर भी संयोगवश उसी भीड़ में सम्मिलित हो गया। भक्तों के उस पुण्य-स्पर्श मात्र से धनेश्वर को भी अनायास ही कुछ पुण्य प्राप्त हो गया।
समय आने पर जब धनेश्वर की मृत्यु हुई, तो यमदूत उसे लेकर नरक की ओर चले। तभी भगवान विष्णु ने कहा: यद्यपि यह व्यक्ति महापापी रहा है, तथापि इसने वैकुंठ चतुर्दशी के दिन गोदावरी में स्नान किया था, और उस दिन वहां उपस्थित श्रद्धालु भक्तों के पुण्य-प्रभाव से इसके समस्त पाप नष्ट हो चुके हैं, अतः इसे नरक नहीं, वैकुंठ धाम प्राप्त होगा। इस प्रकार धनेश्वर को भी, बिना किसी विशेष साधना के, केवल वैकुंठ चतुर्दशी की महिमा और सत्संग के प्रभाव से मुक्ति मिल गई। यही कारण है कि इस दिन को पापनाशक व मोक्षदायी दोनों माना जाता है।
वैकुंठ चतुर्दशी व्रत कथा पाठ विधि
वैकुंठ चतुर्दशी को प्रातःकाल किसी पवित्र नदी में अथवा घर पर ही स्नान कर दिनभर व्रत रखें। भगवान विष्णु व भगवान शिव दोनों का पूजन करें, तथा रात्रि में जागरण करते हुए कथा-कीर्तन करें। मध्यरात्रि के आसपास भगवान का विशेष पूजन इस व्रत का सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाग माना जाता है। अगले दिन प्रातः स्नान व दान करके व्रत का पारण करें।
वैकुंठ चतुर्दशी व्रत कथा के बारे में
वैकुंठ चतुर्दशी व्रत कथा तीन अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में नारदजी के प्रश्न पर भगवान विष्णु वैकुंठ के द्वार खुलने का वरदान देते हैं। दूसरे अध्याय में भगवान विष्णु की काशी में शिव-आराधना तथा सुदर्शन चक्र की प्राप्ति की कथा है, जिसे हरि-हर मिलन भी कहा जाता है। तीसरे अध्याय में धनेश्वर नामक ब्राह्मण की मुक्ति की कथा दी गई है।
यह व्रत कार्तिक मास की शुक्ल चतुर्दशी को रखा जाता है, तथा इसे करने से वैकुंठ धाम की प्राप्ति का वरदान माना जाता है। इस पृष्ठ पर तीनों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
वैकुंठ चतुर्दशी व्रत कथा का कोई नामित रचयिता नहीं है। इसके संबंध में पुराणों की परंपरा में मुख्यतः तीन कथाएं प्रचलित हैं, नारदजी के प्रश्न पर वैकुंठ के द्वार खुलने का वरदान, काशी में भगवान विष्णु के शिव-पूजन व सुदर्शन चक्र की प्राप्ति की कथा, तथा धनेश्वर ब्राह्मण की मुक्ति की कथा, जो हिंदी की अनेक धार्मिक वेबसाइटों पर सुनी-सुनाई जाती हैं। इस विषय पर कोई प्राचीन मुद्रित पुस्तिका उपलब्ध नहीं मिली, इसलिए यहां दी गई कथा इन्हीं प्रचलित वृत्तांतों की घटनाओं, पात्रों व क्रम के अनुरूप है, किंतु इसका शब्दांकन मौलिक रूप से किया गया है, ताकि यह किसी एक वेबसाइट या प्रकाशन के पाठ की अविकल प्रतिलिपि न बने।
सामान्य प्रश्न
वैकुंठ चतुर्दशी कब मनाई जाती है?
यह कार्तिक मास की शुक्ल चतुर्दशी को मनाई जाती है, जो देवउठनी एकादशी के कुछ दिन पश्चात आती है।
वैकुंठ चतुर्दशी व्रत कथा में कुल कितने अध्याय हैं?
इसमें कुल तीन अध्याय हैं, जो एक साथ पूर्ण पाठ के रूप में पढ़े या सुने जाते हैं।
वैकुंठ चतुर्दशी को हरि-हर मिलन का पर्व क्यों कहा जाता है?
जैसा कथा के दूसरे अध्याय में बताया गया है, इसी दिन काशी में भगवान विष्णु के शिव-पूजन से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें सुदर्शन चक्र प्रदान किया था, इसीलिए इसे विष्णु (हरि) व शिव (हर) के मिलन का पर्व भी कहा जाता है।
वैकुंठ चतुर्दशी को क्या फल मिलता है?
मान्यता है कि इस दिन व्रत रखकर श्रद्धा-भक्ति से भगवान विष्णु व शिव का पूजन करने वालों के लिए वैकुंठ के द्वार खुले रहते हैं, तथा उन्हें वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।
वैकुंठ चतुर्दशी को क्या करना चाहिए?
जैसा व्रत विधि में बताया गया है, इस दिन स्नान कर व्रत रखें, भगवान विष्णु व शिव दोनों का पूजन करें, रात्रि में जागरण व कथा-कीर्तन करें, तथा अगले दिन स्नान-दान के पश्चात व्रत का पारण करें।