श्याम बाबा वरदान कथा
श्याम बाबा वरदान कथा वह कथा है, जिसमें अपना शीश दान करने वाले बर्बरीक के शीश ने पहाड़ी से अठारह दिनों तक संपूर्ण महाभारत युद्ध का अवलोकन किया, तथा युद्धोपरांत पांडवों के विजय-श्रेय संबंधी विवाद में निष्पक्ष सत्य कहकर भगवान श्रीकृष्ण से कलियुग में 'श्याम' नाम से पूजित होने तथा 'हारे का सहारा' कहलाने का वरदान प्राप्त किया।

अध्याय १ · पहाड़ी से अठारह दिनों तक युद्ध का अवलोकन
बर्बरीक ने ब्राह्मण-वेशधारी भगवान श्रीकृष्ण को पहचानकर उन्हें अपना शीश दान कर दिया था, इस दान की पूर्ण कथा इसी साइट के एक पृथक पृष्ठ पर दी गई है। इस महादान से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को यह वरदान दिया कि उनका शीश कटने के पश्चात भी जीवित व सचेत रहेगा, तथा वे संपूर्ण अठारह दिवसीय महाभारत युद्ध को अंत तक देख सकेंगे। श्रीकृष्ण ने उस शीश को कुरुक्षेत्र के समीप एक ऊंची पहाड़ी पर सम्मानपूर्वक स्थापित करवा दिया, जहां से युद्धभूमि का संपूर्ण दृश्य स्पष्ट दिखाई देता था।
बर्बरीक शीश दान कथा पढ़ें →अठारह दिनों तक बर्बरीक का शीश उस पहाड़ी से युद्ध का प्रत्येक क्षण देखता रहा, भीष्म पितामह का प्रतिरोध, द्रोणाचार्य व कर्ण का पराक्रम, तथा अर्जुन व भीम के भीषण संहार, सब कुछ उसकी दृष्टि के समक्ष घटित हुआ। किंतु प्रत्येक दिन के अंत में, प्रत्येक निर्णायक क्षण में, बर्बरीक ने यही देखा कि युद्ध की वास्तविक दिशा किसी योद्धा की निजी वीरता से नहीं, अपितु भगवान श्रीकृष्ण की नीति, संकल्प व अदृश्य दिव्य शक्ति से ही तय हो रही थी।
अध्याय २ · पांडवों का विवाद, और वरदान की प्राप्ति
युद्ध समाप्त होने के पश्चात एक दिन पांडव भाइयों के बीच यह विवाद छिड़ गया कि विजय का वास्तविक श्रेय किसे मिलना चाहिए। भीम अपनी गदा के पराक्रम को श्रेय देते, तो अर्जुन अपने गांडीव धनुष की महिमा बताते, तथा प्रत्येक भाई अपने-अपने योगदान को ही युद्ध का निर्णायक कारण मानता। जब यह विवाद सुलझ न सका, तो भगवान श्रीकृष्ण ने सुझाव दिया कि इसका सर्वाधिक निष्पक्ष उत्तर तो वही दे सकता है, जिसने संपूर्ण युद्ध को आदि से अंत तक बिना किसी पक्षपात के देखा है, अर्थात बर्बरीक का शीश।
जब बर्बरीक के शीश से पूछा गया, तो उसने निर्भीकता से सत्य कह दिया, 'मैंने संपूर्ण युद्धभूमि में केवल एक ही शक्ति को सर्वत्र कार्य करते देखा, वह थी भगवान श्रीकृष्ण की सुदर्शन-शक्ति व उनका संकल्प। किसी भी योद्धा का निजी बल इस विजय का कारण नहीं था, यह सब कुछ श्रीकृष्ण की ही इच्छा व नीति से घटित हुआ।' इस निष्पक्ष उत्तर को सुनकर समस्त पांडवों का अहंकार शांत हो गया।
बर्बरीक के इस निर्भीक व निष्पक्ष सत्य-कथन तथा उनके पूर्व के महादान से अत्यंत प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि कलियुग में वे स्वयं श्रीकृष्ण के ही नाम, 'श्याम', से पूजे जाएंगे। उन्होंने यह भी स्मरण कराया कि बर्बरीक ने सदैव निर्बल व हारने वाले पक्ष का साथ देने का वचन निभाया था, अतः जो भी सच्चे मन से उनकी शरण में आएगा, चाहे वह जीवन में कितना भी हारा व निराश क्यों न हो, उसकी सहायता अवश्य होगी। इसी वरदान के कारण वे आज 'श्याम बाबा' व 'हारे का सहारा' के नाम से पूजे जाते हैं, तथा शताब्दियों पश्चात उनका यही शीश राजस्थान के खाटू ग्राम में पुनः प्रकट होकर आज के भव्य मंदिर के रूप में स्थापित हुआ।
खाटू श्याम प्राकट्य कथा पढ़ें →श्याम बाबा वरदान कथा पाठ विधि
एकादशी अथवा मंगलवार को प्रातः स्नान कर श्याम बाबा का ध्यान करें, दीप जलाकर खाटू श्याम चालीसा व आरती का पाठ करें। जो भी भक्त जीवन में निराश अथवा हारा हुआ अनुभव करे, उसे विशेष रूप से श्रद्धापूर्वक इस कथा का श्रवण करना चाहिए।
श्याम बाबा वरदान कथा के बारे में
यह कथा दो अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में बर्बरीक के शीश को पहाड़ी पर स्थापित कर अठारह दिनों तक युद्ध देखने की कथा है। दूसरे अध्याय में पांडवों के विजय-श्रेय विवाद, बर्बरीक के निष्पक्ष उत्तर तथा भगवान श्रीकृष्ण से प्राप्त वरदान का वर्णन है।
यह कथा खाटू श्याम जी अर्थात बर्बरीक से जुड़ी तीन-भाग की कथा-शृंखला का समापन-भाग है। इस पृष्ठ पर दोनों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
महाभारत से जुड़ी लोक-परंपरा के बारे में
श्याम बाबा वरदान कथा का कोई एक प्रामाणिक मुद्रित 'कथा-पाठ' नहीं है, यह महाभारत से जुड़ी मध्यकालीन लोक-परंपरा है, जिसका शब्दांकन यहां मौलिक रूप से किया गया है। यह पृष्ठ खाटू श्याम जी से जुड़ी तीन-भाग की कथा-शृंखला का अंतिम भाग है, शीश दान की पूर्ण कथा 'बर्बरीक शीश दान कथा' में, तथा शताब्दियों पश्चात खाटू ग्राम में इसी शीश के प्रकट होने व मंदिर-स्थापना की कथा 'खाटू श्याम प्राकट्य कथा' में दी गई है, अतः यहां केवल शीश दान के पश्चात से लेकर वरदान प्राप्ति तक की घटनाएं ही दी गई हैं।
सामान्य प्रश्न
बर्बरीक के शीश ने युद्ध कहां से देखा?
भगवान श्रीकृष्ण ने उनके शीश को कुरुक्षेत्र के समीप एक ऊंची पहाड़ी पर स्थापित करवाया था, जहां से उसने अठारह दिनों तक संपूर्ण युद्ध देखा।
पांडवों के बीच क्या विवाद हुआ था?
युद्ध के पश्चात पांडव भाइयों में यह विवाद हुआ कि विजय का वास्तविक श्रेय किसे मिलना चाहिए, तथा प्रत्येक भाई अपने-अपने पराक्रम को ही निर्णायक कारण मानता था।
बर्बरीक के शीश ने विजय का श्रेय किसे दिया?
उसने निष्पक्ष सत्य कहा कि युद्धभूमि में सर्वत्र केवल भगवान श्रीकृष्ण की ही शक्ति व संकल्प कार्य कर रहा था, किसी भी योद्धा का निजी बल विजय का कारण नहीं था।
श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को क्या वरदान दिया?
श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि कलियुग में वे स्वयं श्रीकृष्ण के ही नाम 'श्याम' से पूजे जाएंगे, तथा हारे व निराश भक्तों के सहारा कहलाएंगे।