खाटू श्याम प्राकट्य कथा
खाटू श्याम प्राकट्य कथा वह कथा है, जिसमें महाभारत के पश्चात शताब्दियों तक भूमि में दबा रहा बर्बरीक का शीश एक गाय के चमत्कार से राजस्थान के खाटू गांव में प्रकट हुआ, तथा राजा रूप सिंह चौहान के स्वप्नादेश से वहां मंदिर की स्थापना हुई, इसी प्राकट्य दिवस की स्मृति में प्रतिवर्ष फाल्गुन मेला लगता है।

अध्याय १ · भूमि में दबा शीश, और गाय का चमत्कार
महाभारत युद्ध से पूर्व बर्बरीक ने अपना शीश भगवान श्रीकृष्ण को दान कर दिया था, तथा युद्ध की समाप्ति पर श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर उन्हें कलियुग में 'श्याम' नाम से पूजित होने का वरदान दिया, यह शीश दान व वरदान की कथा इसी साइट के पृथक पृष्ठों पर विस्तार से दी गई है, अतः यहां संक्षेप में ही स्मरण कराई गई है। वरदान के अनुसार युद्धोपरांत वह दिव्य शीश भूमि में विलीन होकर शताब्दियों तक राजस्थान के सीकर क्षेत्र के खाटू गांव की धरती में दबा रहा, तथा समय के साथ लोग इसका स्मरण भी भूल गए।
बर्बरीक शीश दान कथा पढ़ें →कलियुग में एक दिन खाटू गांव में चरने वाली एक गाय प्रतिदिन एक ही स्थान पर जाकर स्वयं ही अपना दूध भूमि पर बहाने लगी। यह विचित्र घटना कई दिनों तक दोहराई गई, जिसे देखकर गोपालक व ग्रामवासी अत्यंत चकित हुए। जब उन्होंने उसी स्थान की खुदाई की, तो भूमि से एक अलौकिक तेजयुक्त शीश प्रकट हुआ, जिसकी दिव्य आभा देखकर सभी को यह प्रतीत हुआ कि यह कोई साधारण वस्तु नहीं, अपितु किसी दिव्य पुरुष का शीश है।
ग्रामवासियों ने इस दिव्य शीश को गांव के एक ब्राह्मण को सौंप दिया, जिसने श्रद्धापूर्वक इसे अपने घर में स्थापित कर इसकी पूजा-अर्चना आरंभ की। ध्यान व साधना के फलस्वरूप ब्राह्मण को इस शीश के बर्बरीक, अर्थात स्वयं श्रीकृष्ण के वरदान से कलियुग में पूजित होने वाले श्याम, होने का बोध हुआ, तथा यह समाचार शीघ्र ही समूचे क्षेत्र में फैल गया।
अध्याय २ · राजा का स्वप्न, और मंदिर की स्थापना
उस समय खाटू क्षेत्र पर राजा रूप सिंह चौहान का शासन था। कथा के अनुसार राजा को स्वप्न में आदेश मिला कि जिस स्थान पर यह दिव्य शीश प्रकट हुआ है, वहां एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया जाए, ताकि भक्तगण श्याम बाबा के दर्शन कर सकें। कुछ जनश्रुतियों में यह स्वप्न राजा की रानी नर्मदा कंवर को आया बताया जाता है, इस भिन्नता के बावजूद सभी कथाएं इस बात पर एकमत हैं कि स्वप्नादेश से ही मंदिर-निर्माण का कार्य आरंभ हुआ।
स्वप्नादेश के पश्चात राजा ने उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण करवाया, तथा जिस कुंड के निकट यह शीश प्राप्त हुआ था, वह आज भी 'श्याम कुंड' के नाम से जाना जाता है। मान्यतानुसार यह प्रथम मंदिर विक्रम संवत के अनुसार सन् १०२७ के आसपास बनवाया गया, जिसे कालांतर में अनेक बार विस्तारित व जीर्णोद्धारित किया गया, आज यहां संगमरमर से निर्मित भव्य मंदिर विराजमान है।
जिस दिन यह दिव्य शीश खाटू में प्रकट व स्थापित हुआ था, वह तिथि फाल्गुन मास की शुक्ल एकादशी मानी जाती है, तथा इसी तिथि को प्रतिवर्ष 'प्राकट्य दिवस' के रूप में मनाया जाता है। इसी अवसर पर खाटू में विशाल फाल्गुन मेला भरता है, जिसमें देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु श्याम बाबा के दर्शनार्थ पहुंचते हैं। चूंकि बर्बरीक ने हारने वाले पक्ष की ओर से लड़ने की प्रतिज्ञा ली थी, इसी कारण भक्तगण उन्हें 'हारे का सहारा' कहकर पुकारते हैं, तथा मानते हैं कि श्याम बाबा की शरण में आने वाले किसी भी हारे हुए व निराश व्यक्ति का उद्धार अवश्य होता है।
खाटू श्याम चालीसा पढ़ें →खाटू श्याम प्राकट्य कथा पाठ विधि
फाल्गुन शुक्ल एकादशी अथवा प्रत्येक एकादशी व मंगलवार को प्रातः स्नान कर श्याम बाबा का ध्यान करें, दीप जलाकर खाटू श्याम चालीसा व आरती का पाठ करें। संभव हो तो फाल्गुन मेले के अवसर पर खाटू धाम जाकर दर्शन करने की भी परंपरा है।
खाटू श्याम प्राकट्य कथा के बारे में
यह कथा दो अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में बर्बरीक के शीश के भूमि में दबे रहने, गाय के चमत्कार से उसके प्रकट होने तथा ब्राह्मण द्वारा उसकी पहचान की कथा है। दूसरे अध्याय में राजा रूप सिंह चौहान के स्वप्न, मंदिर की स्थापना तथा फाल्गुन मेले की परंपरा का वर्णन है।
यह कथा खाटू श्याम मंदिर, सीकर (राजस्थान) से जुड़ी है, तथा प्रतिवर्ष फाल्गुन शुक्ल एकादशी को प्राकट्य दिवस के रूप में मनाई जाती है। इस पृष्ठ पर दोनों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
राजस्थानी लोक-परंपरा के बारे में
खाटू श्याम प्राकट्य कथा का कोई एक प्रामाणिक मुद्रित 'कथा-पाठ' नहीं है, यह राजस्थान की मध्यकालीन लोक-परंपरा व खाटू धाम की मंदिर-गाथा के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाने वाली जनश्रुति है, जिसका शब्दांकन यहां मौलिक रूप से किया गया है। ध्यान दें: बर्बरीक द्वारा महाभारत-पूर्व अपना शीश श्रीकृष्ण को दान करने की संपूर्ण कथा, जिसमें उनके वरदान, तीन बाणों तथा ब्राह्मण-रूपी श्रीकृष्ण की परीक्षा का वर्णन है, तथा युद्धोपरांत श्रीकृष्ण से प्राप्त 'श्याम' नाम के वरदान की कथा, दोनों इसी साइट पर पृथक पृष्ठों पर दी जाएंगी, अतः यहां केवल संक्षिप्त संदर्भ के रूप में स्मरण कराई गई हैं, विस्तार से नहीं दोहराई गई हैं। यह पृष्ठ केवल शीश के खाटू में प्रकट होने, राजा रूप सिंह चौहान के स्वप्न तथा मंदिर-स्थापना तक सीमित है।
सामान्य प्रश्न
खाटू श्याम जी का शीश कहां व कैसे मिला?
राजस्थान के सीकर जिले के खाटू गांव में एक गाय प्रतिदिन एक ही स्थान पर स्वयं दूध बहाने लगी, जिसकी खुदाई करने पर वहां बर्बरीक का दिव्य शीश प्राप्त हुआ।
खाटू श्याम मंदिर की स्थापना किसने करवाई?
स्वप्न में आदेश पाकर राजा रूप सिंह चौहान ने उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण करवाया, जहां बर्बरीक का शीश प्रकट हुआ था, जिसे 'श्याम कुंड' के नाम से जाना जाता है।
प्राकट्य दिवस कब मनाया जाता है?
फाल्गुन मास की शुक्ल एकादशी को प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है, तथा इसी अवसर पर खाटू में विशाल फाल्गुन मेला भरता है।
बर्बरीक को 'हारे का सहारा' क्यों कहा जाता है?
बर्बरीक ने महाभारत में हारने वाले पक्ष की ओर से लड़ने की प्रतिज्ञा ली थी, इसी कारण भक्त उन्हें हारे व निराश लोगों का सहारा मानते हैं।